
रायपुर डेस्क। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पिछले कुछ दिनों में ऐसे घटनाक्रम हुए हैं जिन्होंने भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए नए सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत दौरे के दौरान रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान पर खास ध्यान देकर नई बहस छेड़ दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकताओं में बदलाव के संकेत दिख रहे हैं। अब अमेरिका सिर्फ भारत पर निर्भर रहने के बजाय दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व में अपने विकल्प बढ़ाने की रणनीति पर काम करता नजर आ रहा है।
सबसे ज्यादा चर्चा ट्रंप की उस अपील की हो रही है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान से अब्राहम समझौते में शामिल होने की बात कही। लेकिन पाकिस्तान के लिए यह आसान फैसला नहीं है। फिलिस्तीन मुद्दे पर पाकिस्तान का लंबे समय से स्पष्ट रुख रहा है और देश के भीतर भी इसराइल को मान्यता देने का विरोध मजबूत माना जाता है।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर पाकिस्तान इस दिशा में कोई कदम बढ़ाता है तो उसका असर सिर्फ मध्य पूर्व की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कश्मीर जैसे मुद्दों पर भी उसके रुख को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।
उधर भारत के लिए भी कुछ संकेत चिंता बढ़ाने वाले माने जा रहे हैं। क्वाड को लेकर ट्रंप प्रशासन पहले जितना सक्रिय नजर नहीं आ रहा। जानकारों का मानना है कि अमेरिका अब चीन के साथ रिश्तों को भी नए तरीके से संतुलित करने की कोशिश कर रहा है, जिससे भारत की रणनीतिक अहमियत को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि रक्षा, तकनीक और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भारत अब भी अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार बना रहेगा। लेकिन मौजूदा हालात में पाकिस्तान की जरूरत अमेरिका को कुछ खास क्षेत्रीय कारणों से ज्यादा महसूस हो रही है।
कुल मिलाकर दक्षिण एशिया, चीन और मध्य पूर्व की बदलती राजनीति के बीच भारत और Pakistan दोनों के सामने नई कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी होती दिखाई दे रही हैं।




