जगदलपुर : - छत्तीसगढ़ के विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरे में सदियों पुरानी परंपराओं के निर्वहन का सिलसिला जारी है। शारदीय नवरात्र की महाष्टमी की देर रात बस्तर दशहरे की महत्वपूर्ण रस्म निशा जात्रा विधान संपन्न हुआ। इस दौरान परंपरा के अनुसार 12 बकरों की बलि दी गई और मां खमेश्वरी की विशेष पूजा-अर्चना की गई।

बस्तर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव ने विधि-विधान से पूजा कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि, खुशहाली और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की कामना की। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बलि के बाद मिट्टी के 12 पात्रों में रक्त रखकर पूजा की प्रक्रिया पूरी की गई। करीब 618 साल पुरानी मानी जाने वाली यह रस्म बस्तर की ऐतिहासिक और धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

निशा जात्रा विधान के साथ अब बस्तर दशहरे की अगली प्रमुख रस्म मावली परघाव की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। इस रस्म में माता की डोली और छत्र का पारंपरिक स्वागत किया जाता है। इसके साथ जोगी उठाई सहित अन्य धार्मिक विधान भी निभाए जाते हैं। बस्तर दशहरे की परंपराओं में राजपरिवार, पुजारियों, सेवादारों और स्थानीय समुदायों की अहम भूमिका रहती है। समय के साथ कुछ रस्मों के स्वरूप में बदलाव आया है। बताया जाता है कि पहले इस विधान में भैंसों की बलि दी जाती थी, जबकि अब 12 बकरों की बलि देकर परंपरा निभाई जाती है। सदियों से चली आ रही ये रस्में बस्तर दशहरे को देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देती हैं और यहां की विशिष्ट जनजातीय संस्कृति, आस्था और ऐतिहासिक विरासत को सामने लाती हैं।