छत्तीसगढ़ में अंधविश्वास की ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जहां शक की आग में रिश्ते जल रहे हैं और गड़े खजाने की लालच में इंसानियत दम तोड़ रही है। किसी की बीमारी हो, परिवार में लगातार परेशानियां हों या आर्थिक नुकसान—कई बार इन सबका जिम्मेदार जादू-टोने को मान लिया जाता है। फिर शुरू होता है शक, आरोप और प्रताड़ना का सिलसिला। हालात इतने भयावह हो जाते हैं कि लोग अपने ही पड़ोसियों और रिश्तेदारों को निशाना बनाने से पीछे नहीं हटते। दावा है कि पिछले पांच वर्षों में छत्तीसगढ़ में जादू-टोने और अंधविश्वास से जुड़े मामलों में करीब 90 लोगों की जान जा चुकी है। वहीं, गड़े हुए सोने को हासिल करने और रातोंरात अमीर बनने की चाह भी कई बार गंभीर अपराधों की वजह बनती है। तंत्र-मंत्र और चमत्कार के नाम पर फैलाए जाने वाले भ्रम लोगों को ऐसे रास्ते पर ले जाते हैं, जहां लालच और अंधविश्वास का अंत हत्या जैसी खौफनाक वारदातों में होता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अंधविश्वास के नाम पर अपनों का ही खून क्यों बहाया जा रहा है? छत्तीसगढ़ में टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2005 के तहत टोनही बताकर प्रताड़ित करने जैसे कृत्यों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। वहीं, हत्या और दूसरे गंभीर अपराधों में भारतीय न्याय संहिता के तहत सजा दी जा सकती है। इसके बावजूद ऐसी घटनाएं जागरूकता और सामाजिक सोच में बदलाव की जरूरत को उजागर करती हैं। बीमारी का इलाज विज्ञान और चिकित्सा में तलाशने के बजाय जादू-टोने को जिम्मेदार ठहराना, या गड़े खजाने के लालच में किसी की जान लेना, किसी भी सभ्य समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है। कानून अपना काम करता है, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या सिर्फ सजा से इस मानसिकता को खत्म किया जा सकता है? जब तक अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता नहीं बढ़ेगी और लोग अफवाहों के बजाय तर्क पर भरोसा करना नहीं सीखेंगे, तब तक शक और लालच की यह आग रिश्तों को झुलसाती रह सकती है।
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