
नई दिल्ली: निचली अदालतों में जज बनने की तैयारी कर रहे कानून के छात्रों और युवा वकीलों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अहम राहत दी है। सर्वोच्च अदालत ने मई 2025 में दिए अपने फैसले में बदलाव करते हुए एंट्री-लेवल न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए जरूरी तीन साल की वकालत की अनिवार्यता को घटाकर एक साल कर दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ए.जी. मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 2:1 के बहुमत से समीक्षा याचिका पर फैसला सुनाया।

अब क्या होगा बदलाव?
नए फैसले के बाद न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने के लिए उम्मीदवार को तीन साल की जगह एक साल का प्रैक्टिस अनुभव रखना होगा। हालांकि, अदालत ने संक्रमण अवधि के तौर पर विशेष व्यवस्था भी की है। 25 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होने वाली न्यायिक परीक्षाओं के लिए एक साल का अनुभव भी अनिवार्य नहीं होगा। यानी इस अवधि में नए लॉ ग्रेजुएट्स भी परीक्षा में हिस्सा ले सकेंगे। चयनित उम्मीदवारों को हालांकि सीधे न्यायिक पद पर नियुक्त नहीं किया जाएगा। उन्हें पहले एक साल तक ट्रेनी ज्यूडिशियल ऑफिसर के तौर पर काम करना होगा और निर्धारित ट्रेनिंग व क्लर्कशिप पूरी करनी होगी।
1 अप्रैल 2027 से नया नियम
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाले परीक्षा नोटिफिकेशन पर संशोधित व्यवस्था लागू होगी। इसके तहत उम्मीदवारों के पास परीक्षा में शामिल होने के लिए कम से कम एक साल की वकालत का अनुभव होना जरूरी होगा।
कोर्ट ने क्यों बदला अपना फैसला?
अदालत ने माना कि मई 2025 में बिना पर्याप्त संक्रमण अवधि दिए अचानक तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त लागू करने से नए कानून स्नातकों और युवा वकीलों के सामने परेशानी पैदा हुई। कोर्ट का कहना है कि न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों को वकालत का व्यावहारिक अनुभव मिलना जरूरी है, लेकिन नियम लागू करते समय ऐसे अभ्यर्थियों के हितों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए जो पहले से परीक्षा की तैयारी कर रहे थे।
मई 2025 में क्या हुआ था?
दरअसल, मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने फ्रेश लॉ ग्रेजुएट्स के सीधे न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने की व्यवस्था में बदलाव करते हुए तीन साल की प्रैक्टिस अनिवार्य कर दी थी। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं। जुलाई 2025 में अदालत ने इन याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा था। अब सुप्रीम कोर्ट ने समीक्षा याचिका पर फैसला सुनाते हुए तीन साल की शर्त को घटाकर एक साल कर दिया है और बीच की अवधि के लिए उम्मीदवारों को विशेष राहत दी है।





