दिल्ली /बेंगलुरु : कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की सरकार अपने गठन के बाद से ही ढाई- ढाई साल के मुख्यमंत्री के वादे से जूझ रही है। बीते कई दिनों से कांग्रेस आलाकमान और राहुल गाँधी की वादाखिलाफी को लेकर पार्टी में सुगबुगाहटें तेज़ है। राज्य की कांग्रेस सरकार इससे उपजे एक राजनीतिक संकट से लगातार जूझ रही है। दरअसल कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा थी और इसे लेकर सीएम सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच खींचतान जारी रही।

हालांकि, शनिवार को दोनों नेताओं की नाश्ते पर मुलाकात भी हुई थी। इस मुलाकात के बाद दोनों नेताओं ने अचानक छत्तीसगढ़ के पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव की तर्ज पर ढाई- ढाई साल के मुख्यमंत्री के पद के बंटवारे के कयासों पर विराम लगाने के संकेत दिए है। उन्होंने पार्टी आलाकमान के फैसले का पालन करने का एलान भी किया है। इस प्रकरण को कांग्रेसी गलियारों में छत्तीसगढ़ की पटकथा की पुनरावृत्ति के रूप में देखा जा रहा है। राहुल गाँधी का बगैर नाम लिए राज्य के कई नेता तस्दीक कर रहे है, कि उनकी चुप्पी और टालमटोल वाली नीति से कर्नाटक में कांग्रेस धीरे- धीरे विभाजन की ओर बढ़ रही है। हालांकि ये पहली बार नहीं है जब कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर इस तरह की खींचतान हुई है।

दरअसल साल 2007 में भी ऐसी ही दास्तान सामने आई थी। लेकिन इस बार फिजां बदली हुई है, उनके सामने छत्तीसगढ़ बड़े उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। इनकी माने तो पार्टी में राहुल गाँधी द्वारा किये गए वादों की अब कोई अहमियत नहीं रह गई है, जिस तर्ज पर छत्तीसगढ़ के तत्कालीन डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव के साथ पार्टी आलाकमान ने वादाखिलाफी की थी, उन्हें ढाई- ढाई साल के मुख्यमंत्री के फार्मूले से दरकिनार कर दिया गया था, ठीक ऐसा ही सलूक डीके शिवकुमार के साथ किया जा रहा है। उन्हें भी अब मुख्यमंत्री बनाये जाने को लेकर राहुल गाँधी अपने वादों से पीछे हटते नजर आ रहे है। उनका मानना है, कि राहुल गाँधी कभी संकट टालने तो कभी वाद-विवाद सुलझाने के दौरान निर्णायक फैसला लेने के बजाए तात्कालिक हल पर जोर देते है। इसके लिए पूरी सक्रियता के साथ वादा तो ना टूटने वाला करते है, लेकिन उसे निभाने या लागू करने की जब बारी आती है, तो उनकी सक्रियता धरी की धरी रह जाती है। कर्नाटक में ढाई- ढाई साल के मुख्यमंत्री के इस फार्मूले को लेकर दोनों ही नेताओं के बीच शांति वार्ता कितने और दिनों तक कायम रहेगी ? इसका इंतज़ार किया जा रहा है। राज्य में ठीक वैसा ही प्रदर्शन आज हो रहा है, जैसा की 2006-07 में घटित हुआ था ? सरकार के भीतर जारी शीतयुद्ध पर ब्रेकफास्ट पॉलिटिक्स क्या रंग दिखाती है, यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन इस मुलाकात के बाद डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार फिर दिल्ली कूंच की तैयारी में जुट गए है। उन्होंने साफ़ कर दिया है,कि वे टीएस सिंहदेव की तर्ज पर कड़वा घूँट नहीं पीने वाले ?
टीएस सिंहदेव के साथ राहुल गाँधी की वादाखिलाफी
छत्तीसगढ़ में ढाई-ढाई साल के फार्मूले को लेकर पूरे पांच साल तक सरकार के भीतर संघर्ष के हालात बने रहे। 31अगस्त 2021 को दिल्ली से रायपुर लौटे डिप्टी सीएम सिंहदेव को पत्रकारों ने एयरपोर्ट में ही घेर लिया था, स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट पर मीडिया से चर्चा में सिंहदेव ने पहली बार यह कहा, कि अब वे ढाई-ढाई साल के फार्मूले पर कोई चर्चा नहीं करेंगे। इस मामले में जितनी चर्चा होनी थी हो गई है। इस मुद्दे पर बोलने के लिए अब कुछ बचा नहीं है, इसलिए इस पर कोई बात नहीं होगी। सिंहदेव ने साफ किया कि वह दिल्ली में परिवारिक पूजा कार्यक्रम में शामिल होने गए थे। दिल्ली में कांग्रेस के किसी नेता से कोई चर्चा नहीं हुई। उन्होंने कहा था,कि मेरे शुभचिंतकों ने मुझे सचेत रहने के लिए कहा है, ताकि कोई विवाद की स्थिति न हो। राहुल गांधी के छत्तीसगढ़ आने के सवाल पर सिंहदेव ने कहा कि अभी इसकी कोई जानकारी नहीं है।

