
मानव सभ्यता की पहचान केवल भौतिक प्रगति, साम्राज्यों के विस्तार या युद्धों की विजयों से नहीं होती, बल्कि उसकी वास्तविक पहचान उसकी सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक स्मृतियों, कलात्मक अभिव्यक्तियों और ज्ञान परंपराओं से निर्मित होती है। किसी भी समाज की सभ्यता और उसकी आत्मा को समझने के लिए उसके इतिहास, लोकजीवन, कला, साहित्य, विज्ञान और परंपराओं को जानना आवश्यक होता है। यही अमूल्य धरोहरें पीढ़ी-दर-पीढ़ी मानवता के अनुभव, संघर्ष, सृजन और विकास की कहानी कहती हैं।
प्राचीन मूर्तियां, दुर्लभ पांडुलिपियां, शिलालेख, चित्रकृतियां, सिक्के, हथियार, लोक कलाएं और ऐतिहासिक अवशेष केवल पुरानी वस्तुएं नहीं, बल्कि वे समय के जीवंत दस्तावेज हैं, जिनमें अतीत की संस्कृति, समाज और जीवन-दर्शन सुरक्षित रहता है। इन धरोहरों को संरक्षित कर मानव सभ्यता की स्मृतियों को जीवित रखने का महत्वपूर्ण कार्य संग्रहालय करते हैं। संग्रहालय ऐसे ज्ञान-केंद्र हैं, जहां इतिहास केवल पुस्तकों के पन्नों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से देखा, समझा और अनुभव किया जा सकता है।
वर्तमान समय में जब वैश्वीकरण, तकनीकी परिवर्तन और उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव से पारंपरिक विरासतें और लोक संस्कृतियां धीरे-धीरे विलुप्ति के संकट का सामना कर रही हैं, तब संग्रहालयों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। संग्रहालय न केवल सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का कार्य करते हैं, बल्कि वे नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, परंपराओं और राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ने का भी सशक्त माध्यम बनते हैं। इसी महत्व को रेखांकित करने तथा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 18 मई को “अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस” मनाया जाता है। यह दिवस मानवता को अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूक रहने तथा उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने का संदेश देता है।
इतिहास, उद्देश्य और वैश्विक दृष्टि
अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस की शुरुआत वर्ष 1977 में International Council of Museums (ICOM) द्वारा की गई थी। ICOM की स्थापना वर्ष 1946 में संग्रहालयों के संरक्षण, विकास और वैश्विक सहयोग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से की गई थी। इस संस्था ने अनुभव किया कि संग्रहालय केवल अतीत के अवशेषों को सुरक्षित रखने वाले संस्थान नहीं हैं, बल्कि वे शिक्षा, संवाद, सांस्कृतिक समन्वय और सामाजिक जागरूकता के महत्वपूर्ण केंद्र भी हैं। इसी सोच के साथ 18 मई को “अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। तब से प्रत्येक वर्ष यह दिवस किसी विशेष थीम के आधार पर मनाया जाता है। इन थीमों के माध्यम से संग्रहालयों की बदलती भूमिका, डिजिटल नवाचार, पर्यावरणीय चेतना, सामाजिक समावेशन, सांस्कृतिक विविधता और सतत विकास जैसे विषयों पर वैश्विक विमर्श किया जाता है।
आज यह दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं रह गया है, बल्कि यह सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का वैश्विक अभियान बन चुका है। विश्व के हजारों संग्रहालय इस अवसर पर विशेष प्रदर्शनी, संगोष्ठी, कार्यशाला, सांस्कृतिक कार्यक्रम और शैक्षिक गतिविधियों का आयोजन करते हैं, ताकि आम जनता विशेषकर युवा पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ा जा सके। यूनेस्को के अनुसार, “सांस्कृतिक धरोहरें किसी भी राष्ट्र की अदृश्य रीढ़ होती हैं।” संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (SDG-11.4) में भी विश्व की सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक विरासत के संरक्षण को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस वैश्विक सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने का माध्यम बन चुका है।
