
रायपुर/दिल्ली : छत्तीसगढ़ में ”कस्टोडियल डेथ” की लम्बी फ़ेहरिस्त से आपराधिक जगत में खाकी वर्दी की कमाई का बढ़ता आंकड़ा अंग्रेजी शासनकाल में घटित प्रताड़ना की दास्तान को दोहरा रहा है| राज्य में सैंकड़ों थानेदारों से लेकर दर्जनों आईपीएस अधिकारियों की रोजाना कमाई का ग्राफ़,केंद्रीय जाँच एजेंसियों के लिए शोध का विषय बन गया है| एक दौर में नक्सली रंग में रंगे छत्तीसगढ़ में माओवादियों का जैसे-तैसे सफाया तो हो गया है,लेकिन खूंखार नक्सलियों के दलम की तर्ज पर ”ख़ाकी वर्दी का खौफ” अब तक बरक़रार है|यही कारण है,कि पूछताछ के नाम पर तो कभी,गंभीर से गंभीर धाराएं जुड़वाने, तो कभी कटवाने के नाम पर पुलिस तंत्र की अवैध कमाई के कारोबार ने “सिंडिकेट” का रूप ले लिया है|

छत्तीसगढ़ जैसा ”ग़रीब” राज्य आर्थिक प्रगति की नई राह पर है | भारतीय प्रशासनिक सेवा के विभिन्न कैडर के दर्जनों चुनिंदा अफसर इस रैकेट में अवैध कमाई की फसल के फलने-फूलने के लिए ”खाद” का काम कर रहे है|सीबीआई के अलावा ED ने ऐसे दर्जनों अधिकारियों के ठिकानों पर दबिश भी दी थी| लेकिन,नतीजा सिफ़र रहा,दागी अफसरों के बुलंद हौसलों ने प्रदेश में ”कस्टोडियल डेथ” के सुनियोजित कारोबार को भी हवा देना शुरू कर दिया है|तस्दीक की जाती है,कि ”खाकी वर्दी” वाले साहब हो या फिर ”टाई वाले” चुनिंदा ”हुक्मरान” दोनों की कार्यप्रणाली उगाही के मामले में एक दूसरे से बख़ूबी मेल-खाती है|

देश के नक्शे में छत्तीसगढ़ भले ही गरीब प्रदेश हो,लेकिन भारतीय प्रशासनिक सेवा के दर्जनों अधिकारियों की संपत्ति आसमान छू रही है|उनकी काली कमाई का अंदाज़ा लगा पाने में जाँच एजेंसियों को कड़ी मशक़्क़त के दौर से गुजरना पड़ रहा है| ऐसे मामलों के प्रति गृह मंत्रालय की बेरुखी ना केवल हैरान करने वाली है,बल्कि जनता के हितों के प्रति सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने के मामले सवालों के घेरे में है ? इस बीच सोशल मीडिया में अब वो,ऑर्डर कॉपी भी सुर्खियां बटोर रही है,जिसमें देश की सर्वोच्च अदालत ने प्रदेश की सरकारी मशीनरी की कलई खोलकर रख दी है|

जानकारी के मुताबिक,छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में श्रवण सूर्यवंशी उर्फ सरवन तामरे की कस्टोडियल डेथ से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के रुख़ ने प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज़ कर दी है, मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने कस्टोडियल डेथ मामले की जांच CBI को सौंपने का आदेश दिया है।

क्राइम फाइल के अनुसार,श्रवण सूर्यवंशी को 18 जनवरी 2024 को बिलासपुर के सीपत थाने में छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। आरोप था कि उनके पास करीब 6 लीटर कच्ची महुआ शराब थी, जिसकी कीमत करीब ₹1,200 बताई गई। गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल भेजा गया। जेल में तबीयत बिगड़ने पर 21 जनवरी 2024 को CIMS अस्पताल, बिलासपुर ले जाया गया, जहां 22 जनवरी 2024 सुबह करीब 6 बजे उनकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम में शरीर पर कई चोटें मिलीं, जिनमें सिर के पीछे गंभीर चोट, कलाई और पैरों पर सूजन तथा जांघ और गर्दन के पीछे चोट के निशान शामिल थे।पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण सिर पर किसी कठोर और कुंद वस्तु से लगी चोट और उससे पैदा हुई जटिलताएं बताया गया।

