
नई दिल्ली/ रायगढ़ : महाराष्ट्र के रायगढ़ की अरावली पर्वतमाला और छत्तीसगढ़ के रायगढ़ की तमनार पहाड़ी दोनों का ऐतिहासिक ही नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कारगर भूमिका निभाती है। लेकिन अंधाधुंध औद्योगिकीकरण और माइनिंग के चलते ऐसे रिजर्व फारेस्ट वाले इलाकों में कोहराम मचा है।

छत्तीसगढ़ के तमनार में कोयले के कारोबार ने कई बड़े औद्योगिक घरानों को अपनी ओर खींचा है, यहां वन्य जीवों और स्थानीय आबादी को खदेड़ कर ज़मीन के भीतर से कोयला निकालने की होड़ मची है। इलाके की जनता सड़कों पर है,माइनिंग के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों को नियंत्रित करने के लिए इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया है।

जनसुनवाई के विरोध में हजारो लोग राज्य सरकार की नीतियों का विरोध कर रहे है। उनके रुख को देखते हुए कानून व्यवस्था का सवाल खड़ा हो गया है। जबकि, महाराष्ट्र के रायगढ़ में अरावली पर्वतमाला में भी ऐसी ही हालत निर्मित होने के बाद सुप्रीम कोर्ट हरकत में आ गया है, उसने स्टे जारी कर राज्य सरकार के अरमानों पर पानी फेर दिया है।

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा और संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने आज बड़ा कदम उठाया है। सोमवार को अदालत ने 20 नवंबर को दिए गए अपने आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी गई और केंद्र समेत संबंधित राज्य सरकारों से जवाब तलब किया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को होगी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, कि वर्तमान परिभाषा से पर्यावरण संरक्षण का दायरा सिमट सकता है। कोर्ट ने 20 नवंबर के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए कहा, कि किसी भी फैसले से पहले निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है। इसके लिए हाई पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी बनाने का प्रस्ताव रखा गया है, जिसमें डोमेन एक्सपर्ट्स शामिल होंगे। कोर्ट ने खनन, इकोलॉजिकल कंटिन्यूटी और संरचनात्मक प्रभावों पर भी जवाब मांगा है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ—जिसमें न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल रहे। उन्होंने ने कहा कि जब तक एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित नहीं हो जाती और उसकी रिपोर्ट सामने नहीं आती, तब तक पुराने निर्देश लागू नहीं होंगे।

दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार इलाके में शनिवार को कोयला खनन परियोजना के विरोध में चल रहा शांतिपूर्ण धरना अचानक हिंसक होने के बाद जनजीवन अस्त-व्यस्त बताया जाता है। तमनार की पहाड़ी कोयला खनन के मुद्दे पर सुलग़ गई है कई इलाको में दुकाने और कारोबार हफ़्ते भर से ठप है। आक्रोशित ग्रामीण जल-जंगल और ज़मीन के बचाव को लेकर चिंता जाहिर कर रहे है। उनके मुताबिक, हाथियों समेत कई वन्य जीवों की रक्षा करने वाली तमनार की पहाड़ी का अस्तित्व अब संकट में है। कभी कायदे-कानूनों तो कभी लालच और ज़ोर जबरदस्ती के साथ माइनिंग के चक्कर में गांव की गांव को हटाने की कवायत शुरू हो गई है।

उनका आरोप है, कि राज्य सरकार औद्योगिकीकरण के नाम पर छत्तीसगढ़ के पर्यावरण के साथ खिलवाड़ पर उतारू है। यहां प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प में दो अधिकारियों समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। बताया जाता है, कि शांतिपूर्ण आंदोलन ने अचानक हिंसक रूप ले लिया था। लोगो के मुताबिक शनिवार को हालात इतने बेकाबू हो गए कि उपद्रवियों ने सरकारी वाहनों और निजी संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया, जिससे पूरे इलाके में तनाव फैल गया था।

दरअसल, मामला 8 दिसंबर 2025 को धौराभाठा में हुई जनसुनवाई के विरोध से जुड़ा बताया जाता है। जानकारी के मुताबिक JPL कोयला खदान सेक्टर-1 कोल ब्लॉक से प्रभावित 14 गांवों के लोग 12 दिसंबर से धरने पर बैठे हुए थे। सुबह करीब 9 बजे लिबरा चौक पर लगभग 300 ग्रामीण जमा हो गए और कई लोगों ने सड़क पर बैठकर आने-जाने का रास्ता रोक दिया था। स्थिति बिगड़ती देख सुबह करीब 10 बजे अनुविभागीय अधिकारी राजस्व, अनुविभागीय अधिकारी पुलिस और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने लोगों को समझाया। धरना स्थल पर लगे टेंट में वापस भेज दिया। कुछ समय के लिए माहौल शांत हुआ, लेकिन तनाव बना रहा।

जिला प्रशासन के अनुसार आसपास के गांवों से लोग लगातार मौके पर पहुंचते रहे और दोपहर तक भीड़ की संख्या लगभग एक हजार तक पहुंच गई थी। घरघोड़ा के एसडीएम और पुलिस अधिकारियों ने माइक से लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की थी, लेकिन इसके बावजूद भीड़ बार-बार सड़क पर उतरकर रास्ता रोकने की कोशिश करती रही थी। करीब ढाई बजे हालात अचानक बिगड़ गए थे। भीड़ ने पुलिस के लगाए गए बैरिकेड तोड़ दिए थे और पत्थरों व डंडों से हमला कर दिया था। पुलिसकर्मियों पर जमकर लाठियां और पत्थर फेंके गए थे। इस घटना में कई पुलिस जवान और महिला आरक्षक घायल हो गए थे, जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया था।







