रायपुर :भारतीय संत परंपरा और सिंधी समाज के इतिहास से जुड़ी एक महत्वपूर्ण विभूति पूज्य माता साहिब हासी देवी की 200वीं जयंती पर 22 अक्टूबर को रायपुर में ऐतिहासिक आयोजन होने जा रहा है. भारत सरकार उनके सम्मान में ₹200 का स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट जारी करेगी. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू लोक भवन में आयोजित समारोह में इसका विमोचन करेंगी. 317 वर्ष पुराने शदाणी दरबार की पंचम पीठाधीश रहीं माता हासी देवी ने अपना संपूर्ण जीवन भक्ति, सेवा, शिक्षा और मानव कल्याण को समर्पित किया था. इसी योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान दिया जा रहा है.



राष्ट्रपति करेंगी स्मारक सिक्के और डाक टिकट का विमोचन

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 22 से 23 अक्टूबर तक छत्तीसगढ़ के दौरे पर रहेंगी. 22 अक्टूबर को रायपुर के लोक भवन में आयोजित विशेष समारोह में वह पूज्य माता साहिब हासी देवी के सम्मान में ₹200 का स्मारक सिक्का जारी करेंगी. इसी अवसर पर माता हासी देवी को समर्पित विशेष डाक टिकट का भी विमोचन किया जाएगा. इसके बाद राष्ट्रपति नुआखाई पर्व के अवसर पर आयोजित 'सेवा सम्मान पर्व' और 'युवा प्रबोधन' कार्यक्रम में भी शामिल होंगी. 23 अक्टूबर को राष्ट्रपति जगदलपुर पहुंचकर बस्तर दशहरा के दौरान आयोजित "मुरिया दरबार" में हिस्सा लेंगी और जनसभा को संबोधित करेंगी.


शदाणी दरबार के सचिव उदय साईं के अनुसार यह स्मारक सिक्का कोलकाता टकसाल में तैयार किया गया है. सिक्के का वजन 35 ग्राम रखा गया है, जिसमें 50 प्रतिशत चांदी, 40 प्रतिशत तांबा, 5 प्रतिशत निकल और 5 प्रतिशत जस्ता का उपयोग किया गया है. भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने इस विशेष स्मारक सिक्के के 550 सिक्कों का निर्माण कराया है. विमोचन के बाद श्रद्धालु और सिक्का संग्राहक शदाणी दरबार की विभिन्न इकाइयों के माध्यम से इसकी बुकिंग कर सकेंगे.


पूज्य माता साहिब हासी देवी सिंधी समाज की महान आध्यात्मिक संत और रायपुर स्थित शदाणी दरबार की पंचम पीठाधीश थीं. उनका जन्म वर्ष 1826 में सिंध प्रांत के खानपुर महर में हुआ था. बचपन से ही उनका झुकाव भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक जीवन की ओर था. सन 1852 में मात्र 26 वर्ष की आयु में वे शदाणी दरबार की पहली महिला पीठाधीश्वर बनीं. उन्होंने लगभग 57 वर्षों तक धार्मिक और सामाजिक कार्यों का नेतृत्व किया.माता हासी देवी को भक्ति और सेवा की प्रतिमूर्ति माना जाता है. उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव सेवा, भजन-कीर्तन और ईश्वर आराधना के लिए समर्पित कर दिया. वह शिक्षा और संस्कारों के प्रसार की पक्षधर थीं. उन्होंने हिंदी, संस्कृत और संगीत शिक्षा को बढ़ावा दिया तथा जनहित के अनेक कार्यों से लोगों को जोड़ा. गरीबों, विधवाओं और जरूरतमंदों की सहायता के लिए भी वे हमेशा आगे रहती थीं. उनके जीवन से जुड़े कई सेवा कार्य आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रेरणा स्रोत माने जाते हैं.