संग्रहालय : अतीत और वर्तमान के बीच जीवंत सेतु
“संग्रहालय” शब्द सुनते ही हमारे मन में इतिहास, कला और संस्कृति से जुड़ी दुर्लभ वस्तुओं का चित्र उभरता है। वास्तव में संग्रहालय वह स्थान है जहां मानव सभ्यता से संबंधित ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और कलात्मक धरोहरों को सुरक्षित रखा जाता है। पर संग्रहालयों की भूमिका केवल संरक्षण तक सीमित नहीं है। वे समाज को ज्ञान, प्रेरणा और ऐतिहासिक चेतना भी प्रदान करते हैं।
संग्रहालय हमें बताते हैं कि हमारे पूर्वज कैसे रहते थे, उनकी जीवन शैली क्या थी, उन्होंने कला, विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में क्या योगदान दिया तथा किस प्रकार मानव समाज ने विकास की यात्रा तय की। वे इतिहास को केवल पढ़ने की वस्तु नहीं रहने देते, बल्कि उसे अनुभव करने योग्य बना देते हैं। जब कोई विद्यार्थी किसी प्राचीन मूर्ति, स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दस्तावेज, युद्ध में प्रयुक्त हथियार, सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष या किसी महान कलाकार की चित्रकृति को प्रत्यक्ष देखता है, तब इतिहास उसके लिए जीवंत हो उठता है। यही कारण है कि संग्रहालयों को “जीवंत शिक्षण संस्थान” कहा जाता है।
संग्रहालयों के प्रमुख प्रकार और उनकी विशेषताएं
मानव जीवन और ज्ञान के विविध क्षेत्रों के आधार पर संग्रहालयों के अनेक प्रकार विकसित हुए हैं। प्रत्येक संग्रहालय मानव सभ्यता के किसी विशेष पक्ष को संरक्षित और प्रस्तुत करता है। ऐतिहासिक संग्रहालय: ऐतिहासिक संग्रहालयों में प्राचीन सभ्यताओं, युद्धों, स्वतंत्रता आंदोलनों और ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी वस्तुओं का संरक्षण किया जाता है। ये संग्रहालय इतिहास को जीवंत रूप में प्रस्तुत करते हैं तथा समाज को अतीत से सीखने की प्रेरणा देते हैं।कला संग्रहालय: चित्रकला, मूर्तिकला, लोक कला और शास्त्रीय कलाओं का प्रदर्शन कला संग्रहालयों की प्रमुख विशेषता है।
ये संग्रहालय मानव की सृजनात्मक प्रतिभा, संवेदनशीलता और सौंदर्यबोध का परिचय कराते हैं। विज्ञान संग्रहालय: विज्ञान एवं तकनीक के विकास, वैज्ञानिक खोजों और आधुनिक आविष्कारों को प्रदर्शित करने वाले विज्ञान संग्रहालय विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी होते हैं। ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक सोच को विकसित करते हैं। पुरातत्व संग्रहालय: उत्खनन से प्राप्त प्राचीन अवशेष, मूर्तियां, सिक्के, शिलालेख और पांडुलिपियां पुरातत्व संग्रहालयों में सुरक्षित रखी जाती हैं। ये प्राचीन सभ्यताओं के अध्ययन और इतिहास के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लोक एवं जनजातीय संग्रहालय: ये संग्रहालय लोक संस्कृति, आदिवासी जीवन, पारंपरिक वस्त्र, लोक संगीत, हस्तशिल्प और ग्रामीण जीवन शैली को संरक्षित करते हैं। इनके माध्यम से सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण संभव हो पाता है। प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय: वन्य जीव, जीवाश्म, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी वस्तुएं इन संग्रहालयों में प्रदर्शित की जाती हैं। ये पर्यावरणीय चेतना और प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाते हैं।
विश्व के प्रसिद्ध संग्रहालय और उनका वैश्विक महत्व
विश्व में अनेक ऐसे संग्रहालय हैं जो मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहरों के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध हैं। ये संग्रहालय न केवल सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हैं, बल्कि वैश्विक पर्यटन, शिक्षा और शोध को भी नई दिशा प्रदान करते हैं। Louvre Museum: फ्रांस स्थित यह संग्रहालय विश्व का सबसे प्रसिद्ध कला संग्रहालय माना जाता है। यहां सुरक्षित “मोनालिसा” जैसी ऐतिहासिक चित्रकृतियां कला-जगत की अमूल्य धरोहर हैं। इसकी स्थापत्य भव्यता और विशाल कला-संग्रह इसे विश्व संस्कृति का प्रतीक बनाते हैं। British