
दिल्ली :भारतीय जनता पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम के गठन के बाद पार्टी के दो बड़े नेताओं धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। दोनों नेता लंबे समय तक भाजपा संगठन और सरकार में अहम भूमिका निभाते रहे हैं, लेकिन इस बार न तो उन्हें मंत्री पद मिला और न ही भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में जगह दी गई। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि आखिर इन दोनों नेताओं की भविष्य की राजनीतिक भूमिका क्या होगी। भाजपा की नई टीम में कई पुराने चेहरों की वापसी हुई है और कई नेताओं को संगठन में नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। पार्टी ने आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए अनुभव और क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर टीम तैयार करने की कोशिश की है। हालांकि, इस बदलाव में धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय का नाम शामिल नहीं होने से राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग मायने निकाल रहे हैं। धर्मेंद्र प्रधान भाजपा के उन नेताओं में शामिल रहे हैं, जिन्होंने केंद्र सरकार में लंबे समय तक महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले हैं। वह पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अलावा शिक्षा मंत्रालय जैसी अहम जिम्मेदारियां भी संभाल चुके हैं। संगठन में भी उनका मजबूत प्रभाव माना जाता रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय टीम में उनका नाम नहीं होना कई लोगों के लिए चौंकाने वाला फैसला माना जा रहा है। जानकारों का मानना है कि किसी नेता को राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं मिलना हमेशा राजनीतिक हाशिए पर जाने का संकेत नहीं होता। भाजपा में कई बार नेताओं को चुनावी रणनीति, राज्यों की जिम्मेदारी या अन्य महत्वपूर्ण भूमिकाओं के लिए अलग तरीके से इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए धर्मेंद्र प्रधान के मामले में भी भविष्य में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेता मंगल पांडेय भी पार्टी के पुराने और भरोसेमंद चेहरों में गिने जाते हैं। वह बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री समेत कई अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। संगठन में भी उनका अनुभव काफी लंबा रहा है। इसके बावजूद नई राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं मिलने से बिहार भाजपा के राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। मंगल पांडेय का नाम बिहार की राजनीति में लंबे समय से प्रभावशाली नेताओं में शामिल रहा है। भाजपा ने राज्य में कई बार उन्हें संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर जिम्मेदारी दी है। ऐसे में माना जा रहा है कि पार्टी आने वाले समय में उन्हें बिहार से जुड़ी किसी महत्वपूर्ण भूमिका में इस्तेमाल कर सकती है। भाजपा की रणनीति को समझने वाले नेताओं का कहना है कि पार्टी संगठन में बदलाव के दौरान कई बार बड़े नेताओं को कुछ समय के लिए अलग भूमिका में रखा जाता है। इसका मतलब यह नहीं होता कि उनका राजनीतिक महत्व खत्म हो गया है। भाजपा में वरिष्ठ नेताओं को चुनाव प्रबंधन, राज्य प्रभारी, सलाहकार भूमिका या अन्य जिम्मेदारियों में लगाया जाता रहा है। धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय दोनों ही संगठन और सरकार का लंबा अनुभव रखते हैं। ऐसे में पार्टी उनके अनुभव का इस्तेमाल किस तरह करती है, यह आने वाले समय में साफ होगा। खासकर आगामी विधानसभा चुनावों और 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारियों को देखते हुए भाजपा अपने अनुभवी नेताओं को अलग-अलग मोर्चों पर सक्रिय कर सकती है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि नई टीम में युवा चेहरों को ज्यादा अवसर देने और संगठन में नई ऊर्जा लाने की कोशिश की गई है। इसके बावजूद पार्टी के पुराने नेताओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि चुनावी रणनीति बनाने में अनुभवी नेताओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रहती है। धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी उन्हें आगे किस भूमिका में देखती है। क्या उन्हें किसी राज्य की जिम्मेदारी मिलेगी, क्या वे चुनावी प्रबंधन में सक्रिय होंगे या फिर संगठन से अलग कोई नई भूमिका निभाएंगे, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। फिलहाल दोनों नेताओं की राजनीतिक यात्रा को देखते हुए यह कहना जल्दबाजी होगी कि वे भाजपा की मुख्यधारा से बाहर हो गए हैं। भाजपा में कई बार बड़े बदलावों के बाद नेताओं को नई जिम्मेदारियां दी जाती रही हैं। ऐसे में धर्मेंद्र प्रधान और मंगल पांडेय के भविष्य को लेकर अंतिम तस्वीर आने वाले दिनों में ही साफ हो पाएगी।



