
रायपुर/दिल्ली : छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद समाप्ति की ओर है, लेकिन दिलचस्प बात यह है,कि पुलिस महकमें में दर्जनों ऐसे अधिकारी है, जिन्होंने अंतिम सांसे गिन रहे नक्सलवाद के समाप्ति के दौर में भी प्रभावित इलाको में अपनी मौज़ूदगी दर्ज नहीं कराई है। जबकि उन अधिकारियों की संख्या अभी भी एक सैकंड़ा से पार बताई जाती हैं, जो लगभग 7 से 10 सालों का नौकरी का सफर इस दौर में भी नक्सल प्रभावित इलाको में गुजार रहे है। उन्हें, इस आख़िरी घड़ी में भी मैदानी इलाकों की ओर अपनी तैनाती का इंतज़ार है, जबकि दूसरी ओर ऐसे बहुसंख्यक अधिकारी हैं, जिन्होंने ट्रांसफर होने के बावजूद भी नक्सल प्रभावित इलाको का मुंह तक नहीं देखा है, वे राजनैतिक जोड़-तोड़ या अन्य माध्यमों से अपना ट्रांसफर – पोस्टिंग संशोधित या रद्द करवाने के मामले में क़ामयाब रहे है।

छत्तीसगढ़ पुलिस में इन दिनों एक बार फिर ट्रांसफर – पोस्टिंग की बहार आई हुई है, राज्य सरकार ने हालिया 3 IPS सहित 95 ASP-DSP की ट्रांसफर लिस्ट जारी की है। इस पर अमल भी शुरू हो गया है, लेकिन इसके साथ ही यह ट्रांसफर – पोस्टिंग लिस्ट विवादों में आ गई है।बताया जा रहा है, कि जरूरतमंद और अनुशासनप्रिय ज्यादातर अधिकारियों को इस सूची से दरकिनार कर दिया गया है।

जबकि, उन्होंने पुलिस मुख्यालय से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष अपने ट्रांसफर – पोस्टिंग की गुहार लगाई थी। क़ायदे -कानूनों के तहत राहत की उम्मीद कर रहे ऐसे अधिकारियों को हालिया जारी की गई ट्रांसफर – पोस्टिंग लिस्ट अपना मुंह चिढ़ा रही है। एक शिकायत के मुताबिक इस सूची में सुविधाजनक और मनचाही पोस्टिंग पर जोर देने वाले अधिकारियों की भरमार है। हाल ही में राज्य पुलिस सेवा के
अफसरों के बड़े पैमाने पर हुए तबादले ने पुलिस महकमे की बेचैनी बढ़ा दी हैं। गृह विभाग द्वारा जारी तबादला आदेश में कहीं एक ही जगह में तीन-तीन एडिशनल एसपी को पदस्थ कर दिया गया है तो कहीं पिछले सात माह से कोई भी एडिशनल एसपी तैनात नहीं किया गया है। बिलासपुर ग्रामीण में एक साथ तीन एएसपी स्थानांरित हो गए है।

शिकायत में यह भी कहा गया है, कि बस्तर पुलिस महानिरीक्षक और इस संभाग के विभिन्न पुलिस अधीक्षकों ने जिन अधिकारियों की गैर मौज़ूदगी को लेकर पुलिस मुख्यालय को मामले से अवगत कराया था, ऐसे अफसरों को भी इस ट्रांसफर – पोस्टिंग में उपकृत कर दिया गया है। बताया गया है, कि जिन पुलिस अधिकारियों की पूर्ववर्ती कांग्रेस राज में तूती बोला करती थी, उन्हें अभी भी पिछले दरवाज़े से उपकृत किया जा रहा है। पुलिस के राजनीतिकरण का हवाला देते हुए ऊँची पहुँच वाले अधिकारियों की कार्यप्रणाली की जाँच की मांग भी की गई है।

