
रायपुर/दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के DGP और DG जेल को सख़्त चेतावनी देते हुए साफ़ शब्दों में पूछा है,कि अदालत की ”अवमानना” के आरोप में आपको “जेल” क्यों ना भेजा जाए ? इस दौरान अदालत के गंभीर रुख़ के चलते कोर्ट रूम में अचानक सन्नाटा पसर गया था| वरिष्ठ न्यायधीश (जस्टिस) विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में घटित कस्टोडियल डेथ से जुड़ी उस याचिका पर सुनवाई की थी,जिसमे करीब ढाई साल बाद भी पुलिस ने FIR दर्ज करने में कोई रूचि नहीं दिखाई थी|पीड़ित परिवार के द्वारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाए जाने के बाद ”सोया” हुआ पुलिस प्रशासन हैरान करने वाले दावे करता नज़र आया|

सुनवाई के दौरान DGP और DG जेल एक दूसरे पर ही ”ज़ुबानी जमा” रकम खर्च करते दिखाई दिए | जबकि,अदालत द्वारा पूछे गए प्रत्येक सवालों पर दोनों ही अधिकारियों का ज़वाब उनकी कार्य प्रणाली का नमूना पेश कर रहा था| सुनवाई के दौरान बैंच ने फटकार लगाते हुए, जिस तर्ज़ पर पुलिस के ”निकम्मेपन” की धज्जियां उड़ा दी है,उससे उन ”योग्य” आईएएस अधिकारियों की भी नींद उड़ी हुई है,जो उस DPC का हिस्सा थे,जिसने अरुण देव गौतम को बतौर योग्य उम्मीदवार के DGP की कुर्सी सौंपी थी | DGP चयन हेतु पैनल में शामिल दोनों ही वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की योग्यता और कार्य क्षमता सवालों के घेरे में है|

सुनवाई के दौरान पीड़ित याचिकाकर्ता की दलीले और उस पर DGP और DG जेल के तमाम तथ्यों की बानगी साफ़ कर रही थी,कि कस्टोडियल डेथ के मामलों को लेकर पुलिस और जेल प्रशासन सिर्फ ”हवा-हवाई” दावे कर रहे है,ना तो वे अपनी कुर्सी के प्रति गंभीर है और ना ही पीड़ित जनता से उनका कोई सरोकार है| ऐसे अफसरों की कार्यप्रणाली से छत्तीसगढ़ शासन की साख पर तगड़ा झटका लगा है| सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से DGP और DG जेल को फटकार लगते रही,जबकि मौके की नज़ाकत को देखते हुए गृह सचिव को बगले झांकने का भरपूर मौका मिला| यह ऐसा अवसर बताया जा रहा है,जब नौकरशाही के ”नायाब नमूनों” से सुप्रीम अदालत भी रूबरू हुई |

सुनिए सुनवाई की सुप्रीम कोर्ट LIVE स्ट्रीमिंग ट्रांसक्रिप्ट–
जज – “श्रीमान DGP, इस देश में कस्टोडियल डेथ के मामले में 2 साल 7 महीने बाद FIR दर्ज करने पर क्या आपको किसी ट्रेनिंग की जरूरत है?”
DGP –“नहीं सर।”
जज – “पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि यह अदालत के साथ धोखा है। आपने पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखे बिना कस्टोडियल डेथ के मामले में हलफनामा कैसे दाखिल कर दिया? क्या आप चाहते हैं कि हम इसे स्वीकार कर लें?”

DGP – रिपोर्ट सेंट्रल जेल, बिलासपुर भेजी गई थी और इस मामले में जांच के आदेश दिए गए हैं। दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
जज – जांच रिपोर्ट 22 जुलाई 2024 को ही जमा हो चुकी थी।
जज – रिपोर्ट जेल पहुंचने के बाद आखिर कहां चली गई,क्या उसे नष्ट कर दिया गया या कहीं दबा दिया गया?
DGP – ”माफी” मांगते हुए, हाईकोर्ट के आदेश का पालन किया गया और मुआवजा भी दिया गया।
जज DGP से- आपने रिपोर्ट नहीं मिलने की बात कही, जबकि यही रिपोर्ट हाईकोर्ट में आपके हलफनामे के साथ दाखिल की गई थी।
जज – यह अदालत को गुमराह करने की कोशिश है |

जज –पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज “ब्लंट हथियार से सिर में चोट” को लेकर कोर्ट ने पूछा—“इसका मतलब क्या है? क्या आप इसे सामान्य भाषा में समझते हैं?”याचिकाकर्ता की ओर से पोस्टमार्टम रिपोर्ट के कई गंभीर बिंदु कोर्ट के सामने रखे गए। रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर कई बाहरी चोटों का उल्लेख था। सिर, गर्दन, हाथ-पैर और शरीर के अन्य हिस्सों पर चोट के निशान बताए गए। रिपोर्ट में सिर की चोट और उसकी जटिलताओं के कारण कार्डियो रेस्पिरेटरी फेल्योर को मौत का कारण बताया गया।
DG जेल व DGP बारी-बारी रिपोर्ट का हवाला और अपना तर्क देते हुए – राज्य की ओर से पहले कहा गया था कि मृतक को शराब छोड़ने के कारण होने वाले लक्षणों के चलते अस्पताल ले जाया गया था और वह आक्रामक व्यवहार कर रहा था।
जज – इस दावे और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अंतर की ओर भी ध्यान दिलाते हुए कोर्ट ने लगाई फटकार |
जज- मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर गौर-फरमाती अदालत ने अब चोटों की अवधि को लेकर सवाल उठाए। पोस्टमार्टम में कुछ चोटों के पुराने होने के संकेत बताए गए, जबकि एक चोट को ताजा बताया गया।

