रायपुर/दिल्ली : ऑल इंडिया सर्विस खासतौर पर आईएएस,आईपीएस और आईएफएस संवर्ग अपनी सेवाओं से देश को मजबूती प्रदान करता है। लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका अलग ही रूप बन गया है। यहां ऑल इंडिया सर्विस के कई अधिकारी संविधान और अदालत से भी अव्वल दर्जा प्राप्त है। इनके ऊपर कायदे कानून लागू नही होने से कई अधिकारियों की सेवाएं जनता पर कहर बनकर टूट रही है। दागी अफसरों की फेहरिस्त में आईपीएस अधिकारियों का बोल-बाला केंद्रीय गृह मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर सवालियां निशान लगा रहा है। उसकी निष्क्रियता के चलते देश में ऑल इंडिया सर्विस के सर्वाधिक अमीर अधिकारियों में छत्तीसगढ़ जैसे गरीब प्रदेश के कैडर में शामिल दर्जनों अफसर सुमार बताये जाते है। साल दर साल 100 करोड़ की संपत्ति का आंकड़ा पार करने वाले अधिकारियों की गिनती लगातार बढ़ती जा रही है।

जानकारी के मुताबिक, ज्यादातर अफसरों ने महज चंद वर्षो के भीतर ही सरकारी सेवा का ऐसा मेवा लुटा की आकुत धन-दौलत इकट्ठा करने के मामले में उन्होंने नामी-गिरामी उद्योगपतियों को भी पीछे कर दिया है। ऑल इंडिया सर्विस को किसी उद्योग धंधे की शक्ल देकर सेवा का मेवा लूटने वाले दर्जनों अफसरों के खिलाफ सालो से कोई वैधानिक कार्यवाही अंजाम तक नहीं पहुंच पाई। लिहाजा राज्य की एक बड़ी आबादी का ऑल इंडिया सर्विस पर से विश्वास लगातार उठता जा रहा है। रायपुर में मौजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से रूबरू होकर नौकशाही की दशा -दिशा में बदलाव की मांग जोर-शोर से उठ रही है।

हालाँकि, सुरक्षा कारणों और पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के चलते शिकायतकर्ताओं को दोनों ही नेताओ से मेल-मुलाकात का मौका नहीं मिल पाया है। शिकायतकर्ताओं ने मीडिया से रूबरू होते हुए दागी आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों के खिलाफ PMO से ठोस कार्यवाही की मांग की है।

जानकारी के मुताबिक, 2001 बैच के आईपीएस आनंद छाबड़ा, 2004 बैच के अजय यादव, 2005 बैच के शेख आरिफ, 2007 बैच के प्रशांत अग्रवाल और 2008 बैच की आईपीएस पारुल माथुर के खिलाफ तत्काल कड़ी कार्यवाही की मांग की गई है। महादेव ऑनलाइन सट्टा घोटाला, कोल खनन परिवहन घोटाला, नक्सली इलाको के लिए मुखबिरी राशि वाला “SS फंड” घोटाले में इन अफसरों की सहभागिता से ऑल इंडिया सर्विस की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। इनमे से ज्यादातर अफसरों के ठिकानो पर IT -ED समेत CBI तक की छापेमारी हो चुकी है। लेकिन नतीजा सिफर रहा है।

पुलिस अधिकारी चंद्रभूषण वर्मा द्वारा ED में दर्ज बयानों से पता चलता है, कि हर महीने की आखिरी तारीख से पूर्व आईपीएस अधिकारियों और पूर्व मुख्यमंत्री बघेल को करोड़ों का भुगतान किया जाता था। इसके पुख्ता सबूतों के बावजूद आईपीएस अधिकारियों को अभयदान दे दिया गया है। जबकि, इस महत्त्वपूर्ण गवाह के बयानों को दरकिनार करने के लिए एजेंसियों पर राजनैतिक दबाव जैसे वाकयों की चर्चा भी आम है।

