
रायपुर : छत्तीसगढ़ में पुलिस तंत्र के भीतर फ़ैले भ्रष्टाचार और अपराधीकरण को रोकने के लिए वैसे तो राज्य सरकार की सुस्ती से जनता वाकिफ़ है|लेकिन, हालिया एक कार्यवाही सुर्ख़ियों में है,अवैध वसूली का मामला सामने आते ही हरक़त में आए गृह विभाग ने बिलासपुर में पदस्थ रहे एएसपी राजेंद्र जायसवाल को फ़ौरी तौर पर निलंबित कर दिया था|जबकि,बिलासपुर रेंज आईजी ने एएसपी पर लगे आरोपों की जाँच के लिए हफ्ते भर का समय मुकर्रर कर दिया था| लेकिन आरोपित एएसपी को अपना पक्ष रखने के लिए 24 घंटे का वक़्त भी नहीं मिला, कि राज्य सरकार ने उसे निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया| राज्य सरकार की इस त्वरित कार्यवाही से आईजी बिलासपुर रेंज और एसएसपी बिलासपुर की जांच रिपोर्ट का क्या होगा ? इस जांच रिपोर्ट की अब वैधानिकता पर भी सवाल खड़े हो रहे है|

यद्यपि पुलिस महकमें में पहली बार भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों में राज्य सरकार कीत्वरित कार्यवाही तारिफे क़ाबिल गिनी जा रही है| जबकि,ऐसे ही एक अन्य प्रकरण डीएसपी कल्पना वर्मा के मामले में कुछआ चाल से रेंगी जांच रिपोर्ट के सामने आये,लंबा वक़्त बीत चुका है,बावज़ूद इसके कोई कार्यवाही नहीं किया जाना गृह विभाग के लिए दोहरे मापदंडों के रूप में आंका जा रहा है|

गंभीर तथ्य यह है,कि डीएसपी कल्पना वर्मा के खिलाफ़ स्थानीय थानों में शिकायत लगभग 4 माह तक लंबित रही| यह भी बताया जा रहा है, कि कारोबारी दीपक टंडन बनाम डीएसपी कल्पना वर्मा मामले की उच्च स्तरीय जांच रिपोर्ट के सौंपे जाने के बावजूद “वैधानिक कार्यवाही” का मामला पखवाड़े भर से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी सरकारी फाइलों में क़ैद हो कर रह गया है स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय मीडिया में सुर्ख़ियों में आए इस मामले से छत्तीसगढ़ पुलिस की छवि दांव पर लग चुकी है|

कहा जा रहा है, कि एएसपी राजेंद्र जायसवाल के सिर पर किसी “आँका” का वरदहस्त नहीं होने के चलते महकमें में उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई| शिकायतकर्ता के आरोप लगाते ही उन्हें ठिकाने लगा दिया गया था,जबकि डीएसपी कल्पना वर्मा पर भी कई गंभीर आरोप नहीं लगे, बल्कि लगभग 1475 पेज की जांच रिपोर्ट भी आलाधिकारियों के टेबल पर रखी गई थी|सूत्रों के मुताबिक,कारोबारी दीपक टंडन को प्रेम जाल में फ़ांस कर लगभग ढाई करोड़ की उगाही किए जाने के पुख़्ता सबूत जांच रिपोर्ट में संलग्न बताए जाते है|

यही नहीं,डीएसपी पर “नक्सल उन्मूलन अभियान” और फ़ोर्स के मूवमेंट की गोपनीय जानकारी भंग करने के ठोस सबूत जांच अधिकारी के हाथ लगे है| इसे भी जांच रिपोर्ट में शामिल किया गया है,लेकिन कार्यवाही अभी तक अधर में लटकी बताई जा रही है| दीपक टंडन बनाम डीएसपी कल्पना वर्मा मामले में निलंबन की कार्यवाही आखिर कब होगी ? इसे लेकर माथापच्ची का दौर जारी है|आम जनता के बीच यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है,वैधानिक कार्यवाही का दोहरा मापदंड पुलिस महकमे में भी लोगों की जुबान पर है|

