
भिलाई : लोक गायिका पद्मश्री तीजन बाई के स्वास्थ्य में अचानक गिरावट दर्ज की गई है| उनके परिजनों की माने तो हालत नाजुक है,उन्होंने हफ्ते भर से खाना पीना छोड़ दिया है| कई दिनों से बीमार चल रही लोक गायिका के स्वास्थ्य को लेकर डॉक्टर, परिजन समेत उनके चाहने वाले चिंतित है| जानकारी के मुताबिक,लोक गायिका तीजनबाई ने अचानक खाना पीना छोड़ दिया है,इससे उनका स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है|उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए परिजन सेवा जतन में जुटे हुए है|छत्तीसगढ़ की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान की मिसाल के रूप में जानी-पहचानी जाने वाली तीजन बाई उम्र के इस मोड़ में स्वास्थ्यगत परेशानियों से जूझ रही है| उनका ज्यादातर वक्त अब बिस्तर पर हीगुजर रहा है|

पंडवानी शैली में चिर-परिचित भजन और संवाद बोलने- गुनगुनाने में वे अभी भी पीछे नहीं है,उनके मुंह से “भ्रतहरि” गायन के बोल वक्तबेवक्त अभी भी उनके मुंह से सुनाई पड़ते है, शायद बिस्तर में भी वो अपनी साधना में लीन हो जैसे| ख़राब स्वास्थ्य के बावजूद अपने ही भजनों को गुन-गुनाकर तीजन बाई सुकून की सांसे ले रही है| डॉक्टर उनके स्वास्थ्य पर 24×7 निगरानी रखे हुए है| उन्हें समयपर दवाइयां दी जा रही है|अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस सिर पर है,ऐसे समय उनकी नाजुक स्थिति ने लोक कला जगत को चिंता में डाल दिया है | तीजन बाई के बेहतर स्वास्थ्य की कामना को लेकर ईश्वर से प्रार्थना की जा रही है|पद्मश्री तीजन बाई ने पंडवानी गायन कला को विश्व पटल पर स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है| छत्तीसगढ़ की इस लोककला को अपने अंदाज में देश-विदेश में प्रस्तुत कर तीजन बाई ने अपनी नई पहचान कायम की है| महिला दिवस पर तीजन बाई के गायन और संघर्षों पर अक्सर चर्चा होते रही है|लेकिन,इस बार उनके प्रंशसक मायूस नज़र आ रहे है,क्योंकि “दाई” बीमार है| जानकारों के मुताबिक,विपरीत आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद लोक कला के क्षेत्र में तीजन बाई ने अपना पूरा जीवन बिता दिया| उन्होंने विदेशों में पंडवानी कला को एक नया आयाम दिया |

तीजन बाई का जन्म छत्तीसगढ़ के भिलाई के गनियारी गांव में 24 अप्रैल1956 को हुआ था| उनके परिजन बताते है,कि सनातनी पर्व तीजा-पोरा केदिन जन्म होने से उनकी माँ ने उनका नाम तीजन रख दिया था| तीजन बाई के पिता का नाम चुनुक लाल पारधी और माता का नाम सुखवती देवी बताया जाता है| तीजन अपने माता-पिता की पांच संतानों में सबसे बड़ी बताई जाती है| लोक कला की सेवा के मद्देनजर तीजन बाई को कई पुरस्कारों से नवाजा गया है|

उन्हें 1988 में पद्मश्री,1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार,2003 में पद्म भूषण,2007 में नृत्य शिरोमणि,2019 में पद्म विभूषण समेत अन्य पुरस्कारों से अलंकृत किया गया| वर्ष 2017 में प्रदेश के खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय ने तीजन बाई को डी लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया था| परिजन बताते है,कि तीजन बाई को अब तक 4 से अधिकसंस्थानों से “डी लिट” की उपाधि से सम्मानित किया गया है| इसके अलावा दर्जनो मौकों पर इस लोक गायिका को विभिन्न अलंकरण और सम्मान प्रदान किये गए | पंडवानी गायन शैली पर इस लोक गायिका को जापान ने अपने प्रतिष्ठित फुकोकाअवॉर्ड से सम्मानित किया था|

