1 स्मृति ईरानी भी कभी मंत्री थी,कमल के साथ खिले चेहरे - छत्तीसगढ़ बीजेपी में अचानक ''फील गुड" की बयार बहने लगी है | पार्टी की सीनियर लीडर स्मृति ईरानी का रायपुर जो आगमन हुआ है,उनकी आमद दरज होने से पूर्व जो नुस्ख़े आज़माए गए है,वो कम रोचक नहीं है | अरसे बाद कई दिग्गज मंत्री और पार्टी पदाधिकारी "HOME WORK" में व्यस्त बताए जाते है,तैयारी ऐसी की जैसे "नेता जी" को कोई वार्षिक परीक्षा का इम्तेहान देना हो ?
दरअसल,आम कार्यकर्ता से लेकर ख़ास पदाधिकारियों तक स्मृति ईरानी रूबरू होने वाली है | इसके लिए मिनट टू मिनट का प्रोग्राम भी जारी हो गया है | विधानसभा चुनाव 2023 संपन्न होने के उपरांत पहली बार बीजेपी के भीतर और बाहर किसी केंद्रीय स्तर के नेता के आगमन को लेकर हलचल तेज़ देखी गई | आम कार्यकर्ता जो कभी पार्टी का तो, कभी सरकार का रंग-ढंग देख कर नाक-कान सिकुड़ते थे,उनके चेहरे पर भी अब ''कमल" खिलने लगा है,प्रसन्नता इस बात की है,कि ''फायर ब्रांड नेता" को प्रदेश प्रभारी नियुक्त किया गया है,उन्हें उम्मीद जगी है,कि अब "राजा से लेकर रंक तक" को अपने कामकाज का ब्यौरा सौंपना होगा ? स्मृति ईरानी के रायपुर पहुँचने से पूर्व उनके ''पैगाम'' मात्र से बीजेपी के गलियारों में गहमा-गहमी मची हुई है |
दरअसल,स्मृति ईरानी भी ''कभी मंत्री'' थी,लेकिन मंत्री से ज्यादा उनकी पहचान उस आम कार्यकर्ता के रूप में होती है,जो संगठन के दिशा-निर्देशों को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देते है,इसके लिए कोई त्याग करना भी पड़े तो,पीछे नहीं हटते | राजनीति के लगभग सभी पैतरों से वाकिफ़ स्मृति ईरानी कामकाज को लेकर भी कभी सख़्त मानी जाती है,लिहाज़ा उनके आगमन से लेकर गमन तक काफी सर्तकता बरती जा रही है,सादगी के साथ अनुशासन को लेकर आम कार्यकर्ता काफी सजग नज़र आ रहे है ,एयरपोर्ट से लेकर पार्टी मुख्यालय तक,इस बार ना तो,किसी नेता के बड़े-बड़े बैनर पोस्टर नज़र आ रहे है,और ना ही स्वागत-सत्कार के ढोल-नगाड़े सुनाई दे रहे है |
तस्दीक की जा रही है,कि स्मृति ईरानी लगातार दो दिनों तक मैराथन बैठक में व्यस्त रहेगी | उनके लिए छत्तीसगढ़ कोई नया प्रदेश नहीं,हालांकि बतौर प्रदेश प्रभारी उनकी यह पहली यात्रा "सत्ता और संगठन" की नब्ज़ टटोलने से कही बढ़कर,सार्थक प्रयासों से जोड़कर देखी जा रही है | तस्दीक की जाती है,कि पार्टी के लिए ''दूर की कौड़ी'' साबित हो रहे छत्तीसगढ़ और हरियाणा में "सत्ता और संगठन" की कमज़ोरी को दूर करने के लिए स्मृति ईरानी के पास एक से बढ़कर एक कई कारगर फॉर्मूले है,उन नुस्खों को आजमाने में वे कतई देरी नहीं करेगी ? ऐसा विश्वास उन ज़मीनी कार्यकर्ताओं को है,जो एक दौर में मैदानी स्तर पर पार्टी का परचम लहराने के बाद ''अपने हुए पराये जैसा'' अनुभव महसूस कर रहे थे |
कभी सत्ता की बेरुख़ी तो कभी,संगठन की मजबूरी से ऐसे कार्यकर्ताओं ने पार्टी के झंडे -डंडे से तक दूरियां बनाना ही मुनासिब समझ लिया था,उन्हें उम्मीद जगी है,कि अब ना तो जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा होगी,और ना ही ''सत्ताधीशों'' को हकीकत पर पर्दा डालने का मौका मिलेगा| उनकी दलील है,स्मृति के धमाकेदार आगाज़ से 2028 का अंजाम भी अब तय नज़र आ रहा है ? मतलब कांग्रेस का सूपड़ा फिर साफ़ |
