
श्रावण माह की शुरुआत होते ही विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था का सैलाब उमड़ने लगता है। मान्यता है कि श्रावण सोमवार का व्रत रखकर बाबा महाकाल के दर्शन और पूजन करने से जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है और भक्तों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। वैसे तो पूरे श्रावण माह में बाबा महाकाल के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन श्रावण सोमवार का दिन बेहद खास होता है। इस दिन देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपवास रखकर भगवान शिव की आराधना करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रावण माह के प्रत्येक सोमवार को स्वयं बाबा महाकाल भी उपवास रखते हैं। इसी दिन बाबा महाकाल प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं। मान्यता है कि नगर भ्रमण से वापस लौटने के बाद ही बाबा महाकाल को भोग अर्पित किया जाता है।

महाकाल मंदिर में प्रतिदिन बाबा महाकाल की अलग-अलग आरतियां और भोग की परंपरा निभाई जाती है। सुबह सबसे पहले भस्म आरती होती है, जिसे वंश परंपरा से जुड़े पुजारी संपन्न कराते हैं। इसके बाद सुबह 7 बजे आरती होती है। इस दौरान बाबा महाकाल को चावल, दही और शक्कर का भोग लगाया जाता है। सामान्य दिनों में पूजा और श्रृंगार के बाद नियमित भोग अर्पित किया जाता है, लेकिन श्रावण सोमवार को बाबा महाकाल को फलाहार का भोग लगाया जाता है। सुबह 10 बजे पंचामृत पूजन के बाद बाबा महाकाल को दाल, चावल, रोटी, सब्जी, भजिए और लड्डू का भोग अर्पित किया जाता है। इसे भोग आरती कहा जाता है। शाम 5 बजे बाबा महाकाल का स्नान होने के बाद जलाभिषेक बंद कर दिया जाता है। इसके बाद भगवान का विशेष श्रृंगार किया जाता है और बाबा महाकाल राजा स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। शाम 7 बजे संध्या आरती होती है। इस दौरान बाबा को दूध का भोग लगाया जाता है। वहीं, रात 10 बजकर 20 मिनट पर शयन आरती के समय मेवे का प्रसाद अर्पित किया जाता है। इसके बाद मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं।

मंदिर के पुजारी पंडित महेश शर्मा के अनुसार, श्रावण माह में भगवान शिव के दर्शन और पूजा-अर्चना का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान शिव को जल, दुग्ध और बेलपत्र अर्पित करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। उन्होंने बताया कि एक से लेकर एक लाख तक बिल्व पत्र अर्पित करने का भी विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, बिल्व पत्र अर्पित करने से अनेक यज्ञों के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। पंडित महेश शर्मा के अनुसार, श्रावण माह में किए जाने वाले अधिकांश व्रत माता सती और माता पार्वती से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं से संबंधित हैं। मान्यता है कि माता सती और माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने और उन्हें पति रूप में प्राप्त करने के लिए व्रत और तपस्या की थी। इसी वजह से श्रावण माह में भगवान शिव की आराधना, व्रत, जलाभिषेक और बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है।





