
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दो बालिग और अविवाहित व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को किसी व्यक्ति के चरित्र या नैतिकता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने यह टिप्पणी तेलंगाना पुलिस भर्ती से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की।मामला एक ऐसे अभ्यर्थी से जुड़ा था, जिसकी पुलिस भर्ती एक पुराने आपराधिक केस के आधार पर रद्द कर दी गई थी। यह मामला एक असफल प्रेम संबंध से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी रिश्ते का विवाह तक नहीं पहुंचना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि किसी पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है।

जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि समाज में ऐसे कई रिश्ते होते हैं जो विभिन्न कारणों से विवाह में नहीं बदल पाते। केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ नकारात्मक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। कानून दो अविवाहित वयस्कों को आपसी सहमति से संबंध रखने से नहीं रोकता।अदालत ने कहा कि संबंधित युवक और युवती लंबे समय तक एक-दूसरे के संपर्क में थे और पड़ोसी भी थे। ऐसे में केवल संबंध टूट जाने को धोखाधड़ी या गलत आचरण का प्रमाण नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने दोहराया कि जब तक आरोप सिद्ध न हो जाएं, तब तक किसी भी व्यक्ति को निर्दोष माना जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने शादी का वादा कर दुष्कर्म के मामलों में समझौते को लेकर भी अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यदि कोई आपराधिक मामला समझौते के साथ समाप्त होता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आरोपी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है।पीठ ने कहा कि किसी नियोक्ता को केवल समझौते के आधार पर उम्मीदवार के खिलाफ प्रतिकूल राय नहीं बनानी चाहिए, जब तक यह साबित न हो जाए कि शिकायतकर्ता पर समझौते के लिए दबाव बनाया गया था।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वर्तमान समय में विवाहपूर्व संबंध समाज में पहले की तुलना में अधिक सामान्य होते जा रहे हैं। यदि दो बालिग व्यक्तियों के बीच लंबे समय तक संबंध रहे हों, तो सामान्यतः यह माना जाएगा कि वह संबंध आपसी सहमति पर आधारित था।अदालत ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि मामले में कहीं भी यह संकेत नहीं मिला कि समझौता बल, धमकी या किसी प्रकार के दबाव में कराया गया था। ऐसे में केवल पुराने विवाद के आधार पर किसी उम्मीदवार के भविष्य को प्रभावित करना उचित नहीं माना जा सकता।




