
गाजियाबाद : 31 वर्षीय हरीश राणा का मामला देश में इच्छा मृत्यु को लेकर एक नया और अहम मोड़ बनकर सामने आया है। 13 साल तक कोमा में रहने के बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से पैसिव यूथेनेशिया दिया गया, जिसे देश के पहले ऐसे मामलों में गिना जा रहा है, जहां न्यायिक मंजूरी के बाद जीवन रक्षक प्रणाली हटाई गई।2013 में चंडीगढ़ में एक हादसे के बाद हरीश राणा की जिंदगी पूरी तरह बदल गई थी। चौथी मंजिल से गिरने के कारण वे गंभीर रूप से घायल हो गए और क्वाड्रीप्लेजिया के शिकार होकर कोमा में चले गए। इसके बाद से वे लगातार लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर थे। वर्षों तक परिवार ने हर संभव इलाज करवाया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।

आखिरकार परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 11 मार्च को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी गई। इसके बाद उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया और 16 मार्च को उनकी फीडिंग ट्यूब हटा दी गई। 24 मार्च को उन्होंने अंतिम सांस ली।इस पूरे घटनाक्रम ने देशभर में इच्छामृत्यु को लेकर नई बहस छेड़ दी है। हालांकि Supreme Court of India पहले ही 2018 में पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दे चुका है, लेकिन हरीश राणा का मामला इस कानून के व्यावहारिक इस्तेमाल का बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है।

हरीश राणा के परिवार ने इस कठिन समय में भी इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए उनके अंगदान का फैसला लिया। डॉक्टरों के अनुसार, उनके अंगों से कई जरूरतमंदों को नई जिंदगी मिलने की उम्मीद है।यह मामला अब सिर्फ एक परिवार की पीड़ा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने पूरे समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि असहनीय पीड़ा में जीने और सम्मान के साथ विदा होने के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।




