
रायपुर : छत्तीसगढ़ का स्वास्थ्य विभाग आम नागरिको के बेहतर स्वास्थ्य की ओर जोर दे रहा है या फिर मरीजों के स्वास्थ्य के खिलवाड़ कर रहा है,इसका आंकलन आप सिर्फ सरकारी दवाओं की ख़रीदी और गुणवत्ता की जाँच-परख के बाद ही कर सकते है|

प्रदेश में घोटालों का ”हब” बन चुकी, सीजीएमएससी ना केवल एलोपैथिक दवाओं की खरीदी में गड़बड़झाला कर रही है,बल्कि आयुर्वेदिक दवाओं की सप्लाई में भी अनियमितता कर करोड़ों का लाभ हासिल कर रही है| उसके कारोबार के गणित का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है,कि दवाओं की खरीदी में कायदे-कानूनों को दरकिनार कर सरकारी तिजोरी पर सीधे तौर पर हाथ साफ़ किया जा रहा है,मोटे कमीशन लगभग 60 फीसदी के चक्कर में घटिया दवाओं और आपूर्तिकर्ता कंपनियों की ”पौ-बारह” है,जबकि जनहित के नाम पर ”मोटा कमीशन” सीधे साहब की जेब में जा रहा है|

यह भी बताया जाता है,कि “1 रूपये” वेतन प्राप्त करने का शिगूफा छोड़ने वाले स्वघोषित ”ईमानदार साहब” नियम के मुताबिक,ना केवल पूरा वेतन और भत्ता ले रहे है,बल्कि ”मोटा कमीशन” प्राप्त कर अपनी तिजोरी भी भर रहे है| जानकारी के मुताबिक,DLL समेत दर्जनों कंपनियों पर विभागीय सचिव की ”कृपा’‘ बरस रही है,जबकि घटिया दवाओं के सेवन से हज़ारों मरीजों की सांसे फूली हुई है|इन साहब की ना केवल कार्यप्रणाली सुर्ख़ियों में है,बल्कि “छप्पर फाड़ आमदनी” ने सीजीएमएससी की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है| सीजीएमएससी में घोटालों की लम्बी फेहरिस्त सीबीआई और ईडी जैसी जाँच एजेंसियों की राह तक रही है|

सवाल यह भी उठ रहा है,कि घोटालों में सीधी सहभागिता के बावजूद “स्वास्थ्य सचिव” की कुर्सी सही सलामत बनाए रखने के लिए जिम्मेदार नौकरशाही भी आंख मूंद कर बैठी है|जनस्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने में जुटे विभागीय सचिव की कमाई का आंकलन अब “1 टके” से बढ़ कर प्रतिमाह करोड़ों के रिकॉर्ड तोड़ स्तर पर “स्थिर” बताया जाता है|“स्वास्थ्य सचिव” की कार्यप्रणाली की उच्च स्तरीय जाँच जरुरी बताई जाती है|

मिली जानकारी के अनुसार,छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड (CGMSC) में आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हुए हैं। आरोप है, कि नई टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ने के बावजूद पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।बताया जा रहा है,कि आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी के लिए 22 जून को चार नए टेंडर जारी किए गए थे। इनमें आवेदन की अंतिम तारीख 14 जुलाई निकल चुकी है। टेंडर का पहला चरण भी खोला जा चुका है और दावा-आपत्ति की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। ऐसे में शिकायतकर्ता ने पुराने करार को आगे बढ़ाने की जरूरत पर सवाल उठाए हैं।

शिकायत के अनुसार, इससे पहले 20 नवंबर 2025 को आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी के लिए दो टेंडर जारी हुए थे। इनकी प्रक्रिया लंबे समय तक पूरी नहीं हो सकी। इसी दौरान पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट को छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया और उसी के तहत दवाओं की सप्लाई जारी रही।अब 7 अगस्त को जारी एक आदेश के जरिए चुनिंदा कंपनियों से पुराने करार को लेकर सहमति और सुझाव मांगे जाने की बात सामने आई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इससे खुली प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है और किसी खास कंपनी को फायदा मिलने की संभावना बन सकती है।

CGMSC के एमडी रितेश अग्रवाल ने पुराने करार को दोबारा बढ़ाने की बात से इनकार किया है। उन्होंने बताया,कि रेट कॉन्ट्रैक्ट के विस्तार की कोई योजना नहीं है। नई टेंडर प्रक्रिया पूरी की जाएगी और इसी के आधार पर आगे आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी होगी।फ़िलहाल,
सवाल यह है, कि जब नई निविदा प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है, तो पुराने करार को लेकर सामने आई प्रक्रिया की जरूरत क्यों पड़ी? इस मामले में शिकायतकर्ता ने पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की है।
अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों को दूर भगाता हरेली तिहार..




