1 - जंगल में मोर नाचा किसने देखा ? राज्योत्सव का नया रंग 

कभी छत्तीसगढ़ का राज्योत्सव ऐसा आयोजन हुआ करता था, जिसका इंतजार प्रदेशभर के लोगों को रहता था। कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने के लिए भीड़ उमड़ती थी, प्रवेश पास हासिल करने की होड़ लगती थी और समारोह की रौनक कई दिनों तक चर्चा में रहती थी। लेकिन कुछ वर्षो से राज्योत्सव का रंग कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है। पुरानी कहावत ‘जंगल में मोर नाचा, किसने देखा?’ रायपुर के राज्योत्सव पर सटीक बैठती दिखाई दे रही है, आरोपों और चर्चाओं से इतर सवाल यह है कि राजधानी में आयोजित मुख्य समारोह की गूंज आखिर कितने लोगों तक पहुंच पा रही है?

 राजधानी का मुख्य आयोजन अब पहले जैसी व्यापक जनभागीदारी के बजाय मड़ई-मेला और नवोदित कलाकारों के मंच तक सिमटता क्यों नजर आ रहा है। कई वरिष्ठ रंगकर्मी - कलाकार तस्दीक करते है कि उन्हें पुरानी पीढ़ी का बताकर ख़ारिज कर दिया जाता है। जबकि ऊँची पहुंच वालों को मौंके पर मौंका दिए जाते है। हालांकि इसका दूसरा पहलू भी चर्चा में है। प्रदेश के कई जिलों में राज्योत्सव के कार्यक्रम लोगों के बीच उत्साह और आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। वहां स्थानीय कलाकारों से लेकर कभी बॉलीवुड तो कभी भीड़ जुटाने योग्य चेहरों को मंचों पर उतारा जाता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब जिलों में राज्योत्सव की धूम दिखाई दे रही है, तो राजधानी का मुख्य समारोह अपेक्षित - उपेक्षित क्यों है। समारोह स्थल में लोगों की भीड़ क्यों नहीं जुट रही है।

बताते है कि प्रदेश की संस्कृति, उपलब्धियों और जनभागीदारी का परिचय कराने वाले सरकारी स्टॉल तक बमुश्किल आस -पास के गाँव के लोग पहुंचते है, या फिर सम्बंधित विभाग के कर्मियों - अधिकारियो के घर - परिवार। नवा रायपुर को रायपुर शहर से जोड़ने वाले मार्गो में आवागमन की कोई समस्या नहीं ? फिर भी दर्शक दीर्घा खाली, यही ग्रामीण आबादी राज्योत्सव की नाक बचाने में कारगर साबित हो रही है। फ़िलहाल जनभागीदारी से परे राज्योत्सव की रंगत पर निखार का इंतजार लम्बा हो चला है, अब तो लोग कहने लगे है, आयोजक और आयोजन दोनों का उद्देश्य समझ से परे है ? क्या राज्योत्सव का उद्देश्य केवल आयोजन करना रह गया है या इसे प्रदेश का अविस्मरणीय बड़ा उत्सव बनाने की जरूरत है? फ़िलहाल प्रदेश में राज्योत्सव की धूम शुरू हो गई है, इस बीच धान ख़रीदी के मुद्दे पर मुख्य विपक्षी दल की धमाचौकड़ी जारी है। 

2 - सत्ता के सौदागार बनाम  महादेव एप्प ऑनलाइन ''सट्टा सेवा संस्थान'' 5 करोड़ का बजट  

छत्तीसगढ़ में पुलिस महकमे के भीतर प्रभावशील अफसरों की नई रोजगार नीति से उन पुलिस अफसरों के अरमानों पर पानी फिर रहा है, जो नियमों के तहत सट्टा - जुआ पर पाबन्दी लगाने के लिए रोजाना अपना पसीना बहा रहे है। तस्दीक की जाती है कि महादेव एप्प ऑनलाइन सट्टा के कारोबारी अफसरों ने पुलिस महकमे के भीतर अपना नया कैडर बना लिया है। इसके फाउंडर मेम्बरों में 2001 बैच के आईपीएस आनंद छाबड़ा, 2005 बैच के शैख़ आरिफ और 2007 बैच के आईपीएस प्रशांत अग्रवाल ने एक कार्यशाला में  करीब 5 करोड़ का बजट पेश किया था।