खादी,खाकी और सरकार के गैर जरूरी संरक्षण से बने गजब संयोग से प्रदेश में अब आम जनता का दम निकलने लगा है। भ्रष्टाचार के ब्रैंड-अम्बेसडर पूर्व मुख्यमंत्री बघेल के गिरोह में शामिल इन अफसरों के खिलाफ बीजेपी शासन काल में भी वैधानिक कार्यवाही नहीं होने से आम जनता सख्ते में है। पूर्व मुख्यमंत्री बघेल के खिलाफ भी पुख्ता सबूतों के बावजूद कानूनी कार्यवाही अब तक परवान नहीं चढ़ पाई है। ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति आम जनता को काफी लचीली और सुविधाजनक लगने लगी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2023 विधान सभा चुनाव के दौरान भ्रष्टाचार के खिलाफ राज्य में बड़ी कार्यवाही का एलान किया था। लेकिन बीजेपी के सत्ता में आने के लगभग दो साल पूरे होने में अब पखवाड़ा भर भी शेष नहीं बचा है। बावजूद इसके किसी भी दागी आईपीएस अधिकारी के खिलाफ जाँच तक गठित नहीं की गई है। इन अफसरों की जाँच को लेकर राज्य सरकार की बेरुखी भी हैरान करने वाली बताई जाती है। जानकारी के मुताबिक, बीजेपी के कई नेताओ ने पार्टी के भीतर और बाहर दागी अफसरों के खिलाफ बिगुल भी फूंका था, लेकिन नक्कारखाने में उनकी आवाज़ भी तूती की आवाज़ की तरह दबकर रह गई है। यही नहीं, ऐसे नेताओ को पार्टी में बने नए समीकरणों ने हाशिये पर ला खड़ा कर दिया है। अब ये नेता भ्रष्ट्राचार के खिलाफ आवाज़ उठाने को लेकर अपनी ही सरकार की बेरुखी से दो-चार हो रहे है।

छत्तीसगढ़ में ऑल इंडिया सर्विस के ज्यादातर प्रभावशील अधिकारियों के खिलाफ गंभीर मामले लंबित बताये जाते है। आम जनता को उम्मीद थी, क़ि सत्ता में बदलाव के बाद कांग्रेस का दुप्पटा ओढ़ने वाले अधिकारियों के खिलाफ सिविल सेवा आचरण संहिता के तहत कुछ तो कदम उठाये जायेगे ? लेकिन मामले ने सिर्फ ठन्डे बस्ते की राह पकड़ ली है। प्रदेश में कांग्रेस कार्यकाल में अंजाम दिए गए तमाम घोटालो में ऑल इंडिया सर्विस के अधिकारियों की महती भूमिका बताई जाती है।

विधिक जानकारों के मुताबिक, ऑल इंडिया सर्विस के ज्यादातर आईपीएस अधिकारी अपने स्वयं के “बैचमेटों” से सांठ-गांठ कर जाँच को ना केवल प्रभावित कर रहे है, बल्कि राज्य सरकार को गुमराह करने में भी कामयाब रहे है। कांग्रेस के बाद बीजेपी के प्रभावशील नेताओ को साधने से उनके खिलाफ राज्य सरकार के स्तर पर होने वाली तमाम कार्यवाही स्थगित कर दी गई है। ऐसे अफसरों के खिलाफ चीफ सेक्रेटरी और PHQ स्तर पर भी कोई कार्यवाही नहीं होने से राज्य की बीजेपी सरकार के मंसूबो पर पानी फिरने लगा है। बीजेपी सरकार में दागी आईपीएस अधिकारियों के दबदबे और मनचाही पोस्टिंग से साफ़ हो रहा है, क़ि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सरकार पर भी दागी नौकरशाही हावी है।

छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अफसरों की तर्ज पर कई आईएएस अफसर IT-ED के चक्कर में जेल की हवा खा चुके है। इसके बावजूद उनके हौसले भी बुलंद बताये जाते है। इसका कारण दागी अफसरों के खिलाफ ठोस वैधानिक कार्यवाही का अभाव बताया जाता है। फ़िलहाल, सत्ताधारी दल के शीर्ष नेताओं का रायपुर में जमावड़े का असर नौकरशाही की दशा-दिशा को कितना प्रभावित करेगा ? यह तो वक्त ही बताएगा।
