
बिलासपुर/दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के DGP और DG जेल को अदालत की अवमानना के आरोप में सीधे जेल भेजने की चेतावनी दी है| यही नहीं,सुप्रीम अदालत ने ”कस्टोडियल डेथ” के एक मामले में सीबीआई को सीधी कार्यवाही करने के निर्देश दिए है | अदालत के निर्देश के बाद दिल्ली से सीबीआई की एक टीम बिलासपुर दाखिल हो गई है | जबकि,छत्तीसगढ़ शासन ने अदालत में पार्टी बन चुके DGP और DG जेल को 10 दिनों के बाद भी,उनके पदों से नहीं हटाया है |

राज्य के DGP को अयोग्य करार देते हुए कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सवाल किया,कि “श्रीमान DGP, इस देश में कस्टोडियल डेथ के मामले में 2 साल 7 महीने बाद FIR दर्ज करने पर क्या आपको किसी ट्रेनिंग की जरूरत है?” कोर्ट को गुमराह करने की तिकड़म पर बुरे फंसे DGP से अदालत का दूसरा सवाल-“पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि यह अदालत के साथ धोखा है। आपने पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखे बिना कस्टोडियल डेथ के मामले में हलफनामा कैसे दाखिल कर दिया? क्या आप चाहते हैं कि हम इसे स्वीकार कर लें?” इस पर DGP का जवाब-रिपोर्ट सेंट्रल जेल, बिलासपुर भेजी गई थी और इस मामले में जांच के आदेश दिए गए हैं। दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

DGP के इस रटे-रटाए जवाब पर कोर्ट ने आपत्ति करते हुए DGP को बताया,कि जांच रिपोर्ट 22 जुलाई 2024 को ही जमा हो चुकी थी। कोर्ट ने यह भी सवाल किया, कि रिपोर्ट जेल पहुंचने के बाद आखिर कहां चली गई,क्या उसे नष्ट कर दिया गया या कहीं दबा दिया गया?कोर्ट ने DGP से कहा कि आपने रिपोर्ट नहीं मिलने की बात कही, जबकि यही रिपोर्ट हाईकोर्ट में आपके हलफनामे के साथ दाखिल की गई थी। कोर्ट ने इसे अदालत को गुमराह करने की कोशिश बताया। सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि घटना 22 जनवरी 2024 की थी, लेकिन FIR काफी देर बाद दर्ज हुई। अदालत ने DGP से सवाल किया कि करीब ढाई साल तक आखिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई ?कोर्ट ने सवाल कि“और DG जेल क्या कर रहे थे? रिपोर्ट पर बैठे रहे ?” इसके बाद अदालत ने बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि “हमें यह दर्ज करना पड़ेगा कि छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह अक्षम हैं।” कोर्ट में छत्तीसगढ़ के DGP, DG जेल/प्रिजन और गृह विभाग के वरिष्ठ अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मौजूद थे।अब सुनवाई की वीडियो सोशल मीडिया में वायरल है |

छत्तीसगढ़ में ”कस्टोडियल डेथ” जैसे गंभीर मामलों में पुलिस के लचर रवैये और विवेचना में गंभीर लापरवाही सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई सक्रिय हो गई है|उसने एक टीम का गठन कर प्रकरण की उच्च स्तरीय जाँच शुरू कर दी है,माना जा रहा है,कि CBI की रडार में वो IPS अफसर भी शामिल बताए जाते है,जिनकी कार्यप्रणाली पर सर्वोच्च अदालत ने कड़ी आपत्ति जाहिर कर कायदे-कानूनों का गंभीर उल्लंघन पाया था| ऐसे अपीलीय और गैर-जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली को भी सीबीआई ने जाँच के घेरे में ले लिया है|

सूत्रों का दावा है,कि ”कस्टोडियल डेथ” के मामले में सीबीआई ”कर्तव्यविमुख” पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ भी आपराधिक प्रकरण दर्ज करने में कोताही नहीं बरतेगी ? उनके मुताबिक,मामले की जाँच-पड़ताल के लिए बिलासपुर में सीबीआई की एक टीम ने अपना डेरा डाल लिया है|सेंट्रल जेल बिलासपुर से लेकर पुलिस के थानों तक सीबीआई की सुगबुगाहट तेज़ है,यह भी बताया जाता है,कि घटना से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण साक्ष्यों और दस्तावेजों को सीबीआई की टीम ने एकत्रित करना भी शुरू कर दिया है|