हालिया ट्रांसफर – पोस्टिंग लिस्ट पर कड़ी आपत्ति जाहिर करते हुए वरिष्ठ बीजेपी नेता नरेश चंद गुप्ता ने मुख्यमंत्री का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया है। उन्होंने साफ़ किया है,कि राज्य सरकार की नक्सली नीति के तहत पीड़ित पुलिस कर्मियों की सुध भी लेनी चाहिए उनके मुताबिक, हालिया ट्रांसफर – पोस्टिंग लिस्ट में एएसपी अभिषेक महेश्वरी को अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कैंप जगरगुंडा सुकमा से स्थानांरित कर उप सेनानी 16वीं वाहिनी नारायपुर में पदस्थ किया गया है। जबकि एएसपी अभिषेक महेश्वरी ने जगरगुंडा सुकमा में अपनी मौजूदगी तक दर्ज कराने से परहेज बरता था, उनकी कार्यप्रणाली पर ऐतराज जताते हुए तत्कालीन एसपी और आईजी ने तक पुलिस मुख्यालय में अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। साल भर में दूसरी बार एएसपी महेश्वरी के ट्रांसफर पर हैरानी जताते हुए नरेश चंद गुप्ता ने कहा, कि ऐसी विवादित ट्रांसफर – पोस्टिंग लिस्ट से उन पुलिस अधिकारियों का मनोबल कमजोर पड़ रहा है, जो कई वर्षो से नक्सली इलाकों से मुक्त होने की बाँट जोह रहे है।

गुप्ता ने एएसपी के नारायपुर पोस्टिंग के गुणदोषो की ओर मुख्यमंत्री का ध्यान आकृष्ट किया है। एक जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ़ में पुलिस मुख्यालय की भूमिका लगभग “शून्य” की ओर तेज़ी से बढ़ रही है। जानकारों के मुताबिक महकमें में राजनीतिकरण के कुप्रभाव के चलते पुलिस मुख्यालय की भूमिका कांग्रेस राज की तर्ज पर निष्क्रिय कर दी गई है। प्रदेश में डीजीपी का पद सिर्फ औपचारिक बन कर रह गया है। बताते है कि ट्रांसफर – पोस्टिंग के मामलों में डीजीपी की ना तो कोई राय ली जा रही है और ना ही उनकी दखलंदाजी कार्यवाही योग्य समझी जा रही है। इसकी मुख्य वजह पुलिस मुख्यालय में एकअदद डीजीपी की तलाश पिछले दो सालों से लंबित बताई जाती है।

यह भी बताया जा रहा है, कि अपने अब तक के कार्यकाल में मौजूदा डीजीपी अपनी कोई विशिष्ठ पहचान महकमे में कायम नहीं कर पाए है। उनका प्रभाव भी काफी सीमित कर दिया गया है। प्रदेश के कई इलाकों में कानून व्यवस्था की स्थिति निर्मित होने के मामले भी पुलिस मुख्यालय की कमजोर कड़ी से जोड़कर देखे जाते है। डीजीपी के पद और प्रभाव को कमतर आंकने की नींव भी चुनिंदा वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों द्वारा रखी गई बताई जाती है।

बताया जा रहा है,कि पुलिस महकमें में अनुशासन और कर्तव्यपरायणता अब गुजरे ज़माने की बात हो गई है, अधिकारियों की नई फ़ौज नेता जी के चरण चुम्बन के बाद ऐलानिया तौर पर पुलिस मुख्यालय को अपने जेब में रखने तक का दावा करने से पीछे नहीं रहती। डीएसपी कल्पना वर्मा की पिछले दरवाजे से दंतेवाड़ा से रायपुर के पुराने पुलिस मुख्यालय में तैनाती को भी ऐसी ही मामलो से जोड़कर देखा जा रहा है।
जानकारों के मुताबिक छत्तीसगढ़ पुलिस महकमें में सिक्का उन्हीं पुलिस अधिकारियों का चल रहा है, जिनकी पहुंच ऊपर तक बताई जाती है, “पहुँचविहीन” पुलिस अधिकारियों की सुध तक लेने वाले कोई नहीं, ऐसे अधिकारी या तो लूप लाइन में हाजिर है,या फिर लम्बे समय से ट्रांसफर की राह तक रहे है। जानकारी के मुताबिक बीजेपी का रहनुमा करार देकर कांग्रेस काल में जिन पुलिस अधिकारियों को ठिकाने लगा दिया गया था, उनकी हालत अभी भी ” स्थिर” अर्थात जस की तस बताई जाती है। जबकि ऊँची पहुंच वाले अधिकारियों की बीजेपी शासन में भी पौ बारह है। पुलिस महकमे में ट्रांसफर – पोस्टिंग को लेकर कवायतें यूँ तो साल भर जोरों पर रहती है,लेकिन कामयाब वही अफसर हो रहे है, जिनकी सरकार में पकड़ मजबूत और पहुंच ऊँची बताई जाती है।