Museum: यह संग्रहालय मानव इतिहास और विश्व सभ्यताओं के विशाल संग्रह के लिए प्रसिद्ध है। यहां मिस्र, यूनान, रोम और एशियाई सभ्यताओं से जुड़ी दुर्लभ वस्तुएं सुरक्षित हैं। Metropolitan Museum of Art: कला और संस्कृति का यह महान केंद्र विश्व की सबसे महत्वपूर्ण कलात्मक संस्थाओं में गिना जाता है। यहां विभिन्न कालखंडों की कला-कृतियों का विशाल संग्रह है। Vatican Museums: धार्मिक एवं पुनर्जागरण कालीन कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध यह संग्रहालय विश्व कला इतिहास का अद्वितीय केंद्र है। इन संग्रहालयों ने यह सिद्ध किया है कि सांस्कृतिक संरक्षण केवल अतीत को बचाना नहीं, बल्कि मानवता की साझा पहचान को सुरक्षित रखना भी है।
भारत के प्रमुख संग्रहालय और सांस्कृतिक विरासत
भारत की सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक समृद्धि विश्व में अद्वितीय है। यहां के संग्रहालय हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता और सांस्कृतिक चेतना को संरक्षित किए हुए हैं। Indian Museum: भारत का सबसे पुराना और एशिया का सबसे बड़ा संग्रहालय माना जाने वाला यह संस्थान प्राचीन मूर्तियों, जीवाश्मों, दुर्लभ सिक्कों और पुरातात्विक अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है। National Museum: यह संग्रहालय भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मौर्य, गुप्त और मुगल काल तक की अमूल्य धरोहरें सुरक्षित हैं।Salar Jung Museum: दुर्लभ कलाकृतियों और ऐतिहासिक संग्रहों के लिए प्रसिद्ध यह संग्रहालय विश्व के सबसे बड़े निजी संग्रहों में से एक माना जाता है। Chhatrapati Shivaji Maharaj Vastu Sangrahalaya: भारतीय कला, पुरातत्व और सांस्कृतिक धरोहर का यह महत्वपूर्ण केंद्र स्थापत्य सौंदर्य और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। इन संग्रहालयों में सुरक्षित पांडुलिपियां, मूर्तियां, चित्रकृतियां और सांस्कृतिक अवशेष भारतीय सभ्यता की गौरवशाली परंपरा का परिचय कराते हैं।
भारतीय संस्कृति और संग्रहालयों की भूमिका
भारत “विविधता में एकता” का देश है। यहां विभिन्न भाषाएं, परंपराएं, लोक कलाएं और सांस्कृतिक मान्यताएं सदियों से सहअस्तित्व में रही हैं। संग्रहालय इस विविधता को संरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। वे लोक संस्कृति, जनजातीय परंपराओं, शास्त्रीय कलाओं, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक धरोहरों का दस्तावेजीकरण करते हैं। संग्रहालय नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं। वे “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भारतीय भावना को भी सशक्त बनाते हैं, जहां पूरी मानवता को एक परिवार के रूप में देखा जाता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 49 में भी राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों और कलात्मक वस्तुओं के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण आधार है। प्रसिद्ध कला इतिहासकार डॉ. आनंद कुमारस्वामी ने कहा था “एक राष्ट्र तब तक अपनी आत्मा को नहीं पहचान सकता, जब तक वह अपनी कला और इतिहास के भौतिक रूपों के प्रति संवेदनशील न हो जाए।”यह कथन संग्रहालयों की वास्तविक आवश्यकता और महत्व को स्पष्ट करता है।
शिक्षा और शोध में संग्रहालयों की भूमिका
संग्रहालय विद्यार्थियों के लिए अनुभवात्मक शिक्षा के सबसे प्रभावशाली केंद्र हैं। पुस्तकों में पढ़ा गया इतिहास जब मूर्तियों, चित्रों और पुरावशेषों के रूप में आंखों के सामने आता है, तब शिक्षा अधिक रोचक और प्रभावशाली बन जाती है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी संग्रहालयों के माध्यम से इतिहास, कला, संस्कृति और विज्ञान को व्यवहारिक रूप में समझते हैं। यही कारण है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति में संग्रहालय भ्रमण को महत्वपूर्ण शैक्षिक गतिविधि माना जा रहा है। इतिहास, पुरातत्व, मानव विज्ञान, संस्कृति और कला के शोधार्थियों के लिए संग्रहालय प्रमाणिक स्रोत का कार्य करते हैं। यहां सुरक्षित सामग्री शोध एवं अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अनेक ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि संग्रहालयों में संरक्षित अवशेषों के आधार पर ही संभव हो पाती है।