जानकारी के मुताबिक,सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रदेश के ‘‘DGP” को “पूरी तरह अयोग्य” (Totally Incompetent) करार दिए जाने के बाद प्रदेश के DGP स्वयं भी अदालत में एक ”पार्टी” बन गए है| यही हाल,DG जेल का सामने आया है,लिहाज़ा दोनों ही अधिकारियों को फ़ौरन पद से हटाने की मांग भी शुरू हो गई है,मौजूदा ”DGP” की अकार्यकुशल कार्यप्रणाली से देश की सर्वोच्च अदालत से छत्तीसगढ़ शासन को शर्मनाक फटकार के दौर से गुजरना पड़ रहा है| सुप्रीम अदालत ने दोनों ही अफसरों को “अवमानना” की श्रेणी में पाते हुए सीधे जेल भेजने की चेतावनी भी दी है |अदालत से “पूरी तरह अयोग्य” ठहराए गए DGP को पद पर बनाए रखने का मामला अब सीबीआई जाँच के दौरान विवादों से घिरता नजर आ रहा है| “सुप्रीम कोर्ट” में पार्टी बन चुके ”DGP” को यथावत पद पर बनाए रखने से जाँच के प्रभावित होने के आसार बढ़ गए है|

सूत्रों के मुताबिक,सीबीआई जाँच दल को मैदानी स्तर पर पुलिस के असहयोगात्मक रवैये का सामना करना पड़ रहा है | जबकि,DGP को यथावत कुर्सी पर बनाए रखने के मामले को लेकर पीड़ित परिवार और याचिकाकर्ता भी राज्य सरकार की मंशा को हैरानी भरी निगाहों से देख रहे है| DGP को फ़ौरन पद से हटाए जाने की मांग से जुड़ी एक याचिका के अब कोर्ट में दायर किए जाने की तैयारी जोरों पर बताई जाती है| इस याचिका में दावा किया गया है,कि अकार्यकुशल DGP समेत ”कस्टोडियल डेथ’‘ घटना को लेकर ”गैर जिम्मेदाराना” रुख़ अपनाने वाले अन्य अधिकारियों को पद हटाए बग़ैर निष्पक्ष जाँच की कल्पना करना बेमानी है ? ‘‘कस्टोडियल डेथ” घटना से सीधे जुड़े तमाम संबंधित अधिकारियों को फौरन हटाए जाने के लिए छत्तीसगढ़ शासन को पुनः सख़्त दिशा-निर्देश दिए जाने की मांग से जुडी इस याचिका की चर्चा,अदालती गलियारों में जोरों पर है|