दरअसल, वर्ष 2018 में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठते ही बघेल ने इस फार्मूले को नकार दिया था। जबकि चरण दास महंत और ताम्रध्वज साहू जैसे वरिष्ठ नेता भी ढाई-ढाई साल के फार्मूले को लेकर चुप्पी साधे रहे। बताते है,कि तत्कालीन मुख्यमंत्री बघेल ने सिंहदेव को कमजोर करने का बीड़ा खुद उठा लिया था। यह प्रदेश में नजर भी आया, वर्ष 2023 के विधान सभा चुनाव में सिंहदेव को शिकस्त देने के लिए बघेल ने अपनी पूरी ताकत झोक दी थी, हालांकि भारी-भरकम भ्रष्टाचार के चलते कांग्रेस सरकार की रवानगी हो गई थी।

आखिर क्या हुआ था 2006-07 में ?
इसे लेकर कांग्रेस के दोनों धड़ो में माथापच्ची का दौर जारी है। आज की कर्नाटक की स्थिति भी 2007 जैसी ही है, तब भी सत्ता हस्तांतरण को लेकर खींचतान हुई थी और अब भी ऐसा ही हो रहा है। उस वक्त भी केंद्रीय नेतृत्व ने दखल देने और मामले को संभालने में देरी की, जिसके चलते राज्य में राज्यपाल शासन लागू हुआ। कहा जा सकता है कि कांग्रेस नेतृत्व भी अब वैसी गलती न करे कि हालात संभालने मुश्किल हो जाएं। डीके शिवकुमार कर्नाटक के प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। डीके शिवकुमार की कथित अनदेखी को लेकर वोक्कालिगा समुदाय में नाराजगी देखी जा रही है और आशंका है कि समुदाय कांग्रेस से छिटक सकता है।

बताते है, कि कर्नाटक में साल 2004 में विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। ऐसे में जेडीएस किंगमेकर की भूमिका में उभरी और जेडीएस ने पहले कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई, लेकिन साल 2006 में दोनों दलों में मतभेद हो गए और गठबंधन टूट गया। इसके बाद जेडीएस के नेता एचडी कुमारस्वामी भाजपा के पाले में चले गए थे, फिर उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। राजनीति के जानकारों के मुताबिक,जेडीएस और भाजपा के बीच एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत 20-20 महीने सरकार चलाने की बात तय हुई थी, जिसमें पहले 20 महीने एचडी कुमारस्वामी सीएम बने और बाद के 20 महीनों में भाजपा के बीएस येदियुरप्पा को सीएम पद संभालना था।

हालांकि साल 2007 में जब 20 महीने का समय पूरा हुआ तो कुमारस्वामी ने सत्ता हस्तांतरण में आनाकानी की थी। नतीजतन, जेडीएस और भाजपा का गठबंधन भी टूट गया था। इसके चलते कुछ समय के लिए कर्नाटक में राज्यपाल शासन लगाना पड़ा था। हालांकि नवंबर 2007 में भाजपा के बीएस येदियुरप्पा सीएम बने और कुछ दिनों में ही उनका कार्यकाल समाप्त हो गया। साल 2008 में कर्नाटक में फिर से विधानसभा चुनाव हुए और उन चुनाव में भाजपा ने बहुमत हासिल किया। फ़िलहाल, कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन का विवाद जस का तस नजर आ रहा है, मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच सिर्फ हाथ मिले है, दिल नहीं।