जज – पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण सिर में चोट और उससे उत्पन्न जटिलताओं को बताया गया था।कोर्ट को बताया गया कि घटना 22 जनवरी 2024 की थी, लेकिन FIR काफी देर बाद दर्ज हुई। अदालत ने सवाल किया कि करीब ढाई साल तक आखिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जज – अगर चोटें जेल में हुई हैं तो जिम्मेदारी राज्य है। पुलिस हिरासत हो या जेल हिरासत-जवाबदेही राज्य की ही होगी। मुआवजे की राशि पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक लाख रुपये मानव जीवन की कीमत कैसे हो सकती है ?
जज DGP से – कस्टोडियल डेथ के मामले में 2 साल 7 महीने बाद FIR दर्ज करने का क्या औचित्य है।
DGP कोर्ट से – FIR जेल विभाग से रिपोर्ट मिलने के बाद दर्ज की गई।

जज की तीखी प्रतिक्रिया – “क्या आपको इसके लिए ट्रेनिंग की जरूरत है?”
DGP – न्यायिक जांच के बाद ही FIR दर्ज की जा सकती थी।
जज – फिर FIR दर्ज करने में इतना समय क्यों लगा ?
जज- राज्य के हलफनामे पर गंभीर सवाल उठाते हुए, कस्टोडियल डेथ के मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखे बिना हलफनामा दाखिल करना हमें स्वीकार्य नहीं है।
जज – न्यायिक जांच रिपोर्ट पेश करने को कहा। रिपोर्ट की तारीख 22 जुलाई 2024 बताई गई।
जज – रिपोर्ट किसे भेजी गई थी।
DGP – रिपोर्ट DG जेल को भेजी गई थी।
जज -“और DG जेल क्या कर रहे थे? रिपोर्ट पर बैठे रहे?”

DG जेल – रिपोर्ट सेंट्रल जेल, बिलासपुर भेजी गई थी। उन्होंने कोर्ट से माफी मांगते हुए कहा, कि मामले में जांच के आदेश दिए गए हैं, जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
जज – अब यह देखा जाएगा कि जिम्मेदारी तय करने के लिए राज्य पुलिस सक्षम है या मामला किसी दूसरी एजेंसी को सौंपना पड़ेगा।
जज – अब तक की स्थिति देखकर उसे नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ का प्रशासन इस मामले को संभालने में ”सक्षम” है।

DGP – राज्य के अधिकारी सक्षम हैं, लेकिन न्यायिक जांच रिपोर्ट पुलिस विभाग तक नहीं पहुंचने के कारण भ्रम की स्थिति बनी रही।
जज- रिपोर्ट तो 22 जुलाई 2024 को ही जमा हो चुकी थी। फिर DGP को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी?
DGP एक बार फिर माफी मांगते हुए – जैसे ही रिपोर्ट मिली, FIR दर्ज कर दी गई और मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी।
जज – जब न्यायिक जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी, तो DGP को इसकी जानकारी कैसे नहीं थी।
जज – रिपोर्ट आपके हलफनामे के साथ ही दाखिल हुई थी।
जज फटकार लगाते हुए –“अदालत को हर पहलू पर गुमराह करने की कोशिश की गई।”
जज – न्यायिक जांच रिपोर्ट में दर्ज “ब्लंट हथियार से सिर में चोट” का हवाला देते हुए DGP से पूछा कि इसका सीधा मतलब क्या है।
जज बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए- “हमें यह दर्ज करना पड़ेगा कि छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह अक्षम हैं।”
जज- FIR की तारीख पूछी।

DGP – ”30 जुलाई”जज – 8 दिन बीतने के बाद जांच में क्या हुआ ?
DGP – एक अधिकारी और टीम को जांच सौंपी गई है और जेल विभाग के CCTV समेत अन्य साक्ष्यों की जांच की जा रही है।
जज – आदेश सुरक्षित रखने की बात कही। मुआवजे के मुद्दे पर भी सुनवाई हुई और आगे की तारीख 11/12 अगस्त से संबंधित निर्देश दिए गए। सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ के DGP, DG जेल/प्रिजन और गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मौजूद थे।
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ DGP और DG जेल को दी सीधे जेल भेजने की चेतावनी,बगले झांकते रही गृह सचिव,देखें वीडियो
(COURTESY-AR NEWS 18)…