हाईकोर्ट ने क्या किया था?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने माना था कि श्रवण को कस्टडी के दौरान हिंसा का सामना करना पड़ा और उसी के परिणामस्वरूप उनकी मौत हुई।लेकिन हाईकोर्ट ने परिवार को केवल ₹1 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ FIR या जांच के संबंध में कोई प्रभावी आदेश नहीं दिया।इसके बाद मृतक की पत्नी और बेटियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने DGP और DG जेल से क्या कहा ?
जानकारी के मुताबिक,4 अगस्त 2026 को DGP, DG (Prisons) और Principal Secretary (Home) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश हुए।कोर्ट के सवाल पर DGP की ओर से कहा गया कि पुलिस को न्यायिक जांच की रिपोर्ट नहीं मिली थी, इसलिए FIR दर्ज करने का सवाल नहीं था।सुप्रीम कोर्ट ने इस जवाब को पूरी तरह गलत और बेहद गंभीर माना।

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक जांच की रिपोर्ट 22 जुलाई 2024 को ही तैयार हो चुकी थी और राज्य के रिकॉर्ड में भी इसकी जानकारी थी।कोर्ट ने अधिकारियों की इस स्थिति को “सांविधिक प्रक्रिया के प्रति चिंताजनक उपेक्षा” बताया और कहा कि रिपोर्ट नहीं मिलने की दलील “कवर-अप स्टोरी” थी और कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश थी।

CBI को सौंपी गई जांच-
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया, कि CBI तुरंत नियमित आपराधिक मामला दर्ज करे।जांच किसी वरिष्ठ CBI अधिकारी को सौंपी जाए।स्टडी में हुई मौत की परिस्थितियों की गहन जांच हो। जो भी अधिकारी कस्टोडियल हिंसा के लिए जिम्मेदार पाए जाएं, उनके खिलाफ कानून के अनुसार अभियोजन चलाया जाए।

राज्य के अधिकारियों ने न्यायिक जांच रिपोर्ट मिलने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं की, इसकी भी जांच CBI करेगी।DGP छत्तीसगढ़ को एक सप्ताह के भीतर केस के पूरे रिकॉर्ड CBI निदेशक को भेजने का निर्देश दिया गया है |

पीड़ित परिवार को ₹25 लाख का मुआवजा –
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राहत के तौर पर मृतक के परिवार को ₹25 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है।यह रकम चार सप्ताह के भीतर मृतक की पत्नी लह्रा बाई तामरे के बैंक खाते में जमा करनी होगी।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम मुआवजे की राशि बाद में तय की जाएगी।

इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कस्टोडियल डेथ की जांच CBI को सौंप दी है और राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों—DGP, DG (Prisons) और Principal Secretary (Home)—की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। साथ ही, मृतक के परिवार के लिए हाईकोर्ट द्वारा तय ₹1 लाख को अपर्याप्त मानते हुए अंतरिम मुआवजा बढ़ाकर ₹25 लाख कर दिया है।

छत्तीसगढ़ में राज्य की बीजेपी सरकार अब यूँ ही,हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेगी या फिर देश की सर्वोच्च अदालत की तर्ज पर
”कस्टोडियल डेथ” के मामलों को गंभीरता से लेगी,देखना गौरतलब है| फ़िलहाल तो, सर्वोच्च अदालत के फैसले के सामने आए लगभग 10 दिन बीत चुके है| लेकिन,निपक्ष जाँच के लिए तय मापदंडों पर राज्य सरकार का रुख काफी लचीला बताया जा रहा है | यह देखना भी गौरतलब है,कि इस अदालती आदेश का किस तर्ज पर परिपालन सुनिश्चित किया जा रहा है|
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(COURTESY-AR NEWS 18)…