उधर, नए साल के आगमन के बाद रायपुर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली की बयार बह रही है|लेकिन इस मामले में राज्य सरकार की बेरुख़ी गौरतलब बताई जाती है|सवाल यह भी उठ रहा है,कि डीएसपी कल्पना वर्मा के भविष्य का फैसला क्या रायपुर के नए पुलिस कमिश्नर करेंगे? दरअसल,रायपुर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू होने के बाद नए पुलिस कमिश्नर संजीव शुक्ला ने पदभार ग्रहण कर लिया है|उनके अलावा अन्य 24 अधिकारियों ने भी अपनी-अपनी पदस्थापना वाले इलाकों में उपस्थिति दर्ज़ कराना शुरू कर दिया है|

रायपुर पुलिस कमिश्नर कार्यालय को सुचारु बना लिया गया है|हालाँकि,यहाँ भी डीएसपी कल्पना वर्मा प्रकरण की गूंज सुनाई दे रही है|रायपुर पुलिस कमिश्नर को विरासत में प्राप्त चुनौतियों में दर्जनों मामलों के साथ-साथ यह प्रकरण भी सबसे महत्त्वपूर्ण फैसलों में गिना जा रहा है|जानकारी के मुताबिक,डीएसपी कल्पना वर्मा पर कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की कृपा बरस रही है| ऐसे अधिकारियों में 2001 बैच के आनंद छाबड़ा और 2005 बैच के शेख आरिफ़ का नाम अव्वल नंबर पर बताया जाता है|

सत्ता और सरकार में विशेष दखलंदाजी रखने वाले इन विवादित छवि के अधिकारियों के साथ डीएसपी कल्पना वर्मा के मधुर संबंध बताए जाते है| यह भी बताया जाता है,कि डीएसपी कल्पना वर्मा को वैधानिक कार्यवाही से बचाने के लिए पुलिस महकमें के चुनिंदा वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा राजैनतिक पृष्ठ भूमि से जुड़े “माननीय” भी एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहे है| उनकी इस कवायत से राज्य की बीजेपी सरकार की मान प्रतिष्ठा भी दांव पर बताई जाती है|

छत्तीसगढ़ में राजनैतिक और प्रशासनिक मामलो में करीब से नज़र रखने वाले जानकारों द्वारा कहा जाता है,कि प्रदेश में पुलिस तंत्र के अपराधीकरण की खुली छूट पूर्ववर्ती कांग्रेस की भू-पे सरकार के दौर में प्रदान की गई थी|महकमे में इसकी नींव रायपुर के तत्कालीन आईजी शेख आरिफ़ और तत्कालीन ख़ुफ़िया प्रमुख एडीजी आनंद छाबड़ा ने रखी थी|यही विशिष्ट पहचान इस दौर में भी रफ़्तार पकड़ रही है|वर्दी में गंभीर अपराधों को अंजाम देना और अनुशासनहीनता रसूखदार-ऊंची पहुंच वाले चुनिंदा मुठ्ठी भर अधिकारियों की कार्यप्रणाली का मुख्य हिस्सा बन गया है|जबकि,दागी अफसरों को अनुचित प्रशासनिक संरक्षण,ईमानदार और कानून का पालन करने वाले बहुसंख्यक अधिकारियों को नागवार गुजर रहा है कई वरिष्ठ अधिकारी इस प्रकरण में फौरी कार्यवाही के पक्षधर बताए जाते है|

जानकारों की दलील है,कि पुलिस की कार्यप्रणाली को कारगर बनाने के लिए मुख्यमंत्री सचिवालय को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए,उनके मुताबिक,यह मामला अब सिर्फ महकमे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बीजेपी सरकार की सुशासन की पॉलिसी पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ रहा है| बहरहाल,दीपक टंडन बनाम डीएसपी कल्पना वर्मा मामले में वैधानिक कार्यवाही कब परवान चढ़ेगी ? इस ओर लोगों की निगाहें टिकी हुई है|