यह भी बताया जाता है,कि DGP चयन के दौरान योग्य अधिकारियों को दरकिनार कर “अयोग्य DGP” समेत “तिकड़म” कर अन्य आईपीएस अधिकारियों की वरिष्ठता सूची में हेर-फेर और मनचाहे अधिकारियों का नाम ”DGP पैनल” में शामिल करने के तथ्यों
को भी इस याचिका के जरिए अदालत के संज्ञान में लाए जाने की जानकारी प्राप्त हुई है| याचिका के तथ्यों के मुताबिक,प्रदेश में “अयोग्य” आईपीएस को DGP बनाए जाने की सिफारिश करने वाले योग्य एवं वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवालियां निशान लगाया गया है| इसमें साफ़ किया गया है,कि कुपात्रों को (अपनों को) सुविधानुसार DGP जैसे उच्च पद पर तैनात करने के लिए योग्य अधिकारियों को पैनल की प्रतियोगिता सूची से बाहर का रास्ता दिखाया गया था | इसके चलते अदालत में छत्तीसगढ़ शासन की मंशा पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है | DGP और DG जेल की कार्यप्रणाली से प्रदेश में “कस्टोडियल डेथ” का ग्राफ साल दर साल इज़ाफ़ा हो रहा है |
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सूत्र यह भी तस्दीक करते है,कि सीबीआई ने बिलासपुर के सीपत क्षेत्र स्थित उस थाने के तत्कालीन पुलिस एवं जेल अधिकारियों समेत कथित विचाराधीन बंदी के पोस्टमार्टम के दौरान उपस्थित डॉक्टरों से संपर्क स्थापित किया है | बिलासपुर के मोहरा इलाके में रहने वाले श्रवण सूर्यवंशी (34) को आबकारी एक्ट के मामले में स्थानीय सीपत थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उसे 19 जनवरी 2024 को पुलिस ने केंद्रीय जेल बिलासपुर में दाखिल कराया था,लेकिन जेल में उसकी तबीयत लगातार बिगड़ते रही| उसे गंभीर अवस्था में 21 जनवरी 2024 को सिम्स अस्पताल में भेजा गया,लेकिन पीड़ित की जान नहीं बच सकी| बताते है,कि सिर्फ श्रवण सूर्यवंशी की ही नहीं,बल्कि ऐसे दर्जनों पीड़ितों को ”कस्टोडियल डेथ” का शिकार होना पड़ा है| मृतक श्रवण के परिजनों के सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने मात्र के बाद से प्रदेश में पुलिसिंग व्यवस्था सवालों के घेरे में है|

छत्तीसगढ़ में पुलिस के थानों से लेकर जेल अभिरक्षा में मौतों के आंकड़े चौंकाने वाले है,अपराध मामलों के जानकारों के मुताबिक,पुलिस हिरासत में मार-पिटाई,प्रताड़ना (टॉर्चर) करने के बाद आरोपियों को जेल दाख़िल करा दिया जाता है | इस दौरान गिरफ्तार व्यक्ति की मेडिकल रिपोर्ट सिर्फ औपचारिकता बन कर सिमट जाती है| एक जानकारी के मुताबिक,2021 में 71 मौतें, 2022 में 90, 2023 में 57 और 2024 में 67 मौतों ने देश की सर्वोच्च अदालत के सामने पुलिस की छवि को तार-तार कर दिया है| राज्य में औसतन “कस्टोडियल डेथ” का आंकड़ा बढ़ते क्रम में आने से पुलिस की मंशा पर भी सवाल खड़े हो गए है| बीते 4 वर्षो पर गौर फरमाएँ तो,ऐसी मौत का आंकड़ा 285 पार हो चुका है। जबकि,2025 में 55 और 31 मार्च 2026 तक हिरासत में 14 मौतों की जानकारी सामने आई है। दूसरी ओर पुलिस हिरासत में होनी वाली मौतों की जाँच-विवेचना में भारी लापरवाही सामने आई है | प्रदेश के पहले निष्क्रिय DGP और DG जेल की कार्यप्रणाली के चलते दर्जनों परिवार इन दिनों इंसाफ की गुहार लगा रहे है |

सूत्र तस्दीक करते है,कि कभी फ़र्जी तौर पर गुनाह कबूल करवाने तो कभी,अवैध वसूली के लिए पुलिस टॉर्चर से जुड़ी गंभीर दास्तानें ”कस्टोडियल डेथ” की ”क्राइम स्टोरी” का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है| ऐसे गुनाहों में शामिल पुलिस कर्मियों की लम्बी फ़ेहरिस्त बताई जाती है,जिसमे गिने-चुने कर्मियों को दोषी ठहराया गया,जबकि थाना प्रभारी से लेकर उच्च अधिकारियों को जाँच अधिकारियों ने अपने ही स्तर पर क्लीनचीट देने में कोई देरी नहीं की थी| ऐसे संदेही अधिकारियों के हितों का विवेचना के दौरान बखूबी ख्याल रखा गया था| यह भी तस्दीक की जाती है,कि ”कस्टोडियल डेथ” में संलग्न पाए गए,कई पुलिस अधिकारियों के प्रति पुलिस मुख्यालय के उदार रवैये से विवादित पुलिस अधिकारी मनचाही पोस्टिंग पाने में भी कामयाब रहे है| छत्तीसगढ़ में बीते 3 सालों में ”कस्टोडियल डेथ” के मामलों में अचानक आई तेज़ी के लिए पुलिस मुख्यालय की ग़ैर-जिम्मेदार कार्यप्रणाली सामने आई है|