डिजिटल युग और आधुनिक संग्रहालयों की नई भूमिका
तकनीकी विकास ने संग्रहालयों की पारंपरिक कार्यप्रणाली को व्यापक रूप से बदल दिया है। आज संग्रहालय केवल भौतिक भवनों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से विश्वभर में पहुंच बना रहे हैं। वर्चुअल संग्रहालय, डिजिटल प्रदर्शनी, 3D तकनीक, ऑडियो गाइड, इंटरैक्टिव डिस्प्ले और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने संग्रहालयों को अधिक आकर्षक और सुलभ बना दिया है। अब कोई भी व्यक्ति इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे विश्व के प्रसिद्ध संग्रहालयों का भ्रमण कर सकता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन संग्रहालय भ्रमण की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। इस अवधि में अनेक संग्रहालयों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपनी प्रदर्शनी जनता तक पहुंचाई। भारत में राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली द्वारा प्रारंभ की गई “ई-संग्रहालय” परियोजना और वर्चुअल गैलरी इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। इस पहल ने यह सिद्ध किया कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से सांस्कृतिक धरोहरों को विश्व के किसी भी कोने तक पहुंचाया जा सकता है। डिजिटल अभिलेखीकरण के माध्यम से दुर्लभ पांडुलिपियों और प्राचीन धरोहरों को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखने का प्रयास भी किया जा रहा है। यह आधुनिक संरक्षण पद्धति भविष्य के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है।
संग्रहालय और सांस्कृतिक पर्यटन
संग्रहालय सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक किसी राष्ट्र की संस्कृति और इतिहास को समझने के लिए संग्रहालयों का भ्रमण करते हैं। “हेरिटेज टूरिज्म” अर्थात विरासत पर्यटन की अवधारणा संग्रहालयों के कारण ही अधिक लोकप्रिय हुई है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है तथा रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होते हैं। होटल, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय कला और पर्यटन उद्योग को इससे विशेष लाभ मिलता है। संग्रहालय किसी राष्ट्र की “सॉफ्ट पावर” को भी मजबूत करते हैं। वे विश्व समुदाय के समक्ष उस देश की सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक गौरव और सभ्यतागत समृद्धि को प्रस्तुत करते हैं।
संग्रहालयों के समक्ष समकालीन चुनौतियां
यद्यपि संग्रहालय मानव सभ्यता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, फिर भी वे अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। वित्तीय संसाधनों की कमी: अनेक छोटे और क्षेत्रीय संग्रहालयों के पास धरोहरों के संरक्षण और आधुनिक सुविधाओं के विकास के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध नहीं है। संरक्षण संबंधी कठिनाइयां : प्राचीन वस्तुओं को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखना अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। तापमान, नमी, प्रदूषण और समय के प्रभाव से अनेक ऐतिहासिक वस्तुएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। ऐतिहासिक धरोहरों की चोरी और तस्करी: विश्वभर में प्राचीन मूर्तियों और दुर्लभ कलाकृतियों की तस्करी एक गंभीर समस्या बन चुकी है। अनेक देशों की सांस्कृतिक धरोहरें अवैध रूप से विदेशों तक पहुंच चुकी हैं। युवाओं की घटती रुचि: डिजिटल मनोरंजन और सोशल मीडिया के युग में युवा पीढ़ी की रुचि इतिहास और संग्रहालयों की ओर अपेक्षाकृत कम होती जा रही है। यह सांस्कृतिक चेतना के लिए चिंताजनक स्थिति है। युद्ध और प्राकृतिक आपदाएं: युद्ध, आतंकवाद और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सांस्कृतिक धरोहरों को भारी क्षति पहुंचती है। विश्व के अनेक क्षेत्रों में संघर्षों के कारण अमूल्य विरासत नष्ट हो चुकी है।