2 स्मृति लोक-स्मृति लोप,खाओ और खाने दो - छत्तीसगढ़ में ''स्मृति लोक'' के आगाज के साथ ही,कई लोगों को ''स्मृति लोप'' की शिकायत शुरू हो गई है,अभी तो दिन पहला-पहला है,आगे क्या होगा ? सोचकर ही ''सत्ता लोक'' में विचार मंथन का दौर शुरू हो गया है | सत्ता के गलियारों से लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के ''दल-दल'' में ''स्मृति लोक'' की परिकल्पना से ही कई नेताओं की सांसे फूली हुई है,खासकर उन धड़ों ने,जिन्होंने वादा तो,जनता की सेवा का किया था,लेकिन सत्ता का स्वाद लगते ही "नगद नारायण" का मेवा हज़म करने में देरी नहीं की | ''खाओ और खाने'' दो का रंग फीका पड़ेगा ? स्मृति लोक में अब होगा ''इंसाफ'' का नारा गूंज रहा है,इसकी स्वर लहरियां कांग्रेस के दल-दल में भी सुनाई देने लगी है |
दरअसल,चने के डार राजा की लोक धुन में थिरकने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री की बेहद करीबी तत्कालीन उपसचिव सौम्या चौरसिया द्वारा कांग्रेसी कार्यकाल में खिलाएं गए गुल को लेकर,बिलासपुर की भरी सभा में स्मृति ईरानी ने "तार क्या छेड़े"''भू-PAY लोक" में हाहाकार मच गया था | अब वो सभा और वो हुंकार कांग्रेस के ''स्मृति पटल'' में हिलोरे मार रही है,लिहाज़ा स्मृति लोक की जय-जयकार सुनते ही,''भू-PAY लोक" में अभी से चीख़-पुकार सुनाई देने लगी है |आगाज़ ऐसा है,तो अंजाम क्या होगा ? सोचकर विपक्षी खेमे के कई नेताओं के माथे में चिंता की लकीरें उभर आई है, उधर,सत्ता के गलियारों का हाल भी,बेहाल बताया जाता है,खासकर उन ठिकानों में ''जहाँ खाओ और खाने दो''की बयार अब तक बेफिक्री के साथ बह रही थी |
बताते है,कि 2 हज़ार करोड़ के डामर घोटाले की नींव रखने का मामला हो,या फिर लगभग 6 हज़ार करोड़ की खिंचाई परियोजनाओं को ''कुपात्र'' ठेकेदारों को सौंपने का फैसला ? दवाओं का काला बाजार हो या फिर सरकारी-गैर सरकारी हाउसिंग प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी ? खेत-खलियानों में दम तोड़ती केंद्र और राज्य सरकार की महत्त्वकांक्षी योजनाएं हो या जल-जंगल और जमीनों को औद्योगिक घरानों को सौंपने की कवायत,अब ऐसे मामले सवालियां निशान तक सीमित नहीं रहेंगे,बल्कि आगे की राह तय करेंगे ? जो ''खाया है,वो निगलना'' होगा ? ''सरकारी धन जनता का धन'' है,इसे यूँ ही पचने नहीं दिया जाएगा |
स्मृति लोक की विशेषताओं का खास हिस्सा बताया जा रहा है | चर्चा यह भी है,कि सत्ता के गलियारों में ऊंची उड़ान वाले पंछी अचानक सतर्क हो गए है,उन्हें भी अचानक ''स्मृति लोप'' की शिकायत शुरू हो गई है | एक अनुभवी नेता जी तस्दीक करते है,कि जनहित के नाम पर सत्ता की चाशनी चखने में ही,अनवरत जोर देते रहने से होने वाला ये वो संक्रमण है,जिसमें "भारसाधक" की पुरानी यादें खत्म हो जाती हैं या उसे नई यादें बनाने और उन्हें सहेजने में भारी परेशानी होती है। कई मौके पर तो,कुर्सी तक डगमगाने लगती है | बहरहाल,स्मृति लोप और स्मृति लोक दोनों ही, अपनी रफ़्तार पर है |