सूत्रों के मुताबिक ऑनलाइन सट्टा कारोबार की चुनौती और भविष्य में होने वाली छप्पड़ फाड़ कमाई पर केंद्रित इस कार्यशाला में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए है, इनमे उन पुलिसकर्मियों - अधिकारियों को सुरक्षित मैदानी स्थलों में तैनाती के लिए तिजोरी खोलकर खर्च करने के मामले में सहमति प्रदान की गई, जिन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री भू - PAY बघेल के कार्यकाल में दुबई निवासी सटोरिये सौरभ चंद्राकर का खुलकर साथ दिया था।

यह भी बताया जाता है कि महकमे के भीतर ''मनचाही पोस्टिंग'' प्रदान करने के मामलों में भी उदारता बरते जाने पर सहमति बनी है, इसके तहत उन अनुभवी अधिकारियों के ऊपर  ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए दिल खोलकर खर्च किया जाएगा, जिन्हे सट्टा पैनल चलाने का तजुर्बा है। उन्हें भी भरपूर संरक्षण दिया जायेगा, जिन्होंने महादेव एप्प ऑनलाइन सट्टा पैनल को गाँव कस्बों तक स्थापित करने में खुलकर क़ायदे - कानूनों की धज्जियां उड़ाई थी। आईपीएस अधिकारियों समेत स्टेट पुलिस सर्विस के अधिकारियों की कार्यप्रणाली फिर सुर्ख़ियों में है।

तस्दीक की जाती है कि 5 करोड़ के पैकेज को ध्यान में रखते हुए ''सत्ता के सौदागरों'' ने महादेव एप्प सट्टा कारोबार में लिप्त पाए गए पुलिस अधिकारियों को ''मनचाही पोस्टिंग'' हाथो - हाथ देने की कार्य योजना को ''अमलीजामा'' भी पहना दिया है। हालिया जारी DSP - ASP और थानेदारों की तबादला सूची में ''सट्टा कारोबार के संरक्षक गणो'' का बखूबी ध्यान रखा गया है। उन्हें मनचाही पोस्टिंग प्रदान करने का मामला सत्ता की मनमानी से जोड़कर देखा जा रहा है। आश्चर्यजनक, कभी सुशासन तो कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस नीति के पालन का दावा करने वाली पार्टी की नाक के नीचे ही ऑनलाइन सट्टा घोटाले की नीव रखने वाले पुलिस अफसर कभी इधर तो कभी उधर इंटरटेनमेंट पोस्टिंग शो का नमूना पेश कर रहे है। बताते है कि ऐसे अफसरों का जंगल राज अभी भी सत्ता के गलियारे में फल - फूल रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि धूर्त अफसरों को सबक सीखाने के मामले में सत्ताधारी दल की सरकार आखिर क्यों फिसड्डी साबित हो रही है। सत्ता के स्वाद ने क्या इसके कर्णधारों को भी सटोरियों का गुलाम बना दिया है ? फ़िलहाल ASP ट्रांसफर सूची  प्रशासनिक महकमें से लेकर राजनीतिक गलियारों में सुर्खियां बटोर रही है।  


3 - स्मृति पटल से गायब हुई स्मृति ईरानी ? रवानगी के 48 घंटे बाद फिर पुराने ''मोड़'' पर छत्तीसगढ़ सरकार

छत्तीसगढ़ प्रभारी स्मृति ईरानी की पाठशाला किस नेता को याद नहीं ? जिसने भी क्लासरूम में दस्तक दी, उसे केंद्र और राज्य सरकार ही नहीं बल्कि बीजेपी का मूल मंत्र बताया गया, दिलचस्प बात यह है कि स्मृति ईरानी के रायपुर से उड़ान भरते अभी 48 घंटे भी नहीं बीते की ''सरकार'' फिर वही पुराने ढर्रे पर नजर आने लगी है। राज्य के गृह मंत्रालय ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षकों की जो तबादला सूची जारी की, उसने साफ़ कर दिया कि संगठन चाहे जो राग अलाप ले ''सरकार'' अपनी राह में है, होई वही जो ''नगद नारायण रची राखा'' मतलब नगद दो, काम लो। छत्तीसगढ़ में बीजेपी संगठन और सरकार को अनुशासन, जवाबदेही और सुशासन का पाठ पढ़ाने वाली स्मृति ईरानी के दौरे को अभी 48 घंटे भी नहीं बीते थे कि पुलिस महकमे में ASP की तबादला सूची पर अदृश्य मुहर लग गई। जब यह सूची जारी हुई तो बवाल मचना लाज़िमी था। सो अब यह नई बहस छिड़ गई है कि क्या महादेव एप्प सटोरियों और उनके कारोबार का अभी भी ध्यान रखा जा रहा है ?

