रायपुर : छत्तीसगढ़ में खिंचाई परियोजनाओं को मोटे कमीशन में एक ठेकेदार विशेष को सौंपने के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है | तस्दीक की जाती है,कि ठेका पाने के लिए कंपनी ने सरकारी दस्तावेजों में सुनियोजित कूट रचना के लिए कई अधिकारियों को "लाभार्थी" बनाया था| इसके तहत 5576 हज़ार करोड़ के इस टेंडर को ''मनचाही पार्टी'' को सौंपने के लिए उस कंपनी के हितों के मद्देनज़र ना केवल,टेंडर-निविदा शर्तों को डिजाइन किया गया,बल्कि दस्तावेजों में भी हेरफ़ेर कर छत्तीसगढ़ शासन को चूना लगाने की साज़िश रची गई | इस मामले में अब रहस्यों पर से पर्दा हट गया है |
तस्दीक यह भी की जाती है,कि राज्य सरकार की आँखों में धूंल झोंकने वाले इस प्रकरण में चुनिंदा बड़े अधिकारियों समेत साजिशकर्ता कंपनियों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज़ करने पर विचार किया जा रहा है | जानकारी के मुताबिक, टेंडर-निविदा के खेल में बड़े पैमाने पर आर्थिक भ्रष्टाचार की बू आने पर,एक तत्कालीन ज़िम्मेदार वरिष्ठ अधिकारी ने गंभीर आपत्ति दर्ज की थी | लेकिन,ठेकेदार के निशाने पर आए इस अफसर का अचानक तबादला कर दिया गया | उनके तबादले के 49 दिन बाद उस अफसर की पुरानी मुहर का उपयोग करते हुए नए पदस्थ अफसर ने इस टेंडर-निविदा को मंजूरी प्रदान कर दी | करोड़ों की कमीशनखोरी से जुड़े इस टेंडर के अब निरस्त होने के आसार भी जाहिर किए जा रहे है| इसके साथ ही दागियों के खिलाफ वैधानिक कार्यवाही की मांग ने ज़ोर पकड़ लिया है|
जानकारी के मुताबिक,छत्तीसगढ़ में जल संसाधन विभाग में 5,576 करोड़ रुपये की तीन महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के टेंडर-निविदा में नियमों और प्रचलित प्रावधानों के गंभीर उल्लंघन के तथ्य सामने आए है | इसके साथ ही यह भी साफ़ हुआ है,कि मनचाहे ठेकेदार से मोटे कमीशन प्राप्त करने के लिए प्रशासनिक दस्तावेजों में भी सुनियोजित हेरफेर किया गया था | इसके लिए पदोन्नति, पदस्थापना और ई-ऑफिस के दस्तावेजों के साथ भी छेड़छाड़ की गई थी | सूत्रों का दावा है,कि ठेका प्राप्त करने वाली कंपनी के कर्ता-धर्ताओं ने साजिश कर जल संसाधन विभाग के हुनरबाज़ अफसरों को गैर कानूनी कार्य करने के लिए अपनी गिरफ़्त में ले लिया था |
यह भी तस्दीक की जा रही है,कि ''लाभार्थी कंपनियों'' को उपकृत करने के लिए न केवल शासन के आदेश दरकिनार किए गए, बल्कि मंत्रालय से हटाए जा चुके अधिकारियों ने लगभग सात हफ्ते बाद कार्यालय की पुरानी सील-मुहर का इस्तेमाल कर हज़ारों-करोड़ के टेंडर दस्तावेजों को सरकारी मंजूरी प्रदान कर दी। टेंडर-निविदा की इस पूरी प्रक्रिया में आपत्ति जताने वाले संविदा अधिकारियों और मंत्रालय पदस्थ एक नियमित अफसर को हटाए जाने का भी उल्लेख दस्तावेजों में सामने आया है।
जल संसाधन विभाग दस्तावेजों के मुताबिक, 12 मार्च 2026 को मकरसी कुंजूर मुख्य अभियंता पद से पदोन्नत हुए एवं 6 अप्रैल 2026 को उन्हें मंत्रालय में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (ओएसडी) के पद से मुक्त कर मुख्य अभियंता (महानदी परियोजना, रायपुर) के पद पर पदस्थ कर दिया गया था। इसके बावजूद 25 मई 2026 को मंत्रालय से स्थानांतरित (हटने )के करीब 49 दिन बाद ई-ऑफिस में जारी तीनों परियोजनाओं के टेंडर और फॉर्म-ए दस्तावेजों पर पुरानी मुहर लगाकर टेंडर-निविदा को मंजूरी दिए जाने का मामला सामने आया है। यह भी बताया जाता है,कि संबंधित दस्तावेजों के आधार पर कंपनियों के वित्तीय संसाधन और तकनीकी अनुभव की शर्तें तय कर उसे पिछले दरवाज़े से ''पात्र'' योग्य (ELIGABLE) बनाया गया था |