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3 नज़र लगी राजा तोरे बंगले पर - छत्तीसगढ़ में ''फील गुड'' की बहती बयार के बीच भेंट-अनुपम भेंट देने की होड़ मची है,ढाई-तीन करोड़ का बंगला "माशूका'' को सप्रेम भेंट सौंपने की दास्तान अभी तक सत्ता के गलियारों में सुनाई देती थी,लेकिन अब यह आंकड़ा निचले पायदान पर है,जबकि सौगाते प्रदान करने वाला पहले वाले से कही ऊपर की कुर्सी पर विराजमान नज़र आता है,चर्चा है,कि महोदय ने 1.80 करोड़ की लागत वाला एक बंगला अपनी "पथगामिनी" को उपहार स्वरुप दिया है |
दावा किया जाता है,कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपता ? इसलिए महोदय की कीमती भेट का रहस्य भी ज्यादा दिन तक नहीं गहराया,निकली बात तो ,चली गई दूर तलक तक,जिन गलियारों में पुराने वाले का बंगला सुर्खियां बटोर रहा था,वहां अब महोदय का पोस्टर चिपक गया है,''ऐसी-वैसी'' बातों पर दिलचस्पी लेने वाले कहने से नहीं चूक रहे है,कि "नज़र लगी राजा तोरे बंगले पर",तांक-झांक भी शुरू हो गई है,नज़र ऐसी लगी,कि महोदय को अपनी बस्ती कोसो दूर बसानी पड़ी,भई "प्रभार" भी तो कोई चीज़ है,दायित्वों का निर्वहन तो हर-हाल में करना है?
रही बस्ती प्यार की,वो तो आभार जताते ही,बस ही जाती है, वैसे बताते है,कि अब प्रभारी महोदय दिल्ली दरबार तक ही सिमट गए है,मैदानी इलाकों से उनका मोहभंग कराने के लिए नई जिम्मेदारियां भी लाद दी गई है |लेकिन,एक बात जरूर है,ये बंगला भी कम नियारा नहीं है,"दरिया किनारे इक बँगलो गो पोरी ज़ई जो ज़ई" फ़िल्मी गीत की तर्ज पर दिल्ली-हरिद्वार मार्ग पर महोदय का नया "रैन-बसेरा",सजने लगा है |
4 रील से लेकर रियलिटी तक, मसला कानून को हाथ में लेने का है,नारी शक्ति के मान सम्मान और अभिमान का नहीं- छत्तीसगढ़ के पुलिस महकमे में इन दिनों रील से लेकर रियलिटी तक का जायजा लिया जा रहा है | ओके-टेक रेडी,कैमरा ऑन,रोल-एक्शन,बताते है,कि कई इलाकों के कप्तान साहब,तब-तक हाथ-पांव नहीं चलाते,जब तक की आम प्रेस-मीडिया के अलावा निजी सेवा में नियुक्त कैमरा मैन-फोटोग्राफर हामी नहीं भरते |
दिन की शुरुआत ही रील से होती है,लेकिन शाम ढलते-ढलते सामना रियलिटी से हो ही जाता है,तभी तो विजयदशमी के मौके पर रंग में ऐसी भंग पड़ी,कि साहब को जवाब देना मुश्किल हो रहा है | कोई रंग-बिरंगी पोशाक में तो कोई,वर्दी में शस्त्र पूजा के नाम पर ''धांय-धांय'' तो कही ढाएं-ढाएं करते नज़र आया |अब कानून की अतिशबाज़ी करने वाले पुलिस कप्तानों को मुख्यालय की ओर से तलब कर लिया गया है | पहले एक जिले में AK-47 की हर्ष फायरिंग ने कोहराम मचाया तो फिर बाकी जिलों से भी ऐसी ही,रील सामने आने लगी,कप्तान साहब SLR सेल्फ लोडिंग राइफल (Self-Loading Rifle) को कंधे पर टांग कर अपना जौहर दिखाते नज़र आए | सोशल मीडिया में ऐसी रील की कतार लगने में देर नहीं लगी |
राजनांदगांव से निकली चिंगारी देखते ही देखते कई जिलों में आग के गोले के रूप में तब्दील होते दिखाई देने लगी | इस बीच सवाल भी उठने लगा,कि सिर्फ छत्तीसगढ़ की बेटी को ही शोकॉज नोटिस क्यों? सिर्फ महिला SP ही पुलिस मुख्यालय की नज़रों की किरकिरी क्यों बन गई ? क्या पुरुष SP मंगल ग्रह से प्रकट हुए है ? शोकॉज नोटिस उन्हें क्यों नहीं थमाया गया | शिकायतकर्ताओं की आपत्ति में जहाँ दम नज़र आ रहा है,वही हर्ष फायरिंग का मामला अगले पड़ाव की ओर अपने कदम आगे बढ़ाता दिखाई दे रहा है | बताते है,कि शस्त्र पूजा इतनी महंगी भी पड़ सकती है,कप्तान साहब को उस वक्त नहीं सूझा जब "कानून" को अपने हाथों में उठा कर धांय-धांय करने का मन कर रहा था |
