छत्तीसगढ़ में अब चारा घोटाला, वन विभाग ने डकार लिया वन्य जीवों का भोजन, कैंपा योजना सिर्फ कागजों में, बड़े भ्रष्टाचार के चलते जल, जंगल और जमीन खतरे में, सवालों के घेरे में वन एवं जलवायु विभाग…. 

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रायपुर: छत्तीसगढ़ में कैंपा योजना सिर्फ कागजों में संचालित होने से एक बड़ी आबादी कों जल, जंगल और जमीन  के संरक्षण को लेकर पसीना बहाना पड़ रहा है। दरअसल, इंसानों ही नहीं बल्कि वन्य-जीव जंतुओं के भोजन तक पर कई सरकारी अधिकारी अपना हाथ साफ कर रहे है। ताजा मामला उन जीव-जंतुओं के भोजन आहार से जुड़ा है, जो जंगलों में निवासरत है। ये जीव-जंतु शाहकारी-मांसाहारी है, लिहाजा सरकार ने इनके दाना-पानी का पुख्ता बंदोबस्त के लिए जंगलों के भीतर ही चारागाह निर्मित करने के लिए कैंपा फंड के माध्यम से करोड़ों का आबंटन किया था। यह रकम साल दर साल खर्च भी की जा रही थी। लेकिन सिर्फ कागजों में।

प्रदेश के डेढ़ दर्जन से ज्यादा जिलों के जंगलों में इस योजना के तहत ना तो चारागाह निर्मित किये गए और ना ही वन्य जीवों के आहार के लिए कोई व्यवस्था की गई। प्रदेश के बिलासपुर डिवीजन के अंतर्गत रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ वन मण्डल में भी अन्य जिलों की भांति चारागाह विकास के लिए 54 लाख रूपए का आबंटन किया गया था। लेकिन जंगल में इस रकम से कोई चारागाह विकसित नहीं किया गया बल्कि पुराने-परंपरागत प्राकृतिक मैदान को ही चारागाह घोषित कर खानापूर्ति कर दी गई।

बताया जाता है कि सिर्फ धरमजयगढ़ वन मंडल ही नहीं बल्कि प्रदेश के ज्यादातर जंगली हिस्सों में कैंपा निधि की रकम इसी तर्ज पर भ्रष्टाचार की भेट चढ़ गई है। इसके लिए वन एवं जलवायु विभाग के प्रमुख कैंपा राव की कार्यप्रणाली को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। प्रदेश में वन्य प्राणियों के संरक्षण और उनके भोजन हेतु चारागाह विकास के नाम पर स्वीकृत राशि के दुरुपयोग और गबन के मामले उजागर हुए है।

वन मण्डल धरमजयगढ़ में कैंपा (CAMPA) योजना के तहत 2021-22 में चारागाह विकास हेतु लगभग 54 लाख रुपये स्वीकृत किए गए थे। लेकिन सरकारी दस्तावेजों में जिन स्थानों पर चारागाह दर्शाया गया है, वहां ना तो वास्तविक रूप से चारागाह निर्मित किया गया है और ना ही इससे संबंधी कोई विकास कार्य कराए गए है। सूत्र तस्दीक करते है कि साल दर साल चारागाह विकास को लेकर सरकार के कैंपा फंड से रकम का भुगतान होते रहा। लेकिन जंगल राज में वन्य जीवों के रखरखाव के लिए अमले ने ना तो कोई रूचि दिखाई और ना ही वन्य जीवों के जीवन की रक्षा करने के लिए कोई ठोस उपाय उठाये गए। राज्य के कई जिलों से कैंपा फंड के तहत सिर्फ बोगस बिलों और कागजी कार्यवाही के नमूने सामने आ रहे है।  

छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री करप्शन बघेल के कार्यकाल में गाय-गोबर, गोठान घोटाले ने जनता को हैरत में डाल दिया था। लेकिन प्रदेश का वन विभाग भी घोटालों को लेकर अव्वल साबित हो रहा है। कैम्पा योजना भारी भरकम भ्रष्टाचार की भेट चढ़ गई है। इस योजना के तहत जंगलों और वन ग्रामों के विकास की बड़ी रकम सिर्फ कागजों में खर्च की जा रही है। कैम्पा योजना के तहत पुल-पुलिया, स्टॉपडेम, तालाब निर्माण, लेंटाना उन्मूलन जैसे कार्यों में भ्रष्टाचार की खबरें आम रही हैं। लेकिन अब वन्यप्राणियों के भोजन हेतु स्वीकृत राशि के भी डकार लिए जाने की जानकारी सामने आई है। इस चारागाह घोटाले को प्रदेश के ज्यादातर वन मंडलों में अंजाम दिया गया है। जानकारी के मुताबिक अकेले धरमजयगढ़ वन मंडल में CEO राज्य कैम्पा योजना के तहत स्वीकृत राशि और संबंधित पत्र क्रमांक से साफ़ होता है कि राज्य सरकार की आँखों में धूल झोंकने के लिए वन अधिकारियों ने इन इलाकों में सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाये थे।

एक शिकायत के मुताबिक जमीनी स्तर पर विकास कार्यों का नामों-निशान नजर नहीं आ रहा है। चारागाह विकास के लिए विभागीय प्रक्रिया के तहत बताया जाता है कि पत्र क्रमांक 119 (दिनांक 19.07.2021) – कक्ष क्रमांक 396 आर.एफ. पोटीया हेतु ₹15,77,000 स्वीकृत की गई थी। इसी तर्ज पर पत्र क्रमांक 119 (दिनांक 19.07.2021) – कक्ष क्रमांक 383 पी.एफ. आँगना हेतु ₹15,77,000 स्वीकृत, पत्र क्रमांक 138 (दिनांक 19.07.2021) – कक्ष क्रमांक 12 आर.एफ. पोटीया हेतु ₹15,77,000 स्वीकृत और पत्र क्रमांक 134 (दिनांक 19.07.2021) – कक्ष क्रमांक 562 आर.एफ. पोटीया हेतु ₹6,31,000 स्वीकृत। 

शहरों की तर्ज पर प्रदेश की एक बड़ी आबादी प्राकृतिक जंगलों के भीतर निवासरत है। इन वन ग्रामों में स्थानीय निवासियों ने भी कैंपा फंड के दुरुपयोग को लेकर हैरानी जताई है। पीड़ितों के मुताबिक पिछले 3-4 सालों से वन्य जीवों के आबादी की ओर पयालन की कई घटनाएं सामने आई है। इसका मुख्य कारण जंगलों के भीतर जल श्रोतों की कमी, वनों की अवैध कटाई और रोपे गए पेड़-पौधों का संरक्षण ना होना शामिल है। वन ग्रामों में पीढियों से गुजर-बसर करने वाले ग्रामीण तस्दीक करते है कि वन विभाग ने विकास योजनाओं से मुँह मोड़ लिया है। खासतौर पर कैंपा फंड की रकम का एक बड़ा हिस्सा विभागीय तौर पर ही डकार लिया जा रहा है। इसमें मुख्य भूमिका आलाधिकारियों की बताई जाती है।

धरमजयगढ़ वन मंडल में निवासरत कई शिकायतकर्ता बताते है कि उनके इलाकों में हाथियों का शिकार जोरो पर है। उनके मुताबिक भूखे-प्यासे हाथी भोजन-पानी के लिए जंगलों से बाहर निकल रहे है, इस दौरान वे मारे भी जा रहे है। स्थानीय निवासियों ने बताया कि उनके इलाकों के वन कक्षों में किसी भी प्रकार का चारागाह विकास कार्य नहीं किया गया है। ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि पता करने पर वन विभाग के अधिकारियों द्वारा फर्जी बिल-वाउचर के जरिए सरकारी राशि का गबन की जानकारी मिली है। उनके मुताबिक शिकायत के बाद वन विभाग के कर्मचारी-अधिकारियों ने जबरन कोरे कागजों पर ग्रामीणों से हस्ताक्षर करवाये है।