
सावन के पवित्र महीने की आज गुरुवार से शुरुवात हो गई हैं। देश भर के लोगों ने पूरी श्रद्धा के साथ सावन के पवित्र महीने का स्वागत किया। सुबह से ही हजारों भक्त भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए शिव मंदिरों में जमा हुए। सावन को श्रावण मास भी कहा जाता है। यह हिंदू पंचांग का पांचवां महीना है और पूरी तरह भगवान शिव की आराधना को समर्पित माना जाता है। मानसून के समय जुलाई और अगस्त में पड़ने वाला यह पवित्र महीना हिंदू धर्म में सबसे शुभ समयों में से एक है।
देश भर में लाखों भक्त व्रत रखकर, विशेष पूजा-अर्चना करके, मंदिरों में जाकर और तीर्थयात्रा करके इस महीने को मनाते हैं। इस महीने में वार्षिक कांवड़ यात्रा भी होती है, जिसके दौरान कांवड़िये गंगा से पवित्र जल लेने के लिए लंबी पैदल यात्रा करते हैं और उसे वापस लाकर भगवान शिव के मंदिरों में शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। सावन के दौरान भक्त नियमित रूप से शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग का पारंपरिक ‘अभिषेक’ करते हैं। इसके लिए दूध, शहद, दही, घी, जल और पवित्र बेलपत्र का इस्तेमाल किया जाता है, जिनका शिव पूजा में विशेष महत्व है।
सावन माह का महत्व
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सावन के महीने में ही समुद्र मंथन हुआ था। मंथन के दौरान विष निकला, जिससे पूरी सृष्टि के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा। माना जाता है कि भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को पी लिया और उसे अपने गले में ही रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें ‘नीलकंठ’ नाम मिला।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए सावन के महीने में ही कठोर तपस्या की थी। इसलिए, समृद्धि, वैवाहिक सुख और आध्यात्मिक कल्याण के लिए आशीर्वाद चाहने वाले भक्तों के लिए यह समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। पूरे महीने भक्त भगवान शिव के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए हर सोमवार को व्रत रखते हैं। ये व्रत इस विश्वास के साथ रखे जाते हैं कि सावन के दौरान की गई सच्ची प्रार्थनाओं से शांति, समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
भारत के 12 ज्योतिर्लिंग
सावन के इस पवित्र महीने में आपको भारत के अत्यंत महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंगों के बारे में बताते हैं, जो शिव शक्ति के वो 12 पवित्र स्थल हैं,जहां भगवान शिव स्वयंभू प्रकट हुए। इनका नाम हैं-
1. सोमनाथ (गुजरात)
2. मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश)
3. महाकालेश्वर (मध्य प्रदेश)
4. ओम्केश्वर (मध्य प्रदेश)
5. केदारनाथ (उत्तराखंड)
6. भीमाशंकर (महाराष्ट्र)
7. विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश)
8. त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र)
9. बैजनाथ (हिमाचल प्रदेश)
10. रामेश्वरम (तमिलनाडु)
11. घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र)
12. नागेश्वर (गुजरात)
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग
आज आपको सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के बारे में बताते हैं। सोमनाथ भारत के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। गुजरात के सौराष्ट्र में समुद्र तट के निकट प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ भारत के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। शिव पुराण में वर्णित सबसे पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक इस मंदिर में स्थापित है। इसे भगवान शिव, भगवान कृष्ण और शक्ति की आराधना के लिए श्रद्धेय माना जाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में सोमनाथ को 12 ज्योतिर्लिंगों में अग्रणी माना गया है। यह भारत की आध्यात्मिक और सभ्यतागत विरासत में इसके अग्रणी स्थान को प्रतिबिंबित करता है। सोमनाथ भगवान शिव के बारह आदि ज्योतिर्लिंगों में प्रथम के रूप में एक अत्यंत पवित्र स्थान रखता है। सोमनाथ का जन्म प्राचीन भारतीय परंपरा में गहराई से अंतर्निहित है। यह स्थल भगवान शिव और चंद्र देवता की आराधना से निकटता से जुड़ा है।