जानकार बताते है,कि ''हर्ष फायर'' करना जिस तरह से लाइसेंसी बंदूकधारियों के लिए आपराधिक दायरे में है,उसी तर्ज पर कप्तान साहब भी ''कानून की डोर'' से बंधे हुए है | उनका ''हर्ष फायर'' भी नियमानुसार कानून के उल्लंघन के दायरे में है,ऐसे में जाँच-पड़ताल तो होनी ही चाहिए, फिर रही बात कार्यवाही की ? तो,किसकी इतनी मजाल की "कप्तान" साहब पर कार्यवाही की सोचे,वो भी वैधानिक ? जब महकमे में सेवाकाल के दौरान "कायदे -कानूनों" की बखियां उधेड़ने के बावजूद तत्कालीन ADG का पुलिस मुख्यालय तो छोड़ तत्कालीन कांग्रेस सरकार ''बाल भी बांका'' नहीं उखाड़ पाई,तो मौजूदा हुक्मरान उनके गिरेबान में आखिर कैसे हाथ डाल पाएंगे?
यही नहीं,जिस ADG को पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने निलंबित किया,उसे सत्ता में आते ही,मौजूदा कर्णधारों ने रिटायर होने के बावजूद ना केवल मंत्री परिषद की विशेष कृपा से "DG" का पद-पदोन्नति के साथ तोहफे में परोस दिया गया,इस मौके पर तमाम शिकवा-शिकायतों को भी रद्दी की टोकरी पर डालने में देरी नहीं की गई,MG ही क्यों ?
राज्य में कांग्रेस का दुप्पटा ओढ़ कर, ED की जासूसी करने,अवैध फ़ोन टेपिंग,महादेव एप्प ऑनलाइन सट्टा,बीजेपी नेताओं को मुश्किल में डालने और फर्जी मुकदमे दर्ज करने वाले 2001 बैच के आईपीएस आनंद छाबड़ा,2005 बैच के शेख आरिफ और 2007 बैच के प्रशांत अग्रवाल के काले कारनामों का हिसाब-किताब करने के बजाए "भू-PAY"गिरोह को उपकृत करने में इन वर्षों में कोई कमी नहीं की गई | इन अफसरों के ठिकानों में सीबीआई की छापेमारी के बावजूद PHQ चुप्पी साधे रहा |
यही नहीं, 2008 बैच की आईपीएस पारुल माथुर और 2013 बैच के भोजराम पटेल समेत अन्य का नाम 700 करोड़ के कोल खनन परिवहन घोटाले की ED की चार्जशीट में शामिल होने और अदालत के कड़े रुख के बावजूद दागी अफसरो का निलंबन तो,दूर उन्हें शोकॉज नोटिस तक जारी नहीं किया गया,तो फिर संशय कैसा ? और तो और,विशाखा कमेटी की रिपोर्ट के सामने आने के बावजूद महिला उत्पीड़न से जुड़े प्रकरण में DG स्तर के एक अफसर को अभयदान देने में पुलिस मुख्यालय ने अपनी आपत्ति तक दर्ज नहीं कराई |
ऐसे में "विष्णु राज" में शस्त्र पूजन अनुष्ठान के तहत धांय-धांय,ढाएं-ढाएं के प्रति उदारता-सहानुभूति क्यों नहीं बरती जाएगी ? कप्तान साहब ने तो,सिर्फ गोली ही चलाई है,किसी को निशाने पर थोड़ी ही लिया है ? रही बात,शस्त्र पूजन की तो यह पारंपरिक रंग है,लेकिन क्या करें "रील'' के साथ भी तो हमारा संग है |
