
नई दिल्ली : माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को स्नान से रोके जाने का मामला अब कानूनी मोड़ ले चुका है। प्रशासन द्वारा उनके शंकराचार्य होने के प्रमाण मांगे जाने पर विवाद और गहरा गया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस नोटिस को असंवैधानिक, मनमाना और अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए कड़ा जवाब दिया है। वहीं तुलसी पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने इस पूरे प्रकरण पर खुलकर अपनी राय रखी है और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के आचरण पर सवाल खड़े किए हैं।

मौनी अमावस्या के अवसर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती माघ मेले में स्नान के लिए पहुंचे थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी। इसके बाद मेला प्राधिकरण ने उनसे उनके शंकराचार्य होने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। इस पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अंग्रेजी में आठ पन्नों का जवाब भेजते हुए सभी आरोपों को खारिज कर दिया।अपने जवाब में उन्होंने कहा कि यह नोटिस पूरी तरह असंवैधानिक है और मेला प्राधिकरण को ऐसा प्रश्न पूछने का अधिकार नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अपने जीवनकाल में ही उन्हें उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। साथ ही यह भी कहा गया कि शंकराचार्य पद को लेकर किसी भी अदालत से कोई स्थगन आदेश लागू नहीं है।

मेला प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले का हवाला देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से यह सवाल किया था कि वे स्वयं को शंकराचार्य कैसे कह सकते हैं। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि इस नोटिस से उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक स्थिति और सम्मान को ठेस पहुंची है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि 24 घंटे के भीतर नोटिस वापस नहीं लिया गया, तो कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट समेत अन्य कानूनी कदम उठाए जाएंगे।

इधर, तुलसी पीठ के पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने इस विवाद पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति शास्त्रों के विरुद्ध आचरण करता है, उसे न तो सुख मिलता है और न ही शांति। जगद्गुरु रामभद्राचार्य के अनुसार, शंकराचार्य को रथ या पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जाना शास्त्रसम्मत नहीं है।