सोमनाथ मंदिर अरब सागर के तट पर भव्यता के साथ खड़ा हैं
मंदिर परिसर में गर्भगृह, सभा मंडप और नृत्य मंडप शामिल हैं। यह अरब सागर के तट पर भव्यता के साथ खड़ा है। इस मंदिर के शिखर की ऊँचाई 150 फुट है, जिसके शीर्ष पर 10 टन का एक कलश सुशोभित है। इसका 27 फुट ऊँचा ध्वजदंड मंदिर की शाश्वत आध्यात्मिक उपस्थिति का प्रतीक है। इस परिसर में 1,666 स्वर्ण-मंडित कलश और 14,200 ध्वज हैं, जो सदियों की भक्ति और शिल्प-कौशल को दर्शाते हैं।
सोमनाथ मंदिर को कई बार लूटा गया, तहस-नहस किया गया
सदियों तक सोमनाथ ने निर्माण के कई चरण देखे। प्राचीन परंपराओं के अनुसार मंदिर को अनेक बार अलग-अलग सामग्रियों के उपयोग से बनाया गया जो नवीकरण और निरंतरता का प्रतीक है। आक्रांताओं ने सदियों तक सोमनाथ मंदिर को बार-बार तहस-नहस किया और लूटा। लेकिन हर बार श्रद्धालुओं और शासकों ने मंदिर का पुनर्निर्माण कर इसके खोए हुए गौरव को बहाल किया। सोमनाथ के इतिहास का सबसे उथल-पुथल भरा दौर 11वीं सदी में आरंभ हुआ। इस मंदिर पर आक्रांताओं का पहला ज्ञात हमला जनवरी 1026 में किया गया। इसके साथ ही एक लंबे काल की शुरुआत हुई जिस दौरान 11वीं और 18वीं सदी के बीच मंदिर का बार-बार विध्वंस किया गया।
श्रद्धालुओं और राजाओं ने आगे आकर किया पुनर्निर्माण
लेकिन जब भी मंदिर को तोड़ा गया, श्रद्धालुओं और राजाओं ने आगे आकर उसका पुनर्निर्माण किया। इनमें राजा कुमारपाल प्रमुख रहे जिन्होंने 12वीं सदी के मंदिर को फिर से बनवाया। जूनागढ़ के महाराज ने 13वीं सदी में इसका पुनर्निर्माण कराया। एक और विध्वंस के बाद 18वीं सदी में इंदौर की मराठा साम्राज्ञी लोकमाता अहिल्याबाई होलकर ने सोमनाथ में एक नए मंदिर को प्रतिस्थापित किया। इस तरह, बार-बार विध्वंस के बावजूद सोमनाथ का भारतीयों की सामूहिक चेतना से कभी भी लोप नहीं हुआ।
स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1947 में सोमनाथ के अवशेषों की यात्रा करते हुए मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प व्यक्त किया। उनका विश्वास था कि भारत के सांस्कृतिक आत्मविश्वास की पुनस्र्थापना के लिए सोमनाथ का पुनर्निर्माण अनिवार्य है। जनभागीदारी और राष्ट्रीय संकल्प के सहयोग से वर्तमान मंदिर का निर्माण कैलाश महामेरू प्रसाद स्थापत्य शैली में किया गया।
1951 में हुआ इसका ऐतिहासिक पुनर्निर्माण
11 मई, 1951 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का समारोह पूर्वक प्रतिष्ठापन किया। पौराणिक महत्व से लेकर 1951 में इसके ऐतिहासिक पुनर्निर्माण तक, सोमनाथ न केवल एक पवित्र मंदिर है, बल्कि यह सांस्कृतिक गौरव और राष्ट्रीय पुनरुत्थान की एक सामूहिक अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।
सोमनाथ की विरासत के साथ लोगों के जुड़ाव को और गहरा किया
सांस्कृतिक पहलकदमियों ने सोमनाथ की विरासत के साथ लोगों के जुड़ाव को और गहरा किया है। यहाँ ‘लाइट एंड साउंड शो’ की शुरुआत 2003 में हुई थी और 2017 में इसे आधुनिक बनाया गया। आज इसमें प्रभावी कथा वर्णन और 3डी लेजर तकनीक का उपयोग किया जाता है। ‘वंदे सोमनाथ कला महोत्सव’ जैसे कार्यक्रमों ने 1,500 साल पुरानी नृत्य परंपराओं को पुनर्जीवित किया है।
सोमनाथ पूजा-अर्चना, सांस्कृतिक पुनरुद्धार, निरंतरता और समावेशी विकास के एक जीवंत केंद्र के रूप में लगातार विकसित हो रहा है। सोमनाथ पूजा और तीर्थयात्रा का एक जीवंत केंद्र बना हुआ है। लाखों श्रद्धालु यहां प्रतिवर्ष पहुंचते हैं। बिल्व पूजा जैसे अनुष्ठान हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं।




