सऊदी अरब में बांग्लादेशी जोड़े नजरुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख्तर को मौत की सजा दिए जाने का मामला चर्चा में है। रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों पर मक्का की एक मस्जिद में कथित तौर पर अश्लील हरकतें करने का आरोप था। जेद्दा की अदालत में कई महीनों तक चली सुनवाई के बाद 14 अक्टूबर को मक्का में उन्हें मौत की सजा दी गई। इस मामले में सऊदी अरब के गृह मंत्रालय ने सजा का आधार ‘ताजीर’ बताया, लेकिन सजा किस तरीके से दी गई और आरोपियों के खिलाफ क्या सबूत पेश किए गए, इसकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। रिपोर्टों में यह दावा भी किया गया है कि बांग्लादेश को इस कार्रवाई की पहले से सूचना नहीं दी गई थी।
क्या है ‘ताजीर’ कानून और क्यों उठ रहे हैं सवाल? शरिया कानून के तहत ताजीर ऐसी सजा की श्रेणी है, जिसमें न्यायाधीश अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों के आधार पर दंड तय करता है। इस मामले में आरोपों का पूरा ब्योरा, कानूनी सहायता और सुनवाई की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी सामने नहीं आने के कारण पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इससे पहले भी सऊदी अरब में विदेशी नागरिकों को मौत की सजा दिए जाने और संबंधित देशों के दूतावासों को सूचना मिलने में देरी के मामले चर्चा में रहे हैं। विएना कन्वेंशन ऑन कॉन्सुलर रिलेशंस, 1963 के तहत विदेश में हिरासत में लिए गए नागरिकों के मामले में संबंधित देश के वाणिज्य दूतावास से संपर्क के अधिकार का प्रावधान है। ऐसे में बांग्लादेशी जोड़े का मामला सजा के साथ-साथ विदेशी नागरिकों के अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी बहस छेड़ रहा है।

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