
पश्चिमी एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते युद्ध के हालातों ने पूरी दुनिया की सप्लाई चेन को हिला दिया है। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक इन देशों पर निर्भर है, इसलिए इन गैसों के अंतर और संकट को समझना आपके लिए बहुत जरूरी है। अक्सर लोग इन चारों को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन असल में ये गैस के अलग-अलग रूप हैं जिनका इस्तेमाल हमारी रसोई से लेकर गाड़ियों और फैक्ट्रियों तक अलग-अलग तरीके से होता है। आइए, इन्हें विस्तार से समझते हैं:
- LPG (Liquefied Petroleum Gas – रसोई गैस)
यह वह गैस है जो आपके घर में लाल सिलेंडर में आती है। यह कच्चा तेल (Crude Oil) साफ करते समय निकलती है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 50-60% LPG सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे देशों से आयात करता है। अगर वहां युद्ध की स्थिति बनती है, तो कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी और आपके रसोई गैस सिलेंडर के दाम भी बढ़ सकते हैं। मुख्य रूप से इसका इस्तेमाल खाना पकाने के लिए होता है।
- LNG (Liquefied Natural Gas – तरल प्राकृतिक गैस)
जब नेचुरल गैस को बहुत ठंडा करके तरल (Liquid) बना दिया जाता है, तो उसे LNG कहते हैं। इसे बड़े जहाजों के जरिए एक देश से दूसरे देश भेजा जाता है। भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा LNG आयातक है और हमारा सबसे बड़ा सप्लायर कतर है। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे समुद्री रास्ते बंद होते हैं, तो भारत में गैस की भारी किल्लत हो सकती है। इसका इस्तेमाल बिजली बनाने, खाद फैक्ट्रियों और भारी उद्योगों में होता है।
- PNG (Piped Natural Gas – पाइप वाली गैस)
यह वही नेचुरल गैस है जो पाइप के जरिए सीधे आपकी रसोई तक पहुंचती है। PNG सीधे तौर पर LNG के आयात पर निर्भर है। अगर विदेशों से आने वाली LNG महंगी हुई या उसकी सप्लाई रुकी, तो शहरों में मिलने वाली पाइप वाली गैस (PNG) के दाम भी बढ़ जाएंगे। शहरी इलाकों में सिलेंडरों के विकल्प के रूप में इसका इस्तेमाल होता है।
- CNG (Compressed Natural Gas – गाड़ियों वाली गैस)जब नेचुरल गैस को बहुत अधिक दबाव (Pressure) के साथ कंप्रेस किया जाता है, तो वह CNG बनती है। आपकी कार, ऑटो और बस में डलने वाली CNG भी आयातित गैस पर निर्भर है। मिडिल ईस्ट में तनाव का मतलब है गैस की कमी और कीमतों में उछाल, जिससे सीधे तौर पर आपका सफर महंगा हो सकता है। प्रदूषण मुक्त परिवहन में इसका यूज होता है।




