
चित्तौड़गढ़ : – राजस्थान का चित्तौड़गढ़ दुर्ग सिर्फ शौर्य, युद्ध और बलिदान की कहानियों के लिए मशहूर नहीं है, बल्कि यहां भक्ति और प्रेम की ऐसी गाथा भी जुड़ी है, जो सदियों बाद भी लोगों के बीच जीवित है। बात हो रही है भक्त शिरोमणि मीरा बाई की, जिन्होंने बचपन से ही भगवान कृष्ण को अपना आराध्य मान लिया था। विवाह के बाद जब मीरा चित्तौड़गढ़ पहुंचीं, तब भी उनका मन राजसी जीवन से ज्यादा कृष्ण भक्ति में रमा रहा। दुर्ग स्थित मीरा मंदिर आज भी उनकी इसी अटूट आस्था और समर्पण की याद दिलाता है।

मीरा के पति भोजराज के निधन के बाद उनकी कृष्ण भक्ति और गहरी होती चली गई। लोक परंपराओं में उल्लेख मिलता है कि उनकी भक्ति को लेकर राजपरिवार में विरोध भी हुआ और उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके मीरा ने अपने आराध्य गिरधर गोपाल का साथ नहीं छोड़ा और अंततः मेवाड़ छोड़कर तीर्थयात्रा पर निकल गईं। उनकी यात्रा द्वारका तक पहुंची, जहां धार्मिक मान्यता के अनुसार मीरा द्वारकाधीश की भक्ति में इतनी लीन हो गईं कि मंदिर के गर्भगृह से फिर बाहर नहीं आईं और कृष्ण की प्रतिमा में समा गईं। इस घटना को आज भी उनकी भक्ति की पराकाष्ठा माना जाता है।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग की पहचान जहां वीरता और बलिदान से होती है, वहीं मीरा मंदिर इस ऐतिहासिक धरती को भक्ति और प्रेम का भी प्रतीक बनाता है। मंदिर से जुड़ी मीरा और गिरधर गोपाल की प्रतिमाएं श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र हैं और यहां आने वाले पर्यटक मीरा की कृष्ण भक्ति की कहानी से रूबरू होते हैं। करीब पांच सदियों बाद भी मीरा के भजन लोगों की जुबान पर हैं और उनकी जीवनगाथा यही संदेश देती है कि सच्ची भक्ति के सामने सांसारिक बंधन भी छोटे पड़ जाते हैं।






