
रंजना राज
रांची/रायपुर : छत्तीसगढ़ से लेकर पड़ोसी राज्य झारखंड तक नक्सलवाद का आख़िरी दंश साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है,इन इलाकों में सक्रिय नक्सली दलम या तो घुटने टेक रहे है या फिर एनकाउंटर में मारे जा रहे है|छत्तीसगढ़ और झारखंड की बीच आवाजाही वाले ज़िलों की तस्वीरें तेज़ी से बदल रही है| इस मार्ग पर नेशनल हाईवे से सटे कई ऐसे इलाके थे,जहाँ रात-बेरात रुकना मुसीबत का सबब माना जाता था | खनिज पदार्थों से लदे वाहनों के अलावा रोजमर्रा की सामग्री के परिवहन से जुड़े ट्रक तो यहां के मार्गों का आम नज़ारा है,ऐसे भारी वाहनों के बीच जीप-कार और ऐसी ही छोटी गाड़ियां आए दिन इन मार्गों पर कभी गुंडे-बदमाशों तो कभी कथित नक्सलियों की करतूतों का शिकार हो जाया करती थी | इन इलाकों के कई थानों में यात्रियों के द्वारा कार जीप में भिड़ंत और लूटपाट से संबंधित कई वारदाते दर्ज है | लेकिन,नक्सली खात्मे की डेडलाइन करीब आते ही,इन मार्गों पर घटित होने वाले अपराधों पर पिछले 3 माह में काफी गिरावट दर्ज की गई है|

नक्सली संवेदनशीलता को लेकर चिन्हित नेशनल हाईवे पर स्थित उन ढाबों,होटलों,चायपान के ठेलों,स्थानीय बाजार और पेट्रोल पम्पों पर अब आधी रात तक लोगों का तांता लगा हुआ है,जहाँ शाम होते ही सन्नाटा पसर जाता था | इन इलाकों में नजर आ रही चहल-पहल को नक्सली ख़ौफ़ के खात्मे से जोड़कर देखा जा रहा है | स्थानीय लोग तस्दीक करते है,कि इन इलाकों से नक्सलवाद ख़त्म हो गया है | लेकिन,अंदरूनी कुछ एक इलाके ऐसे है,जहाँ के दलम घुटने टेकने को तैयारी नहीं है| इन इलाको के कई लोग नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन बढ़ाने पर ज़ोर दे रहे है,उनके मुताबिक गुमराह लोगों को मुख्यधारा में लाने के लिए कुछ वक्त और दिए जाने पर विचार किया जाना चाहिए | उनके मुताबिक,इस समस्या के हल के लिए “बंदूक की गोली” सहायक ज़रूर है,लेकिन कारगर नहीं |

रायपुर से रांची लगभग 585-700 किमी के प्रमुख सड़क मार्ग में छत्तीसगढ़ की सरहद तक शांति लेकिन झारखंड की सरहद शुरू होते ही सांसे फ़ूल जाती थी | लेकिन,अब इस मार्ग पर अब बेफ़िक्री के साथ यात्रा कर सकते है| यहां अब पहले जैसे ना तो ख़ौफ़ है,और ना ही वाहनों के लूटने का अंदेशा,जशपुर नगर से झारखंड के गुमला पहुँचने से पहले ही छोटे वाहनों खासकर बाइक और कार सवारों के रोंगटे खड़े हो जाया करते थे| गुमला के अलावा लोहरदगा और बोकारो जैसे प्रमुख औद्योगिक बेल्ट से होकर वक्त-बेवक्त गुजरना पहले भारी पड़ता था| लेकिन,अब भारतमाला परियोजना से जुड़ने और नक्सली दलम का खात्मा होने से यह मार्ग ना केवल सुगम हो गया,बल्कि वीरान इलाकों में भी कई छोटी होटलें और ढाबे अस्तित्व में आ गए है। ये रोजगार का जरिया सबित हो रहे है| छत्तीसगढ़ में डेडलाइन के भीतर नक्सलवाद के खात्मे की कार्य योजना की यहाँ के लोग तारीफ कर रहे है| उनका मानना है,कि झारखंड भी अब छत्तीसगढ़ की तर्ज़ पर उन्नति की राह पर है|

छत्तीसगढ़-झारखंड,महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश और तेलंगाना में नक्सल आंदोलन की मजबूत कड़ी जल्द टूटने वाली है | छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त राज्य घोषित करने की डेडलाइन से करीब हफ्ते पहले जंगल से नया पैगाम आया है | माओवादी ग्रुप के अंतिम कैडर का कमांडर नक्सली पापाराव के आज सरेंडर के आसार है | बताया जा रहा है,पापाराव का दलम AK-47 समेत अन्य हथियार से लैस होकर सुरक्षा बलों के ठिकानों की ओर निकला है। हालांकि,बस्तर पुलिस की ओर से इस सरेंडर की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।

पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का इंचार्ज और दक्षिण सब जोनल ब्यूरो का सदस्य पापाराव उर्फ मंगू उम्र 56 वर्ष राज्य के सुकमा जिले का रहने वाला है। पापाराव वर्तमान में DKSZCM मेंबर है। दर्जनों एनकाउंटर में बस्तर के जल-जंगल जमीन से वाकिफ होने के चलते कई बार वो पुलिस की गोलियों से बचकर निकल चुका था। उस पर पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों पर हमले और जान माल का नुकसान पहुँचाने के कई मामले दर्ज है | उसका सरेंडर काफी महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है| नक्सली मामलों के जानकार तस्दीक करते है,कि पापाराव नक्सलियों की पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी की रीढ़ की हड्डी है| उनके मुताबिक,देवा के सरेंडर करने के बाद अब पापाराव ही एक मात्र ऐसा नक्सली बचा है जो फाइटर है, अन्य टॉप कैडर्स के नक्सली या तो उम्र दराज हो चुके हैं या सरेंडर कर चुके है | उसके सरेंडर की खबरों से बस्तर से माओवाद का सफाया तय माना जा रहा है। गौरतलब है,कि नक्सल संगठन के सबसे खूंखार नक्सली माड़वी हिड़मा,नक्सल संगठन का सचिव बसवाराजू, गणेश उइके समेत 17 बड़े कैडर्स का पुलिस और सुरक्षा बलों ने एनकाउंटर किया गया था। जबकि,भूपति, रूपेश, रामधेर जैसे बड़े नक्सलियों ने अपने सैकड़ों साथियों के साथ हथियार डाल दिए थे।सूत्रों के मुताबिक,मिशिर बेसरा और गणपति ये 2 बड़े टॉप के नक्सली बचे हैं, जिनके कंधों पर अब नक्सली संगठन ठिका हैं।

दरअसल,बस्तर में बटालियन नंबर 1 का कमांडर देवा ने हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा में वापसी कर ली है। सूत्र कहते है,कि जंगल में हलचल तेज़ है,अब केवल पापाराव ही एक ऐसा नक्सली लीडर है,अगर इसका एनकाउंटर, गिरफ्तारी या सरेंडर होता है तो निश्चित ही नक्सल संगठन खत्म हो जाएगा। जानकारी के मुताबिक,छत्तीसगढ़ से सटे झारखंड में माओवादियों के सफाए के लिए कुछ और वक्त लगने के आसार जाहिर किए जा रहे है| इसके चलते सरेंडर डेडलाइन के बढ़ाने को लेकर सुगबुहाट तेज़ है | देश में नक्सलवाद के खात्मे की 31 मार्च 2016 की डेडलाइन समाप्ति पर है | लेकिन,झारखंड के विभिन्न इलाकों में सक्रिय लगभग 44 हार्डकोर नक्सली अब भी चुनौती बन कर खड़े है | माओवादियों के सफाए के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 की तय की थी |

सूत्र तस्दीक करते है,कि यह डेडलाइन आगे बढ़ सकती है, 31 मार्च में अब हफ्ता भर ही शेष है,ऐसे में सुरक्षा बलों के सामने सक्रिय हार्डकोर माओवादियों और उनके दलम से निपटना सबसे बड़ी चुनौती है। इन माओवादियों में एक-एक करोड़ के दो इसके अलावा 25 लाख, 15 लाख व 10 लाख रुपये के इनामी अन्य माओवादी कमांडर शामिल हैं।एक करोड़ का इनामी माओवादियों का पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा, एक करोड़ का इनामी सेंट्रल कमेटी सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश, 25 लाख का इनामी सैक सदस्य अजय उर्फ अजय महतो, 15 लाख का इनामी मोछू उर्फ मेहनत, रीजनल कमेटी सदस्य मदन महतो उर्फ शंकर अभी भी सक्रिय बताए जाते है।इसके साथ आरसीएम संजय महतो उर्फ संतोष, रामप्रसाद मार्डी उर्फ सचिन मार्डी, नितेश यादव उर्फ इरफान, बेला सरकार उर्फ पंचमी, सहदेव महतो उर्फ सुभाष, मृत्युंजय उर्फ फरेश, मनोहर गंझू, गोदराय यादव, सालुका कायम, पुष्पा महतो उर्फ शकुंतला व चंदन लोहरा समेत अन्य भी चुनौती बने हुए हैं।झारखंड पुलिस व केंद्रीय बलों की संयुक्त बैठक में सुरक्षा बलों के संयुक्त अभियान में तेज़ी लाने के निर्देश दिए गए है| झारखंड में माओवादियों के विरुद्ध अंतिम लड़ाई पश्चिमी सिंहभूम जिले के सारंडा वन क्षेत्र में जारी है। यहां सीआरपीएफ, कोबरा, झारखंड जगुआर व जिला बल के जवानों ने नक्सलियों की घेराबंदी के लिए अपने कदम आगे बढ़ा दिए है| फ़िलहाल,देखना गौरतलब होगा,कि केंद्र सरकार अंतिम डेडलाइन को 31 मार्च 2026 तक ही सीमित रखती है या फिर नरमी बररते हुए नई डेडलाइन पर विचार कर सकती है |






