
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को कहा कि प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करते हुए समस्त जीवों का कल्याण सुनिश्चित करना भारतीय संस्कृति की मूल भावना रही है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए कहा कि इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ भारत निरंतर प्रगति और समृद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।
संस्कृत सुभाषित के जरिए दिया प्रकृति संरक्षण का संदेश
प्रधानमंत्री ने अपने पोस्ट में संस्कृत श्लोक ‘यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत् समश्नुते। तावत् समैत्विन्द्रियं मयि तद्धस्तिवर्चसम्॥’ साझा किया। उन्होंने कहा कि यह श्लोक प्रकृति के साथ संतुलित जीवन और समग्र कल्याण की भावना को अभिव्यक्त करता है।
श्लोक में समृद्धि और पर्यावरण संतुलन का संदेश
इस श्लोक का हिंदी अर्थ है कि चारों दिशाओं के विस्तार और दृष्टि की जागरूकता से युक्त ऐसी समृद्धि प्राप्त हो, जहां प्रकृति के साथ पूर्ण संतुलन कायम रहे, पर्यावरण का संरक्षण हो और समस्त जीवन का सतत कल्याण सुनिश्चित किया जा सके।
विश्व पर्यावरण दिवस पर भी साझा किया था सुभाषित
पीएम मोदी ने 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर भी प्रकृति संरक्षण से जुड़ा एक संस्कृत सुभाषित साझा किया था। उन्होंने कहा था कि प्रकृति का संरक्षण केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और संस्कारों का अभिन्न अंग है। उन्होंने ‘मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥’ श्लोक साझा करते हुए प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण का संदेश दिया था।
नदियों, वायु और वनस्पतियों के कल्याणकारी स्वरूप का उल्लेख
उक्त श्लोक का हिंदी अर्थ है कि वायु हमारे लिए कल्याणकारी और आनंददायक रूप से प्रवाहित हो, नदियां जीवनदायिनी एवं पोषणकारी जल प्रदान करें तथा औषधियां और वनस्पतियां समस्त जीव-जगत के लिए आरोग्य और सुख का कारण बनें।
योग के महत्व पर भी साझा किया था संदेश
प्रधानमंत्री ने 4 जून को योग के महत्व को रेखांकित करते हुए भी एक संस्कृत सुभाषित साझा किया था। उन्होंने कहा था कि योग का नियमित अभ्यास शरीर को स्वस्थ और मन को शांत रखता है। इसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने से जीवन संतुलित और ऊर्जावान बनता है। उन्होंने ‘योगेन चित्तस्य पदेन वाचां, मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां, पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥’ श्लोक साझा किया था।
महर्षि पतंजलि को किया नमन
इस श्लोक का हिंदी अर्थ है कि मन की चित्तवृत्तियों को योग से, वाणी को व्याकरण से और शरीर की अशुद्धियों को आयुर्वेद से शुद्ध करने वाले मुनियों में श्रेष्ठ महर्षि पतंजलि को मैं दोनों हाथ जोड़कर नमन करता हूं।