जानकार तस्दीक करते है,कि मात्र 13 साल की उम्र में पंडवानी गायन को मंच पर प्रस्तुत कर तीजन बाई ने अपने कला जीवन की शुरुआत की थी | उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए.लेकिन पंडवानी गायन से उनका नाता कभी नहीं टूटा | जीवन की इस यात्रा में संघर्षों भरा एक ऐसा दौर भी आया जब तीजन को सामाजिक अपमान भी झेलना पड़ा था| उन्हें पंडवानी गायन विधा के चलते पारधी जनजाति सामाजिक व्यवस्था से दो-चार होना पड़ा था| इस दौरान तीजन बाई को समाज से निष्कासन का दंश भी झेलना पड़ा था | हालाँकि,इस क्षेत्र में मिली अपार सफलता ने उनके विरोधियों का मुंह बंद कर दिया| पुरातन सामाजिक बंधनों को दरकिनार कर तीजन बाई की स्वर साधना लगातार जारी रही|

दुर्ग जिले के चंद्रखुरी गांव में तीजन ने पंडवानी गायन की पहली बार मंच पर प्रस्तुति दी थी,इसे ख़ूब सराहा गया| इस कार्यक्रम की सफलता के बाद तीजन बाई ने कभी पीछे मूड कर नहीं देखा,उपलब्धियां उनके कदम चूमते चली गई | जानकार यह भी तस्दीक करते है,कि पंडवानी गायन शैली के हुनर को निखारने के लिए तीजन के नाना बृजलाल ने काफी प्रयास किया था| वो उनके गुरु के रूप में ताउम्र तीजन को पंडवानी सिखाते रहे| यह भी बताया जाता है,कि छत्तीसगढ़ी भजन संगीत के लेखक सबल सिंह चौहान की महाभारत की कहानियां अपने अंदाज में पेश कर तीजन ने खूब सम्मान पाया| उनके मुंह से किस्से कहानियां सुनने के लिए दूर-दूर से लोग उनके कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे| नाना बृजलाल की शिक्षा-दीक्षा आज भी तीजन को बखूबी याद है |

तीजन बाई के करीबी तस्दीक करते है,कि पारिवारिक संघर्षों की वज़ह से तीजन ने स्कूल की ओर कभी रुख़ ही नहीं किया था|वह अपने जीवन में कभी पढ़ाई-लिखाई नहीं कर पाईं थी| लेकिन,लोक गायन की कला ने उनकी इस अयोग्यता को ख़ारिज कर दिया | उनका नाम देश-विदेश में मझी हुई लोक गायिका के रूप में लिया जाने लगा| कापालिक शैली में गाने वाली पहली महिला लोक गायिका के रूप में उनकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली| तीजन पहली महिला थी, जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी गायन कर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा|

लोक गायन क्षेत्र में सक्रिय कलाकार गंगा राम साहू और दिलीप राय बताते है,कि शुरुआती दौर में पंडवानी को महिलाएं सिर्फ मंच पर बैठकर ही गायन करती थीं, जिसे वेदमती शैली कहा जाता है.जबकि पुरुष कलाकार वर्गाकार खड़े होकर पंडवानी गायन किया करते थे,जिसे कापालिक शैली गायन कहा जाता है। उनके मुताबिक,तीजन ने जब साज़-सज्जा और परंपरागत श्रृंगार के साथ एक कार्यक्रम में पंडवानी गायन किया तो,उनका अंदाज़ देख कर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी काफ़ी प्रभावित हुईं थीं.उनके “दुशासन वध” के प्रसंग देश-विदेश में काफी पसंद किए गए| 1980 के दशक में तीजन बाई ने सांस्कृतिक राजदूत के रूप में इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, टर्की, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मॉरीशस की यात्रा की थी |
लोक गायिका पद्मश्री तीजन बाई की हालत नाजुक,छोड़ा खाना-पीना,सेवा जतन में जुटे परिजन…







