
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में अंतरिम राहत से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि पत्नी की आय पति से अधिक भी हो, तब भी उसे मुकदमे की सुनवाई में शामिल होने के लिए आवश्यक यात्रा और पैरवी खर्च प्राप्त करने का अधिकार है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभू दत्त गुरु की खंडपीठ ने सूरजपुर कुटुंब न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए पति आशीष राय की अपील को खारिज कर दिया।मामला अंबिकापुर निवासी आशीष राय और विश्रामपुर निवासी अंजलि राय से जुड़ा है। दोनों के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है और पति ने सूरजपुर कुटुंब न्यायालय में तलाक की याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे से संबंधित खर्च देने की मांग की।

पति की ओर से आरटीआई के माध्यम से प्राप्त वेतन विवरण अदालत में प्रस्तुत किया गया, जिसमें बताया गया कि पत्नी सरकारी शिक्षिका है और उसे प्रतिमाह 71,482 रुपये वेतन मिलता है। वहीं पति संविदा आयुष चिकित्सा अधिकारी के पद पर कार्यरत है और उसकी मासिक आय लगभग 25,700 रुपये है। इसी आधार पर पति ने तर्क दिया कि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है, इसलिए उसे किसी प्रकार की वित्तीय सहायता नहीं दी जानी चाहिए।कुटुंब न्यायालय ने यह माना कि पत्नी अपने भरण-पोषण के लिए पर्याप्त आय अर्जित कर रही है, इसलिए उसे मासिक गुजारा भत्ता देने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि अदालत ने मुकदमे की पैरवी के लिए 3,000 रुपये एकमुश्त खर्च तथा प्रत्येक सुनवाई पर आने-जाने और भोजन संबंधी खर्च के लिए 1,000 रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया था।इस आदेश को चुनौती देते हुए पति ने हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन अदालत ने उसकी दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मामलों की सुनवाई के दौरान पक्षकारों को बार-बार अदालत में उपस्थित होना पड़ता है, जिससे यात्रा और अन्य खर्च होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में मुकदमे से जुड़े आवश्यक खर्च उपलब्ध कराना न्यायोचित है।अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राशि गुजारा भत्ता नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में प्रभावी रूप से भाग लेने के लिए आवश्यक व्यय है। साथ ही कोर्ट ने माना कि 3,000 रुपये की एकमुश्त राशि और 1,000 रुपये प्रतिमाह यात्रा एवं भोजन व्यय के रूप में दी गई रकम न तो अत्यधिक है और न ही इससे पति पर असामान्य आर्थिक बोझ पड़ता है।खंडपीठ ने कहा कि कुटुंब न्यायालय का आदेश पूरी तरह न्यायसंगत, विवेकपूर्ण और विधि सम्मत है। आदेश में किसी प्रकार की कानूनी या अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि नहीं पाई गई। इसलिए पति की अपील को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया गया।



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