छत्तीसगढ़ प्रभारी के रूप में स्मृति ईरानी की बैठकों में नेताओं और मंत्रियों को संगठन की रीति-नीति के साथ सरकार की प्राथमिकताओं का संदेश दिया गया था। लेकिन अब गृह विभाग की ओर से जारी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षकों (ASP) की तबादला सूची को लेकर सवाल उठने लगे हैं। चर्चा है कि जिन अधिकारियों के कामकाज और पिछली तैनाती को लेकर सवाल उठते रहे हैं, उन्हें महत्वपूर्ण मैदानी जिम्मेदारियां कैसे मिल गईं? क्या तबादलों में कार्यक्षमता और अनुशासन को प्राथमिकता दी गई या फिर प्रभाव और पसंद और नगद नारायण का समीकरण हावी रहा?सबसे गंभीर सवाल उन पुलिस अधिकारियों की पोस्टिंग को लेकर है, जिनके नाम महादेव ऑनलाइन सट्टा मामले से जुड़े आरोपों और चर्चाओं में सामने आते रहे हैं, तबादला सूची ने पुलिस महकमे में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को तेज कर दिया है।

सुशासन का दावा करने वाली सरकार के सामने अब सवाल है कि क्या अच्छे काम करने वाले अधिकारियों को प्रोत्साहन और विवादों में घिरे अधिकारियों के मामलों में निष्पक्ष कार्यवाही कब होगी? फ़िलहाल, स्मृति ईरानी की ''स्मृति'' उन जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणादायक साबित हो रही है, जो जन भावनाओं के अनुरूप पार्टी का झंडा - डंडा बुलंद कर रहे है, ना की सत्ता की सौदागिरी से ''कमल'' खिलाने में जुटे है। तस्दीक की जाती है कि जनभावनाओं के विपरीत ऐसा ही हुआ, ASP की ट्रांसफर लिस्ट में ? महादेव एप्प ऑनलाइन सट्टे के तमाम फाउंडर मेंबर लगातार तीसरे साल भी मैदानी इलाकों में मनचाही पोस्टिंग पाने में कामयाब रहे। उम्मीद की जा रही थी कि सुशासन सरकार में अच्छा कार्य करने वाले अफसरों की पीठ थपथपाई जाएगी और अनुशासनहीन पुलिस अफसरों को कानून का डंडा दिखाया जाएगा। लेकिन, हालात इसके ठीक विपरीत बताए जा रहे है।

जरूरतमंद अफसरों को तबादले की राह तकनी पड़ रही है, जबकि '' नगद नारायण'' न्योछावर का माजदा रखने वाले कतिपय अफसरों को तोहफ़े में घर बैठे मनचाही पोस्टिंग हाथ लग रही है, ''कमाल'' की बात है, या ''कमल'' की यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन पुलिस महकमे में वर्दी में अपराधों की बानगी पेश करने वाले अफसरों को दण्डित करने के बजाय सुविधाजनक स्थल पर तैनाती किये जाने के मामले ने ''सत्ताधारी तंत्र'' की पोल खोल दी है, चंद पैसों के लिए पार्टी की रीति -नीति से समझौता, अच्छी बात नहीं है ? यह तिकड़म जन आकांक्षाओं के पलड़े में आंकी जा रही है। सत्ता के सौदागरों को सोचना होगा की अगले विधानसभा चुनाव 2028 में जनता का रंग -ढंग किसी चेहरे पर नहीं बल्कि पार्टी के कामकाज, कथनी और करनी पर ''मुहर'' लगाने के लिए तैयार बैठा नजर आ रहा है। इस अग्नि परीक्षा के अंतिम दौर में चाल -चरित्र और चेहरे की दुहाई बेमानी साबित होगी। बल्कि इसका गंभीर खामियाजा भी सत्ताधारी दल को उठाना पड़ेगा। 


4 - मिया - बीवी राजी तो जाँच रिपोर्ट पर कुंडली मारकर क्यों बैठा है काजी ? जांच की फाइल ही ''जांच के इंतजार'' में

