
रायपुर/नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट से “पूरी तरह अयोग्य” (Totally Incompetent) होने की मुहर के बाद भी छत्तीसगढ़ में एक बार फिर नए DGP की तलाश को लेकर प्रशासनिक मशीनरी पसोपेश में बताई जाती है। सुप्रीम कोर्ट से अयोग्यता की मुहर लगने के बावजूद DGP को पद पर बनाए रखने का मामला राज्य की आम जनता की जुबान पर है। अब सवाल उठ रहा है,कि ऐसे अयोग्य DGP को पुलिस मुख्यालय में ”लादने” का सिलसिला आखिर कब तक जारी रहेगा ?

तस्दीक की जाती है,कि सिर्फ “हिरासत में मौत” ही नहीं बल्कि,आम जनता से जुड़े तमाम शिकायती मामलों के निपटारा करने के बजाए पीड़ितों से दूरियां बनाने वाले DGP को आखिर कितने और दिनों तक ”ढोया” जाएगा ? छत्तीसगढ़ के भारी-भरकम निष्क्रिय DGP की कार्यप्रणाली शुरूआती दौर से ही सुर्ख़ियों में है|

यह भी बताया जाता है,कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली राज्य की बीजेपी सरकार को भी DGP की अयोग्यता का जमकर ख़ामियाजा उठाना पड़ रहा है|यह भी सवाल उठ रहा है,कि मौजूदा DGP की अयोग्यता से ”भली-भांति” वाकिफ छत्तीसगढ़ सरकार ने आखिर क्यों योग्य अधिकारियों को दरकिनार कर दिया था ? DGP जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर अयोग्य अधिकारी की नियुक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ सरकार की छवि पर करारी चोट कर आम जनता को सोचने पर मजबूर कर दिया है ?

सुप्रीम कोर्ट की “पूरी तरह अयोग्य” (Totally Incompetent) मुहर के बाद नए और चुस्त-दुरुस्त DGP की तैनाती की मांग जोरों पर है| प्रदेश की कानून व्यवस्था और नागरिक सुरक्षा को लेकर आम जनता का सवाल ”लाज़िमी” बताया जा रहा है| अब अयोग्य DGP को हटा कर योग्य ”DGP” की तैनाती के लिए छत्तीसगढ़ सरकार कब फैसला लेगी ? इस ओर लोगों की निगाहें लगी हुई है |

जानकारी के मुताबिक,छत्तीसगढ़ सरकार ने 1992 बैच के आईपीएस अरुण देव गौतम की 16 मई 2026 को पूर्णकालिक DGP के पद पर नियुक्त की थी|अरुण देव गौतम फरवरी 2025 में छत्तीसगढ़ के कार्यवाहक डीजीपी बनाए गए थे। पूर्णकालिक नियुक्ति से पहले वे लगभग 17 महीनों तक प्रभारी डीजीपी के रूप में कार्यरत थे। बतौर एसपी उनका पहला जिला भोपाल था। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ कैडर चुना था। यहां वे कोरिया, रायगढ़, जशपुर, राजनांदगांव, सरगुजा और बिलासपुर जैसे छह महत्वपूर्ण जिलों के एसपी रह चुके हैं।छत्तीसगढ़ में 6 जिलों के एसपी, 2 रेंज के आईजी और गृह सचिव के रूप में कार्य कर चुके हैं।

छत्तीसगढ़ में पुलिस थानों से लेकर अपराधों की विवेचना पर सतत निगरानी बनाए रखने के लिए DGP की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण बताई जाती है| किसी भी राज्य में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ ”नागरिक सुरक्षा” पर DGP की पैनी नज़र उसकी कार्यप्रणाली का मुख्य अंग माना जाता है| लेकिन,छत्तीसगढ़ में DGP का पद सिर्फ “अलंकरण” तक सीमित हो जाने से मैदानी स्तर से लेकर पुलिस मुख्यालय तक हज़ारों पीड़ितों को न्याय की गुहार के लिए अदालतों की शरण लेनी पड़ रही है|

यह भी तस्दीक की जाती है,कि प्रदेश के DGP की अयोग्यता का खामियाजा सिर्फ आम जनता ही नहीं बल्कि,पूरे पुलिस तंत्र को भुगतना पड़ रहा है,पीड़ित जनता के अलावा सैंकड़ों पुलिस कर्मियों के शिकायती प्रकरणों का नियमानुसार निराकरण नहीं करने से “खाकी वर्दी” के प्रति बढ़ता अविश्वास देश के सुप्रीम कोर्ट में नजर आने से बीजेपी सरकार भी सवालों के घेरे में है| यही कारण है,कि राज्य में पुलिस तंत्र की विफलता,निष्क्रियता और मनमानी के चलते छत्तीसगढ़ सरकार की साख पर इन दिनों “कानून का डंडा” भी चलने लगा है |