नतीज़तन, राज्य में वर्दी में ही अपराधों का सिलसिला तेज़ी से पनप रहा है,पेशेवर अपराधियों की तर्ज पर कई अधिकारियों पर गंभीर आरोप लग रहे है। उनके खिलाफ वैधानिक कार्यवाही दम तोड़ रही है। पुलिस मुख्यालय सिर्फ सिपाहियों पर ही कानून का डंडा चला रहा है,जबकि थानेदार और उससे वरिष्ठ अधिकारियों की अपराधों में लिप्तता सामने आने के बावजूद उनसे जुड़े मामले पुलिस मुख्यालय स्तर पर ही ठंडे बस्ते में डाल दिए जा रहे है। अंदेशा जाहिर किया जा रहा है, कि पुलिस महकमें का यही हाल आने वाले दिनों भी बरक़रार रहा तो सत्तधारी बीजेपी सरकार के अरमानों पर पानी फिरना तय है, मौजूदा सूरते हाल में पुलिस के प्रदर्शन को लेकर जनता के बीच ग़फ़लत के दिन कोई दूर नहीं,बल्कि करीब बताये जाते है। वर्दी में अपराधों का नया सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है।

दंतेवाड़ा से सुर्ख़ियों में आई डीएसपी कल्पना वर्मा को लेकर जहाँ जाँच रिपोर्ट का इंतज़ार किया जा रहा है, वही सुकमा में पदस्थ एक डीएसपी टोमेश वर्मा को दंतेवाड़ा में सरेराह पेड़ से बांधकर मारपीट किये जाने की तस्वीरें और वीडियो कम हैरान करने वाला नहीं है। राज्य में पहली बार किसी डीएसपी को सार्वजानिक तौर पर बंधक बना कर मारपीट और चाकू से हमला कानून व्यवस्था की कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है।

उधर,दो साल में दो में दो बार एसपी कांफ्रेंस के बाद भी प्रदेश में कानून व्यवस्था की बदहाली और बेलगाम अपराधों का आरोप लगा कर कांग्रेस ने अभी से बीजेपी को घेरना शुरू कर दिया है। वर्दी पर लगते दाग़ से कांग्रेस को बैठे बिठाये मुद्दा भी हाथ लग रहा है। उसने राज्य की विष्णुदेव साय सरकार के खिलाफ सड़कों की लड़ाई शुरू कर दी है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने साय सरकार को आड़े हाथो लिया है। ठाकुर ने आरोप लगाया, कि प्रदेश में यूपी बिहार की तर्ज पर आपराधिक घटनाये हो रही है, गैंगवार हो रहे है, चुनावी रंजिश में हत्या हो रही है पुलिस के डीएसपी रेंक के अधिकारी पर चाकू से हमला हो रहा है पत्रकारों के साथ मारपीट हो रही है।पुलिस प्रशासन है कहाँ ? उन्होंने यह भी आरोप लगाया, कि अपराधियो को खुली छूट किसने दी है ? राजधानी रायपुर में खुलेआम नकाबपोश लोग तोड़ फोड़ कर रहे है, इन्हें छूट किसने दी? बस्तर में शव दफनाने को लेकर हिंसा आगजनी हो रही है कहाँ है सरकार और प्रशासन?

प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने कहा विदेश से ड्रग्स, पड़ोसी राज्यो से गांजा शराब नशीली वस्तुएं बेरोकटोक कैसे आ रही है किसके सह पर आ रही है? रोज हो रही चाकूबाजी आपराधिक घटनाओ के बाद आखिरी गृहमंत्री अपनी जिम्मेदारी क्यो नही निभा रहे है। उन्होंने गृहमंत्री विजय शर्मा के इस्तीफे की मांग तक कर डाली।

जाहिर है, प्रदेश में बीजेपी सरकार को अब कांग्रेस की कड़ी चुनौती का सामना करने का वक्त आ गया है। मुख्यमंत्री साय के नेतृत्व में बीजेपी सरकार के दो वर्ष पूर्ण हो चुके है,वर्ष 2026- 27 ख़त्म होते ही चुनावी वर्ष 2028 की भी शुरुआत हो जाएगी। पुलिस मुख्यालय के प्रति सरकार की बेरुखी चुनावी वर्ष में क्या गुल खिलाएगी ? लोगों ने इसका अंदाजा लगाना भी शुरू कर दिया है। फ़िलहाल,बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस के आरोप कितने बेबुनियाद है ? यह तो वक्त ही बताएगा ?