5 नगरीय निकायों में नशे के खिलाफ नोडल अफसरों की तैनाती -नशा तो नशा है,चाहे गीला हो या सूखा ? छत्तीसगढ़ में नशे के खिलाफ एक ऐसा अभियान छेड़ा गया है,जिसके छेड़े जाने को लेकर लोग जमकर माथापच्ची कर रहे है | दरअसल,नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों में नशे के खिलाफ जागरूकता के प्रचार-प्रसार के लिए नोडल व सहायक नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी। ''है ना दूर की सोच'',राज्य में पूर्ण शराबबंदी की मांग अब बेतूका मुद्दा बन कर सिमट गया है,ना विपक्ष इसके पक्ष में है,और ना ही सत्ता पक्ष का रंग-ढंग ऐसा दिख रहा है,कि भविष्य में शराब को प्रोत्साहन ना मिले,जब हाथों में गंगा जल लेकर शराबबंदी की कसमें खाने वाले सेवादारों ने ही,3500 करोड़ का शराब घोटाला कर दिया,तो जिन्होंने ऐसा कोई वादा नहीं किया और न ही जनता को कोई झूठे ''सब्ज़बाग'' दिखाएं,उनसे शराबबंदी की उम्मीद न करना ही,बेहतर है,कम से कम जो वादा किया,जो कहा उसे निभाने में पीछे हटते नज़र नहीं आ रहे है |
ऐसे में नगरीय निकायों में नोडल अफसर की तैनाती कितनी कारगर होगी ? यह तो वक्त ही बताएगा ? लेकिन,माथापच्ची जिस "मर्ज़" को लेकर हो रही है,उसका दर्द एक बड़ी आबादी की जीवनशैली में नज़र आ रहा है | बताते है,कि नशे की रोकथाम के लिए संचालनालय नगरीय प्रशासन एवं विकास ने सभी निकायों को सात दिनों के भीतर नोडल अधिकारियों की जानकारी भेजने के निर्देश दिए हैं, जारी आदेश में कहा गया है कि यह व्यवस्था केंद्र सरकार के नारकोटिक्स कोआर्डिनेशन सेंटर (एनसीओआरडी) की 10वीं शीर्ष स्तरीय बैठक में लिए गए निर्णय के तहत की गई है। बताते है,कि विगत महीने 26 जून को केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में नशे की मांग कम करने,नशे के आदी लोगों के उपचार और पुनर्वास के लिए विशेष अभियान छेड़ा जाएगा |
शराबी उपभोक्ता समूहों में इस अभियान को लेकर काफी उत्सुकता देखी जा रही है,वे दिल खोल कर इसका स्वागत करने की तैयारी में है,उम्मीदों के साथ आस बंधी है,कि जीवन यापन हेतु नक्सली पुनर्वास नीति के तहत मिलने वाली सुख-सुविधाएँ क्या उन्हें भी मिलने वाली है ? दरअसल,कई शराब उपभोक्ता दलील दे रहे है,कि उनके भरोसे ही,राज्य सरकार को ''राजस्व" का बड़ा हिस्सा मिलता है,वे पूरी ईमानदारी के साथ बोतल लेते ही,आबकारी शुल्क की भी अदायगी करते है,जबकि बिजली,टेलीफोन,जल कर,रौशनी और संपत्ति कर के लिए सरकारी संस्थानो को महीनों-सालों इंतज़ार करना होता है,ऐसे में उनकी नज़रअंदाज़ी क्यों ? वे भी नक्सलियों की तर्ज़ पर भटके हुए पीड़ित है,लेकिन ना तो कभी बगावत की और ना ही कभी ''मुफ़्त या जोर जबरदस्ती" दारू लेने के हथियार उठाया | जबकि,अपनी मांगे पूरी ना होने पर नक्सलियों ने तो,खून-ख़राबा करने में देरी नहीं की |
अभी यह साफ़ नहीं हुआ है,कि नगरीय निकायों में तैनात होने वाले नोडल व सहायक नोडल अधिकारी किसे काबू में करेंगे ? आम नशेड़ियों-गंजेड़ियों-भंगेड़ियों को,ड्रग्स और केमिकल निर्मित नशीली गोली खाने वालों को ? या फिर,सरकारी प्रतिष्ठानों से प्रदत्त शराब के शौकीनों को ? इस अभियान के दायरे को लेकर माथापच्ची जोरों पर है | कई शराबी यह भी दलील दे रहे है,कि नोडल व सहायक नोडल अधिकारी सिर्फ सरकार की सेवा और कारोबार से जुड़े शराब उपभोक्ताओं को ही असली हितग्राही मानकर, उनके पुर्नवास के लिए नई कुर्सी में बैठने वाले है | फ़िलहाल,नशे के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने वाले इस अभियान की सफलता की कामना करने वालों की कोई कमी नहीं |
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