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार,आपत्तियों के बावजूद अपात्र कंपनियों को पात्र बनाया गया | टेंडर हथियाने के खेल में जल संसाधन विभाग के तत्कालीन प्रमुख अभियंता ने शासन से बगैर अनुमति मुख्य अभियंता के पद से हटकर खुद को टेंडर समिति का अध्यक्ष बना लिया था। इसके बाद कथित कंपनी के हितों के अनुरूप दस्तावेजों की कूट रचना की गई | अब टेंडर-निविदा में गोलमाल सामने आने के बाद जल संसाधन विभाग में हज़ारों-करोड़ की तीन परियोजनाओं को लाभ का धंधा बनाने वाले अफसरों और कथित कंपनी की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल खड़े हो गए है,जिन परियोजनाओं की निविदा-टेंडर को लेकर सवाल उठे हैं, उनमें सिकासार-कोडार लिंक नहर परियोजना (2,549.86 करोड़ रुपये), मटमार-देवरगांव बैराज (1,636.69 करोड़ रुपये) और मोहला-सिरपुर बैराज (574.73 करोड़ रुपये) शामिल हैं।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक,तत्कालीन मुख्य अभियंता कुंजूर ने मंत्रालय की पुरानी मुहर से निविदा प्रपत्र मंजूर किए। आरोप है, कि इसके बाद गैर कानूनी रूप से मुख्यालय के बजाए फील्ड में बैठकर निविदा-टेंडर खुलवाए गए, अपात्र कंपनियों को पात्र ठहराया गया और मौके पर ही उन कंपनियों को दरें (RATE) खुलवाने का अवसर दिया गया। महादेव कंस्ट्रक्शन लिमिटेड और मटमार प्रोजेक्ट्स, मोहला में ओम मेटल्स समेत अन्य कंपनियों को वर्क-इन-हैंड और अनुभव की शर्तें पूरी नहीं करने के बावजूद उपकृत किए जाने का आरोप लगाया गया है।
एक विभागीय जानकारी के अनुसार, जुलाई 2026 में मुख्य अभियंता कुंजूर का तबादला मुख्य अभियंता, महानदी गोदावरी कछार के पद पर किया गया था। यह वही कार्यालय बताया गया है, जहां सिकासार-कोडार परियोजना की दरें खोलने वाली समिति के सदस्य तैनात थे। दावा यह भी किया जा रहा है, कि संविदा अधिकारी गुरुवर ने अपात्र फर्मों को पात्र बनाने का विरोध किया था | इससे कई वरिष्ठ अफसर नाराज़ हुए और फिर उन्होंने दबाव बनाते हुए संविदा अधिकारी गुरुवर को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया|
तस्दीक की जाती है,कि गुरुवर को एक माह का वेतन अपने जेब से भरकर विभाग को इस्तीफा सौंपना पड़ा। यही नहीं,टेंडर के खेल में एक अन्य संविदा अधिकारी भागवत को टेंडर-निविदा जारी होने से ठीक एक सप्ताह पहले बिना विधिक नोटिस जारी किए सेवाएं समाप्त कर दी गई |यह भी बताया जाता है,कि नियमों के तहत सरकारी सेवा की दुहाई देने वाले कार्यपालन अभियंता शिवराम सिदार पर भी गाज गिरी, उन्हें पद से हटाकर प्रमुख अभियंता कार्यालय अटैच कर दिया गया। बताते है,कि कार्यपालन अभियंता शिवराम सिदार ने स्वीकृत निविदा-टेंडर दस्तावेजों में नियम विरुद्ध बदलाव का विरोध किया था|
उधर,तस्दीक यह भी की जा रही है,कि जल संसाधन विभाग के लगभग 14 अधिकारियों ने छत्तीसगढ़ शासन के बजाए कथित कंपनी के हितों को साधने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी | इधर,जल संसाधन विभाग के सचिव राजेश सिंह राणा ने दावा किया है, कि निविदा-टेंडर प्रक्रिया की कार्रवाई नियमानुसार की गई है, जिसे माननीय उच्च न्यायालय ने भी मान्य किया है। इस प्रकरण को लेकर राज्य के जल संसाधन मंत्री केदार कश्यप से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है | फ़िलहाल मामले की शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्य सचिव और ईओडब्ल्यू से की गई है|
