
रायपुर : छत्तीसगढ़ में अगली सरकार किस दल की होगी ? इसका नमूना हालिया जारी,आईपीएस अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग लिस्ट को देखकर बख़ूबी लगाया जा सकता है|सत्ताधारी बीजेपी के अच्छे दिनों का वादा,रद्दी की टोकरी में जा चुका है,पीड़ित जनता सिर्फ सरकारी प्रताड़ना झेल रही है|उसे आभास हो चला है,कि आने वाले 2 सालों के भीतर असंवेदनशील सरकार की रवानगी तय है|

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री साय के सत्ता सँभालते ही,शुरू हुई कानून व्यवस्था बिगड़ने की कई घटनाएं आम हो चुकी है,प्रदेश की ध्वस्त पुलिसिंग व्यवस्था का नमूना यह देखकर ही लगाया जा सकता है,कि बेमेतरा में प्राथमिक परिक्षण किए बग़ैर ही फांसी पर झूली एक महिला को मृत समझकर पुलिस कर्मियों ने कमरा सील कर दिया था,जबकि उस महिला की सांसे चल रही थी| यही नहीं,करीब दो घंटे तक कमरा बंद रहा,नतीजतन पीड़ित महिला के बचाव के लिए ना तो,कोई सहायता मुहैया हो सकी और ना ही पुलिस ने ऐसा संवेदनशील रुख़ अपनाया,कि आत्महत्या के लिए उतारू महिला का करीब जा कर जायजा ले सके|आखिरकार,पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हकीकत सामने आ गई |

”खाकी वर्दी” फिर हुई ”शर्मसार” ये कोई नया मामला नहीं है,बल्कि प्रदेश में गंभीर अपराधों से लेकर रेप और हत्या जैसे मामलों की झड़ी लगी हुई है|यह सब कुछ हो रहा है,अयोग्य डीजीपी को प्रदेश के पुलिस मुख्यालय की बागडोर सौंप देने से|ऐसे हालात में,जनता के जान-माल की सुरक्षा ही नहीं,बल्कि बीजेपी सरकार की साख भी दांव पर है|अयोग्य डीजीपी के चलते छत्तीसगढ़ सरकार को सुप्रीम कोर्ट से लगी फटकार के बाद एक ओर नया बवाल,आईपीएस अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग लिस्ट को लेकर सामने आया है|

छत्तीसगढ़ शासन की ओर से आईपीएस अधिकारियों की तबादला सूची सोमवार को जारी कर दी गई है | इस सूची में 31 भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों का तबादला कर दिया गया है।लेकिन, इस फेरबदल में अयोग्य डीजीपी को हटाने के बजाए,योग्य आईपीएस अधिकारियों की तबादले से प्रशासनिक और राजनैतिक गलियारों में सरगर्मियां तेज़ है |बीजेपी सत्ता और संगठन से जुड़े कई वरिष्ठ नेता तबादला सूची देखकर हैरानी जता रहे है |
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उनकी माने तो,इस तबादला सूची में ना तो, अधिकारियों की कार्यक्षमता का ध्यान रखा गया है और ना ही वरिष्ठता का | नाम ना जाहिर करने की शर्त पर,जमीनी नेता तस्दीक कर रहे है,कि विवादों से ग्रसित यह तबादला सूची राज्य की सत्ता से बीजेपी की रवानगी का पैगाम है|उनकी माने तो,पर्याप्त आईपीएस अधिकारियों की तैनाती के बावज़ूद दर्जनों अधिकारियों को ”दोहरा” और ‘तीहरा’ प्रभार सौंपा गया है| जबकि, वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को कनिष्ठ अफसरों का प्रभार देकर एक बार फिर ठिकाने लगा दिया गया है|छत्तीसगढ़ में आईपीएस अधिकारियों के तबादले प्रशासनिक और कानून व्यवस्था के मद्देनज़र ना करते हुए,किसी “सुपर सीएम” जैसे शख्स को खुश करने से जोड़कर देखे जा रहे है|

दावा किया जा रहा है,कि इन तबादलों में ना तो मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मंशा का ध्यान रखा गया है और ना ही उस वर्किंग कल्चर का,जिसे पुलिस मुख्यालय में बतौर प्रोटोकॉल अमल में लाया जाता है | यह भी जानकारी सामने आई है,कि मुख्यमंत्री साय प्रदेश में चुस्त-दुरुस्त पुलिसिंग व्यवस्था के पक्षधर है,लेकिन उनके निर्देश भी प्रभावशील नौकरशाही के सामने बेतुके साबित हो रहे है |

बीजेपी के गलियारों में यह भी चर्चा है,कि थानेदार से लेकर पुलिस अधीक्षकों की तैनाती में उनके दिशा-निर्देशों को नजरअंदाज कर दिया गया था और अब वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के तबादले सिर्फ कागजी खानापूर्ति और अपनों को उपकृत करने तक सीमित कर दिए गए है ,इसके दूरगामी परिणाम सामने आएंगे,उन्हें अंदेशा है,कि जनता के अरमानों पर पानी फेरने का जारी सिलसिला कांग्रेस को सत्ता में आने का न्यौता भेज रहा है|

छत्तीसगढ़ में इन दिनों ट्रांसफर पोस्टिंग की बयार बह रही है,मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने बीजेपी सरकार पर ”ट्रांसफर उद्योग” के कारोबार का सीधा आरोप लगाया है| यह पहला मौका नहीं है,जब कांग्रेस ने साय सरकार पर इस तरह के आरोप लगाए है| दरअसल,बीजेपी के सत्ता में आते ही “सुपर सीएम” समेत नौकरशाही की एक ”लॉबी” ने अयोग्य आईपीएस अधिकारी को डीजीपी की कुर्सी सौंप दी थी| इसके साथ ही प्रदेश में कानून व्यवस्था बिगड़ने के कई मामले सामने आये | कभी एसपी-कलेक्टर तो कभी,थानेदारों पर गाज गिरी,लेकिन डीजीपी की अयोग्यता पर कोई ध्यान नहीं दिया गया |

आईपीएस अधिकारियों की ट्रांसफर लिस्ट को वरिष्ठ अधिकारियों की गरिमा को चोट पहुंचाने से जोड़कर देखा जा रहा है|तस्दीक की जाती है,कि परंपरा और प्रचलित कायदे-कानूनों को दरकिनार कर वरिष्ठ अधिकारियों को कनिष्ठ अधिकारियों को सौंपे जाने वाले प्रभारों के साथ स्थानांतरित कर दिया गया है,यह उनकी ”गरिमा हनन” का मामला है या तबादला सूची |

हालाँकि,सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा डीजीपी की कार्यप्रणाली पर सवालियां निशान लगाते हुए,उन्हें अयोग्य करार देने में देरी नहीं की|सुप्रीम फरमान जारी हुए पखवाड़े भर से ज्यादा का वक्त बीत चुका है|लेकिन,अयोग्य डीजीपी को हटाने के बजाए दर्जनों योग्य आईपीएस अधिकारियों का गैर-जरुरी प्राथमिकता के साथ तबादले का मामला सुर्ख़ियों में है| इसे बीजेपी सरकार की बड़ी चूक के रूप में देखा जा रहा है|अब जनता पूछने लगी है,अयोग्य डीजीपी का क्या ? उन्हें कब तक आम जनता के सिर पर यूं ही,लादा जाएगा ?
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