
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि ग्रीन अमोनिया खरीद समझौतों और ग्रीन अमोनिया आपूर्ति समझौतों का आदान-प्रदान भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है यह विशेष रूप से ऐसे समय में और महत्वपूर्ण हो जाता है जब पूरी दुनिया अनिश्चितता का सामना कर रही है।
कल सोमवार को प्रह्लाद जोशी अटल अक्षय ऊर्जा भवन में आयोजित ‘राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन’ के तहत उर्वरक क्षेत्र के लिए ग्रीन अमोनिया समझौतों के आदान-प्रदान कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्री जे.पी. नड्डा भी उपस्थित थे।
केंद्रीय मंत्री जोशी ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह साबित कर दिया है कि आर्थिक विकास और जलवायु कार्रवाई एक साथ बड़े पैमाने पर और तेज़ी से आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत आज दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा बाजारों में से एक है और 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल करने की राह पर है।
मंत्री ने कहा कि उद्योग, भारतीय सौर ऊर्जा निगम (एसईसीआई) और उर्वरक कंपनियों के बीच 10 वर्ष की अवधि के लिए हुए समझौते इन परियोजनाओं को चालू करने की दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। ये दीर्घकालिक समझौते मांग की निश्चितता प्रदान करते हैं, वित्तीय समापन को संभव बनाते हैं, और हरित अमोनिया उत्पादन में बड़े पैमाने पर निवेश का समर्थन करते हैं।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। उन्होंने महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आयात पर निर्भरता कम करने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि आयातित ‘ग्रे अमोनिया’ को ‘हरित अमोनिया’ से बदलने से घरेलू क्षमता मज़बूत होगी और लचीली आपूर्ति श्रृंखलाएं बनेंगी। इस पहल से उम्मीद है कि गैर-यूरिया आधारित उर्वरक इकाइयों में आयातित ग्रे अमोनिया को बदलने के माध्यम से, 10 वर्ष की अवधि में लगभग 2.5 बिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
जोशी ने यह भी कहा कि भारत के ऊर्जा संक्रमण का अगला चरण उन क्षेत्रों पर केंद्रित होगा जिनमें उत्सर्जन कम करना कठिन होता है—जैसे उर्वरक, रिफाइनरी, इस्पात और परिवहन। इन क्षेत्रों में हरित हाइड्रोजन और उसके व्युत्पन्न (डेरिवेटिव्स) महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने कहा कि हरित अमोनिया न केवल स्वच्छ फीडस्टॉक के रूप में काम करेगा, बल्कि नया औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने, रोज़गार सर्जन और निवेश आकर्षित करने में भी सहायता करेगा।
वहीं केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा ने इस पहल को देश में मज़बूत हरित अमोनिया पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की दिशा में ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम बताया। उन्होंने कहा कि ये समझौते भारत में हरित अमोनिया के परिचालन की शुरुआत का प्रतीक हैं, और उर्वरक क्षेत्र में टिकाऊ तथा किफायती समाधानों को बढ़ावा देने के प्रति सरकार की मज़बूत प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
गौरतलब हो, भारत सरकार ‘राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन’ को ₹19,744 करोड़ के बजट के साथ लागू कर रही है। इसका उद्देश्य भारत को ग्रीन हाइड्रोजन और उससे बनने वाले उत्पादों के उत्पादन, इस्तेमाल और निर्यात के लिए वैश्विक केंद्र के तौर पर स्थापित करना है। इस मिशन का लक्ष्य 2030 तक प्रति वर्ष कम से कम 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करना है। इसके साथ ही, इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों को कार्बन-मुक्त बनाना, ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाना और निवेश को आकर्षित करना भी है।