मियां-बीवी राजी, फिर जांच की फाइल से कैसी नाराजगी? DSP कल्पना वर्मा और कारोबारी दीपक टंडन का विवाद अब भी फाइलों में '' जस का तस'' कैद है, जबकि शिकायतकर्ता और पीड़ित टंडन जाँच रिपोर्ट पर वैधानिक कार्यवाही की गुहार लम्बे अरसे से लगा रहा है, अब खबर आ रही है कि विगत 8 माह से निलंबित चल रही DSP कल्पना वर्मा भी आरोप पत्र की मांग को लेकर पुलिस मुख्यालय के चक्कर लगा रही है, उन्हें भी आरोप पत्र सौंपे जाने को लेकर पुलिस मुख्यालय की कोताही को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि जब फरियादी और आरोपित दोनों ही शख्स ''आरोप पत्र'' की मांग को लेकर दो - चार हो रहे है, तो जाँच अधिकारी क्यों ''दाल भात में मूसलचंद'' क्यों बन रहे है ? आखिर क्यों दोनों ही पक्षों को जाँच पड़ताल से वैधानिक तौर पर अवगत नहीं कराया जा रहा है ? रायपुर पुलिस की

जाँच रिपोर्ट में सामने आये तथ्यों के बाद विभागीय जाँच से परहेज़ क्यों ? जैसे सवालों से इन दिनों एक बार फिर यह विवाद पुलिस मुख्यालय की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा रहा है। छत्तीसगढ़ पुलिस की निलंबित डीएसपी कल्पना वर्मा और कारोबारी दीपक टंडन के बीच चर्चित विवाद लगता है कि ''पुलिस मुख्यालय'' की फाइलों में कहीं गुम होकर रह गया है ? साल भर पहले मामला मीडिया में सुर्खियों में आया, दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप हुए, DSP कल्पना वर्मा पर निलंबन की कार्रवाई भी हुई, लेकिन अब 8 माह से ज्यादा का वक्त गुजर जाने के बाद भी ना तो जांच रिपोर्ट का नतीजा सामने आया और ना ही पीड़ित को कोई राहत मिल पाई। दिलचस्प बात यह है कि शिकायतकर्ता दीपक टंडन और निलंबित डीएसपी कल्पना वर्मा, दोनों ही जांच से जुड़े दस्तावेज और आरोप पत्र पाने के लिए इन दिनों पुलिस मुख्यालय के चक्कर काट रहे बताए जा रहे हैं, यानी एक तरफ शिकायतकर्ता को जांच रिपोर्ट का इंतजार है, तो दूसरी तरफ निलंबित DSP को आरोप पत्र का ? कारोबारी दीपक टंडन का दावा है कि उनकी गाड़ी और सोने के आभूषणों समेत कई कीमती सामान अब तक सुपुर्दनामे पर नहीं मिले हैं।

आरटीआई के जरिए पुलिस मुख्यालय और SP दफ्तर ( अब कमिश्नरेट ) से भी जानकारी मांगने के बावजूद उन्हें कोई राहत नहीं मिली। दूसरी ओर खबर यह भी है कि कल्पना वर्मा भी अपने खिलाफ आरोप पत्र मिलने के इंतजार में जमकर हाथ -पाँव मार रही हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब दोनों पक्षों को दस्तावेज चाहिए, तो आखिर पुलिस मुख्यालय की फाइल किसके इशारे पर ''आराम फरमा'' रही है? शिकायतकर्ता को रिपोर्ट नहीं, निलंबित डीएसपी को आरोप पत्र नहीं और जांच का नतीजा भी नदारद! फ़िलहाल, अब तो यही पूछना पड़ेगा कि मामले की जांच चल रही है या जांच की फाइल ही ''जांच के इंतजार'' में बैठी है?