कस्टडी में हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने छत्तीसगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर ना केवल कड़ी नाराजगी जताई,बल्कि अदालत ने मामले की विवेचना और कार्रवाई में हुई देरी और जांच के तरीके पर सवाल उठाया है | उसने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) अरुण देव गौतम को ‘‘पूरी तरह अयोग्य’’ तक करार दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उस याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी|

जानकारी के मुताबिक,पीड़ित परिवार में मृतक श्रवण सूर्यवंशी की पत्नी और दो बेटियों ने अदालत में दायर याचिका में आरोप लगाया, कि पुलिस हिरासत में प्रताड़ना के कारण उनके पति और पिता की मौत हुई थी।मामला जनवरी 2024 का बताया जाता है। इसके मुताबिक,18 जनवरी 2024 को बिलासपुर जिले की सीपत पुलिस ने श्रवण सूर्यवंशी (उम्र-34 वर्ष ) को आबकारी एक्ट के तहत 12 सौ रुपए की कच्ची महुआ शराब के मामले में गिरफ्तार किया गया था। इस गिरफ्तारी के बाद उसे केंद्रीय जेल बिलासपुर में निरुद्ध किया गया था | जबकि,21 जनवरी को तबीयत बिगड़ने पर उसे (विचाराधीन बंदी) सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी की सुबह इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई थी।

पीड़ित परिवार का आरोप है कि पुलिस हिरासत में श्रवण सूर्यवंशी को जमकर टॉर्चर कर जेल दाख़िल कराया गया था | उसकी मौत होने के बावजूद पुलिस ने फ़ौरन कार्यवाही ना करते हुए, लगभग ढाई साल बाद 30 जुलाई 2026 को FIR दर्ज की थी। पीड़ितों ने सुप्रीम कोर्ट में इतने गंभीर प्रकरण के बावजूद FIR दर्ज करने में बरती गई,देरी और लेटलतीफ़ी को लेकर राज्य सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए थे।यह भी जानकारी सामने आई है,कि पीड़ित परिवार ने पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मामले की निष्पक्ष जांच और 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी|

हालांकि, हाईकोर्ट ने घटना के जांच के निर्देश दिए बिना केवल 1 लाख रुपये का मुआवजा देकर मामले का निपटारा कर दिया था। हाई कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली| सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद 1 लाख रुपये का मुआवजा ‘पूरी तरह अपर्याप्त’ बताया है | यही नहीं,उसने यह भी साफ़ किया,कि मुआवजा परिवार को हुए नुकसान के अनुरूप नहीं है।सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के गृह सचिव और DGP को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का निर्देश दिया था।

DGP ने अदालत को बताया कि जांच के आदेश दे दिए गए हैं और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। लेकिन, अदालत इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में कहा था कि गिरफ्तारी के समय मेडिकल जांच में कोई गंभीर चोट नहीं मिली थी। हालांकि बाद में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176 के तहत हुई न्यायिक जांच में यह निष्कर्ष सामने आया कि मौत सिर पर कुंद हथियार से लगी चोट के कारण हुई जटिलताओं से हुई थी। सुनवाई के दौरान DGP के जवाब पर कोर्ट नाराज नजर आया |छत्तीसगढ़ के DGP ने FIR दर्ज करने में देरी का कारण न्यायिक जांच रिपोर्ट समय पर नहीं मिलने को बताया, तो जस्टिस संदीप मेहता ने DGP को फटकार लगाते हुए कहा, कि वही रिपोर्ट राज्य सरकार के हलफनामे के साथ पहले से हाईकोर्ट में रिकॉर्ड पर मौजूद थी।

इस पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘हर पहलू पर कोर्ट को गुमराह किया जा रहा है।’जब DGP ने यह भी कहा कि उपलब्ध रिपोर्ट से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, तो जस्टिस मेहता ने सवाल किया कि ‘कुंद हथियार से सिर पर चोट लगने से मौत का क्या मतलब है? हमें बताइए।’’इसके बाद अदालत ने कहा कि ‘हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह से अयोग्य हैं।’’सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि राज्य पुलिस निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं दिखती है, तो मामले की जांच किसी अन्य एजेंसी को सौंपी जा सकती है। अदालत ने कहा, कि अब यह तय करना होगा कि जिम्मेदारी तय करने का काम राज्य पुलिस करे या किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपा जाए। कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने में ढाई साल की गंभीर देरी और कोर्ट को गुमराह करने पर कड़ी नाराजगी जताई और अवमानना की चेतावनी भी दी।

आम जनता का मानना है,कि DGP जैसे पद पर योग्य अफसरों के चयन पर राजनैतिक और तिकड़मी फैसले नहीं होने चाहिए,बल्कि योग्य अफसरों को ही,ऐसे पदों पर नियुक्त किया जाना चाहिए| फ़िलहाल,पुलिस मुख्यलाय से लेकर मंत्रालय तक DGP की निष्क्रियता के किस्से आम है|देखना गौरतलब होगा,कि आखिर कब जिम्मेदार और सक्रिय अधिकारी को DGP की कुर्सी सौंपी जाएगी|