जानकारों के मुताबिक,सुप्रीम कोर्ट का श्रवण सूर्यवंशी की मौत मामले में ताजा हस्तक्षेप केवल एक व्यक्ति की मौत का मामला अकेला नहीं बताया जाता है,बल्कि यह सवाल खड़ा करता है,कि हिरासत में होने वाली मौतों की जांच पुलिस के अपने स्तर में कितनी स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध होती है ? अगर किसी मामले में न्यायिक जांच रिपोर्ट आने के बाद भी FIR के लिए पीड़ित परिवार को ढाई साल से ज्यादा समय का इंतजार करना पड़े और पुलिस मुख्यालय अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ ले तो,आखिरकार सिस्टम का क्या होगा ? ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट को मामले की जांच CBI को सौंपनी पड़े,तो राज्य सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठना लाज़िमी है।

प्रदेश में ”कस्टोडियल डेथ” के मामलों में जहाँ तेज़ी आई है,वही ऐसे गंभीर प्रकरणों की जाँच पड़ताल को लेकर पुलिस का विवादित रवैया भी सामने आया है|कई मौकों पर पूछताछ के नाम पर उगाही का मकसद,तो कभी संदेहियों के साथ मारपीट और झूठे केस में फंसाने के नाम पर ”कस्टोडियल डेथ” के मामले सामने आए है| इन मामलों में दोषियों को ”क्लीनचिट” देने और पीड़ितों की सुध तक नहीं लेने के मामले में प्रदेश का ”पुलिस मुख्यालय’‘ और ”DGP’‘ प्रशासनिक हलकों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सुर्खियां बटोर रहे है|सुप्रीम कोर्ट DGP और DG जेल समेत गृह सचिव को फटकार लगा रहा है|लेकिन,सीबीआई जाँच शुरू होने के बावजूद भी जाँच के घेरे में आए अफसर ”मौज़-मस्ती” के साथ अपनी कुर्सी में जमे हुए है |

गौरतलब है,कि सुप्रीम कोर्ट ने ”कस्टोडियल डेथ” की विवेचना से जुड़े एक मामले में ”DGP” को फटकार लगाते हुए, अयोग्य (Totally Incompetent) करार दिया था| इसी माह अगस्त 2026 में कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) के एक मामले की सुनवाई के दौरान Supreme Court ने छत्तीसगढ़ पुलिस महानिदेशक (DGP) अरुण देव गौतम को लेकर “पूरी तरह अयोग्य” (Totally Incompetent) टिप्पणी की है। अदालत ने यह सख्त टिप्पणी मामले में एफआईआर दर्ज करने में ढाई साल की देरी और लीपापोती करने के रैवये पर नाराजगी जताते हुए की थी| सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई ने राज्य का रुख़ तो कर लिया है,बिलासपुर में उसकी एंट्री से पुलिस मुख्यालय में गहमा-गहमी तेज़ है,लेकिन अपने पदों पर जमे अफसर अब सीबीआई जाँच को प्रभावित करने में भी कोई कसर बाकि नहीं छोड़ रहे है |

बताते है,कि घटनाक्रम से जुड़े पुलिस के स्थानीय निचले स्तर के कई कर्मी अपनी जुबान खोलने से कतरा रहे है,दरअसल वरिष्ठ अधिकारियों के पद और प्रभाव के बैनर तले हकीकत बयां करने के मामले में उनकी जुबान अभी से लडखड़ाने लगी है | उधर,वैधानिक कार्यवाही के लिए DGP समेत अन्य अफसरों के ख़िलाफ़ राज्य सरकार ने अभी तक कोई कदम नहीं उठाए है | इस मामले को लेकर “न्यूज़ टुडे छत्तीसगढ़” ने गृहमंत्री समेत राज्य सरकार के जिम्मेदार अफसरों से संपर्क किया,लेकिन कोई प्रतिउत्तर प्राप्त नहीं हो पाया |