संरक्षण और संवर्धन के आवश्यक उपाय
संग्रहालयों के संरक्षण और विकास के लिए सरकार, निजी संस्थानों और समाज के संयुक्त प्रयास आवश्यक हैं। डिजिटल अभिलेखीकरण और आधुनिक संरक्षण तकनीकों का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए। विद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर संग्रहालय भ्रमण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। स्थानीय संस्कृति आधारित संग्रहालयों की स्थापना की जानी चाहिए। युवाओं को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने हेतु जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP Model) को बढ़ावा देकर संग्रहालयों के वित्तीय संसाधनों को मजबूत किया जा सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वर्चुअल रियलिटी और इंटरैक्टिव तकनीकों का उपयोग करके संग्रहालयों को आधुनिक एवं आकर्षक बनाया जाना चाहिए। यदि समाज अपनी धरोहरों के प्रति संवेदनशील बनेगा, तभी संग्रहालयों का वास्तविक उद्देश्य सफल हो सकेगा।
समकालीन संदर्भ में संग्रहालयों की अनिवार्यता
आज वैश्वीकरण और तीव्र आधुनिकीकरण के कारण विश्व तेजी से बदल रहा है। अनेक पारंपरिक संस्कृतियां, भाषाएं और लोक कलाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं। ऐसे समय में संग्रहालय सांस्कृतिक स्मृति के संरक्षक बनकर उभरते हैं। संग्रहालय केवल अतीत की सुरक्षा नहीं करते, बल्कि मानवता की सामूहिक पहचान को भी संरक्षित रखते हैं। वे समाज को यह सिखाते हैं कि विकास का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ आगे बढ़ना है। नई पीढ़ी को इतिहास, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ने में संग्रहालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे समाज में सहिष्णुता, विविधता और सांस्कृतिक समन्वय की भावना को भी मजबूत करते हैं।
सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का जन आंदोलन
अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि संग्रहालय केवल प्राचीन वस्तुओं के संग्रहालय नहीं हैं, बल्कि वे मानव सभ्यता की चेतना, संस्कृति, ज्ञान और सामूहिक स्मृतियों के जीवंत केंद्र हैं। वे अतीत, वर्तमान और भविष्य के मध्य ऐसा सशक्त सेतु निर्मित करते हैं, जो समाज को उसकी ऐतिहासिक जड़ों, सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत मूल्यों से जोड़े रखता है। संग्रहालय मानवता की साझा विरासत के संवाहक हैं; वे हमें इतिहास से सीखने, संस्कृति को समझने और भविष्य को अधिक संवेदनशील, समृद्ध तथा संतुलित बनाने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। वास्तव में, जिस समाज के पास अपने अतीत को स्मरण रखने और उसे संरक्षित करने की चेतना नहीं होती, उसका भविष्य भी धीरे-धीरे दिशाहीन हो जाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संग्रहालय संरक्षण को केवल सरकारी दायित्व मानकर सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे व्यापक जन-जागरण और सांस्कृतिक जन आंदोलन का स्वरूप दिया जाए। समाज, शैक्षणिक संस्थानों, सांस्कृतिक संगठनों, शोधकर्ताओं और युवा पीढ़ी को मिलकर इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। जब तक जनमानस अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को अपनी अस्मिता, गौरव और ऐतिहासिक विरासत का अभिन्न अंग मानकर उनके संरक्षण के लिए आगे नहीं आएगा, तब तक इतिहास की इन अमूल्य निधियों को सुरक्षित रखना संभव नहीं हो सकेगा।
आइए, अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि अपनी सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक धरोहरों और सभ्यता की अमूल्य स्मृतियों के संरक्षण एवं संवर्धन में सक्रिय सहभागिता निभाएंगे, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा प्राप्त कर सकें और मानव सभ्यता की यह अनमोल धरोहर सदैव सुरक्षित, संरक्षित और जीवंत बनी रहे।





