
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह के एक लेख को साझा किया। लेख में भारत की समृद्ध हथकरघा परंपरा को देश की महानतम सभ्यतागत शक्तियों में से एक बताते हुए युवाओं से विरासत को तकनीक, नवाचार, रचनात्मकता और उद्यमशीलता के साथ जोड़कर हथकरघा क्षेत्र को विकास का इंजन बनाने का आह्वान किया गया है।
क्षेत्रीय परंपराओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर जोर
प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा कि यह लेख भारत की समृद्ध क्षेत्रीय कपड़ा परंपराओं को रेखांकित करता है। साथ ही, इसमें ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने, महिला सशक्तीकरण, स्थिरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में हथकरघा क्षेत्र की भूमिका को भी सामने रखा गया है।
विरासत और तकनीक के मेल का आह्वान
पीएम मोदी ने कहा कि केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने हथकरघा को भारत की महानतम सभ्यतागत शक्तियों में से एक बताते हुए भारतीय वस्त्रों की असंख्य क्षेत्रीय परंपराओं को रेखांकित किया है। उन्होंने युवाओं से विरासत और तकनीक, रचनात्मकता तथा उद्यमशीलता को साथ लाकर हथकरघा क्षेत्र का अगला अध्याय लिखने और बुनकरों की आजीविका को मजबूत करने का आह्वान किया।
वैश्विक रचनात्मक उद्योग बनने की क्षमता
गिरिराज सिंह ने अपने लेख में कहा कि विकसित भारत-2047 के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ते हुए हथकरघा क्षेत्र भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी रचनात्मक उद्योग में बदलने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि सिंधु घाटी सभ्यता तक पुरानी भारत की हथकरघा परंपराएं कभी वैश्विक कपड़ा व्यापार में प्रभावशाली थीं और आज टिकाऊ, प्रामाणिक तथा हस्तनिर्मित उत्पादों की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मांग को पूरा करने के लिए बेहतर स्थिति में हैं।
‘ब्रांड इंडिया’ के दूत बनें हथकरघा उत्पाद
उन्होंने कहा कि भारत की अगली हथकरघा क्रांति में केवल वस्त्रों का निर्यात नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके साथ शिल्प कौशल, विरासत, नवाचार और भरोसे का भी वैश्विक प्रसार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हर हाथ से बुना उत्पाद ‘ब्रांड इंडिया’ का दूत बन सकता है।
35 लाख से अधिक बुनकरों और कामगारों को रोजगार
केंद्रीय मंत्री ने हथकरघा क्षेत्र के आर्थिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह भारत का सबसे बड़ा कुटीर उद्योग है। यह 35 लाख से अधिक बुनकरों और संबद्ध कामगारों की आजीविका का आधार है। इनमें महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 72% है।
कच्चे माल से लेकर क्लस्टर विकास तक पहल
गिरिराज सिंह ने पिछले एक दशक में क्षेत्र को मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों का उल्लेख किया। इनमें कच्चा माल आपूर्ति योजना, 797 हथकरघा क्लस्टरों का विकास, 1.24 लाख से अधिक उन्नत करघों का वितरण और करीब 97 हजार कारीगरों के लिए कौशल उन्नयन कार्यक्रम शामिल हैं। इसके अलावा उत्पादक कंपनियों, जीआई-टैग वाले उत्पादों, हैंडलूम मार्क प्रमाणन, इंडिया हैंडमेड प्रमाणन, अर्बन हाट और डिजाइन रिसोर्स सेंटर को भी बढ़ावा दिया गया है।
29 बुनकर सेवा केंद्र और 11 संस्थान दे रहे प्रशिक्षण
उन्होंने कहा कि सरकार 29 बुनकर सेवा केंद्रों को भी मजबूत कर रही है। ये केंद्र प्रशिक्षण, डिजाइन विकास, कच्चे माल की सहायता और बाजार से जोड़ने का काम करते हैं। इसके साथ ही 11 भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थानों के माध्यम से उन्नत प्रशिक्षण और उच्च मूल्य वाले हथकरघा उत्पाद विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।
1,800 क्लस्टरों तक बढ़ेगा प्रस्तावित कार्यक्रम
गिरिराज सिंह ने कहा कि प्रस्तावित राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प कार्यक्रम के तहत 500 से अधिक जिलों में 1,800 क्लस्टरों तक सहायता का विस्तार किया जाएगा। इससे करीब 65 लाख बुनकरों और कारीगरों को लाभ मिलने की उम्मीद है। इसका उद्देश्य ‘हैंडमेड इन इंडिया’ को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाना भी है।
गांधी के अंबर चरखे से हैंडलूम 4.0 तक तकनीकी सफर
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत की हथकरघा यात्रा में नवाचार हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। महात्मा गांधी के अंबर चरखे से लेकर असम के मैना लूम और शिवसागर में विकसित चित्रांजन हैंडलूम तक तकनीक ने इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
दिव्यांगों के लिए भी विकसित हो रहे आधुनिक करघे
उन्होंने बताया कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) के साथ मिलकर स्थापित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर हैंडलूम टेक्नोलॉजी हल्के, मजबूत और आसानी से संचालित किए जा सकने वाले करघे विकसित कर रहा है। इनका उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाने के साथ दिव्यांग व्यक्तियों के लिए भी काम को अधिक सुगम बनाना है।
हैंडलूम 4.0 में एआई और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल
केंद्रीय मंत्री सिंह ने हैंडलूम 4.0 पहल का भी उल्लेख किया। इसके तहत करघों की उत्पादकता, गुणवत्ता और रखरखाव की निगरानी के लिए डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल किया जा रहा है। फिलहाल 100 करघों पर इसका पायलट परीक्षण चल रहा है, जिसके बाद इसे देशभर में विस्तारित करने की योजना है।
तकनीक कारीगरों को सशक्त बनाए, उनका स्थान न ले
गिरिराज सिंह ने कहा, “तकनीक को कारीगर को सशक्त बनाना चाहिए, कारीगर का स्थान नहीं लेना चाहिए।” उन्होंने कहा कि विजियोएनएक्सटी जैसे मंच बाजार की मांग का पूर्वानुमान लगाने, डिजाइन के रुझानों की पहचान करने, असली हथकरघा उत्पादों का प्रमाणीकरण करने और बुनकरों को सीधे वैश्विक बाजारों से जोड़ने में मदद कर सकते हैं।
उत्पाद विविधता और सीधी बाजार पहुंच से बढ़ेगी आय
उन्होंने कहा कि उत्पादों में अधिक विविधता, बेहतर ब्रांडिंग, वैल्यू एडिशन और सीधे बाजार तक पहुंच बुनकरों की आय बढ़ाने में मदद करेगी। दीर्घकालिक लक्ष्य यह है कि बुनकरों को सम्मानजनक और आकांक्षापूर्ण मासिक आय हासिल हो सके।
युवाओं से विरासत और उद्यमशीलता जोड़ने की अपील
केंद्रीय मंत्री सिंह ने बुनकरों को “उद्यमी, नवोन्मेषक और मूल्य सृजक” बताते हुए युवाओं से विरासत को रचनात्मकता और उद्यमशीलता के साथ जोड़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इससे भारत के हथकरघा क्षेत्र की अगली विकास यात्रा को नई दिशा मिल सकती है।
हर खरीद बुनकर की आजीविका और विरासत को देती है मजबूती
गिरिराज सिंह ने कहा कि हथकरघा उत्पाद की हर खरीद केवल बुनकर की आजीविका को मजबूत नहीं करती, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षित करती है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक हस्तनिर्मित उत्पाद भारत की कहानी को वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने का माध्यम बन सकता है।