5 - अस्पताल में ''नौकरशाही'' ? अब नौकरशाहों के ''अस्पताल''

अस्पताल में नौकरशाह या नौकरशाहों के अस्पताल! कुर्सी सरकारी, कारोबार कथित तौर पर निजी... आखिर ये कैसा सेवा भाव? एक वो दौर था जब छत्तीसगढ़  में बड़े नौकरशाह कभी हालात का जायजा लेने तो कभी अपनों का हाल -चाल जानने के लिए अस्पतालों में नजर आते थे। लेकिन अब राज्य की फिंजा बदल चुकी है, कतिपय नौकरशाह अब बड़े अस्पतालों के बेनामी मालिक बनने की राह में है। छत्तीसगढ़ में ''कारोबारी नौकरशाहों'' की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है, आईएएस -आईपीएस और आईएफएस तीनो ही संवर्गो में कारोबारी अफसर बनने की होड़ मची हुई है, इसके लिए टेंडर -निविदा से लेकर ट्रांसफर -पोस्टिंग में सेवा का मेवा चखने में कोई परहेज नहीं बरता जा रहा है। कतिपय आईएएस अफसरों ने जहाँ ''अस्पतालों'' में निवेश - भागीदारी को लेकर अपनी बाहें फैला दी है, वही आईपीएस अफसरों ने नाईट क्लब, होटल रेस्टोरेंट,पब और दारु पीने -पिलाने के ठिकानों पर निवेश करने के व्यवसाय में अपना भाग्य आजमाया है। जबकि कतिपय आईएफएस अफसरों ने एग्रीकल्चर - हॉर्टीकल्चर और जल -जंगल और जमीन से जुडी व्यावसायिक योजनाओं में अपनी भागीदारी सुनिक्षित की है। केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त भागीदारी से संचालित ''कैम्पा'' योजना कारोबारी आईएफएस अफसरों के लिए वरदान साबित हो रही है। इस तिकड़ी के इतर ऐसे भी मौका परस्त नौकरशाह है, जो '' मोटे कमीशन'' की चाह में कुर्सी का बेजा इस्तेमाल करने में पीछे नहीं है।

तस्दीक की जाती है कि नई राजधानी नवा रायपुर से लेकर राज्य के बाहर के कई महानगरों में अखिल भारतीय सेवाओं के कतिपय अधिकारियो के मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल बे - रोक टोक तेजी से तन रहे है। इसके लिए राज्य के अंदर - बाहर के कई ठेकेदार और उनकी कम्पनियाँ दानदाता के रूप में सामने आई है। कही नाते - रिस्तेदारो के नाम पर तो कही बच्चो के नाम पर नौकरशाही के कारोबारियों की गगनचुंबी इमारतें तन रही है। जबकि सरकारी रिकार्ड में ऐसे धुरंधर नौकरशाहों की माली हालत ''कमजोर -आर्थिक श्रेणी'' में दर्ज है, मतलब साहब सिर्फ तनख्वाह पर ही गुजारा कर रहे है। 

नौकरशाही में छत्तीसगढ़ कैडर के अखिल भारतीय सेवा के कारोबारी अफसरों की संख्या में दिन दुगुनी और रात चौगुनी प्रगति दर्ज की जा रही है, चर्चा है कि सत्ता की चाबी घुमाने में माहिर कतिपय नौकरशाहों ने सत्ता को ''बेजा कमाई'' का जरिया बना लिया है। उनकी कार्यप्रणाली से जहाँ सत्ताधारी दल की मान -प्रतिष्ठा दांव पर लग रही है, वही सरकार पर हावी नौकरशाही से जनता का दम निकल रहा है। 

अब नौकरशाही के इस कारोबारी मॉडल पर सवाल पूछे जाने का दौर करीब आ गया है, दरअसल सरकारी कुर्सी पर बैठकर आखिर अपनों के नाम दर्ज निजी कारोबार की इतनी चमक कैसे पैदा हो रही है? सुशासन की बेला में नौकरशाही का एक नया ''कारोबारी मॉडल'' देश - प्रदेश में चर्चा में है। ''साहबों'' की पहचान अब सिर्फ सरकारी बंगले, आलिशान गाड़ी, नौकर - चाकर और फाइलों तक सीमित नहीं बताई जा रही है, बल्कि कारोबार के मैदान में भी उनकी कथित ''सक्रियता'' के किस्से सुर्खियां बटोर रहे हैं। अब सवाल यह है कि अफसरशाही का असली फोकस जनसेवा है या कारोबार का विस्तार? हालांकि इन चर्चाओं और आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। ठेकेदारों और कंपनियों के साथ बड़े अफसरों की सांठ - गांठ को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। जनता को इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और सरकारी दौरों के नाम पर साहब खुद के निजी अस्पतालों के चक्कर काटते देखा जा रहा हैं। आखिर इन चर्चाओं की सच्चाई जांच के दायरे में कब आएगी? इसे लेकर काफी टेबलों में माथापच्ची जोरो पर है।