
नई दिल्ली/रायपुर : हिरासत में मौत (कस्टोडियल डेथ) के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस अधिकारियों की लापरवाही पर तीखी टिप्पणी करते हुए छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) को “पूरी तरह अयोग्य तक कह दिया। इतना ही नहीं, अदालत ने भ्रामक जानकारी देने पर अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी भी दी।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने की। याचिका एक व्यक्ति की पत्नी और बेटियों की ओर से दायर की गई थी, जिनका आरोप है कि जनवरी 2024 में पुलिस हिरासत के दौरान कथित यातना के कारण उनके पति और पिता की मौत हुई। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि घटना के काफी समय बाद, जुलाई 2026 में एफआईआर दर्ज की गई, जिससे जांच में गंभीर देरी हुई।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि न्यायिक जांच रिपोर्ट में मृतक की मौत सिर पर किसी भारी वस्तु से लगी चोट के कारण होना बताया गया था। इसके बावजूद लंबे समय तक संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की गई। जब डीजीपी ने देरी का कारण न्यायिक जांच रिपोर्ट समय पर नहीं मिलने को बताया, तब अदालत ने इस दलील पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि यह रिपोर्ट पहले से ही रिकॉर्ड का हिस्सा थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब तक की कार्रवाई से यह भरोसा नहीं होता कि राज्य पुलिस इस मामले की निष्पक्ष जांच करने में सक्षम है। अदालत ने संकेत दिया कि आवश्यकता पड़ने पर जांच किसी अन्य एजेंसी को भी सौंपी जा सकती है।
साथ ही राज्य के गृह सचिव और डीजीपी से पूरे मामले पर जवाब भी तलब किया गया है। इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पीड़ित परिवार को एक लाख रुपये का मुआवजा दिया था, लेकिन एफआईआर दर्ज करने या स्वतंत्र जांच के निर्देश नहीं दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुआवजे को भी अपर्याप्त बताते हुए मामले की गंभीरता के अनुरूप कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया है। फिलहाल, मामला आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।




