
मलेरिया सदियों से मानवता के सामने एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उपस्थित रहा है। मादा एनोफिलीज़ मच्छर के काटने से फैलने वाला यह रोग न केवल शारीरिक पीड़ा का कारण बनता है, बल्कि विशेषकर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा दुष्प्रभाव डालता है। कभी विश्व के सर्वाधिक मलेरिया-प्रभावित देशों में गिने जाने वाला भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। देश की मोदी सरकार ने वर्ष 2027 तक स्थानीय संचरण (Indigenous Transmission) को पूर्णतः समाप्त करने तथा 2030 तक मलेरिया के संपूर्ण उन्मूलन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्ष 2026 तक भारत ने मलेरिया नियंत्रण और प्रबंधन की अपनी रणनीतियों में जो व्यापक और संरचनात्मक परिवर्तन किए हैं, वे अब वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय के लिए एक प्रेरक उदाहरण एक केस स्टडी के रूप में उभर रहे हैं।
प्रत्येक वर्ष 25 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व मलेरिया दिवस केवल एक औपचारिक तिथि नहीं, बल्कि मानवता के समक्ष खड़ी इस जटिल स्वास्थ्य चुनौती के प्रति सामूहिक चेतना का सशक्त आह्वान है। मलेरिया एक ऐसा रोग जिसने सदियों से असंख्य जीवनों को प्रभावित किया है। आज भी वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था की परीक्षा ले रहा है। विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद, यह बीमारी विशेष रूप से विकासशील देशों में अपनी गहरी जड़ें बनाए हुए है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहां जलवायु, भौगोलिक परिस्थितियां और सामाजिक-आर्थिक असमानताएं मलेरिया के प्रसार को प्रभावित करती हैं, इस दिवस की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। यह दिन न केवल जागरूकता फैलाने का अवसर प्रदान करता है, बल्कि हमें सामूहिक संकल्प, नवाचार और निरंतर प्रयासों के माध्यम से मलेरिया-मुक्त समाज की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी करता है।
भारतीय संदर्भ: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति
भारत में मलेरिया नियंत्रण की संगठित पहल वर्ष 1953 में प्रारंभ हुए ‘राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम’ (NMCP) से मानी जाती है। यह वह दौर था जब मलेरिया देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल था। समय के साथ यह कार्यक्रम विकसित होता गया और वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नीतिगत सुधारों तथा तकनीकी नवाचारों के समन्वय से भारत ने मलेरिया नियंत्रण की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है।
आंकड़ों में उल्लेखनीय सुधार: पिछले एक दशक में भारत की उपलब्धियां विशेष रूप से प्रेरणादायक रही हैं। वर्ष 2015 से 2024 के बीच मलेरिया के मामलों में लगभग 80 प्रतिशत तथा मृत्यु दर में 78 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई है। यह गिरावट न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की सुदृढ़ता को दर्शाती है, बल्कि जन-जागरूकता, समयबद्ध उपचार और प्रभावी रोकथाम रणनीतियों की सफलता का भी प्रमाण है।
उपलब्धियां और प्रगति: वर्ष 2026 तक उपलब्ध नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, देश के 160 से अधिक जिले ‘शून्य स्वदेशी मामले’ (Zero Indigenous Cases) की श्रेणी में पहुंच चुके हैं। यह उपलब्धि इस बात का संकेत है कि भारत अब मलेरिया उन्मूलन के लक्ष्य की ओर तेज़ी से अग्रसर है।
क्षेत्रीय स्थिति और संकेतक: वर्तमान परिदृश्य में देश के 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘वार्षिक परजीवी सूचकांक’ (Annual Parasite Index-API) 1 से कम दर्ज किया गया है। यह सूचकांक मलेरिया के प्रसार की तीव्रता को मापने का महत्वपूर्ण मानदंड है, और इसका निम्न स्तर इस बात का द्योतक है कि भारत उन्मूलन की दिशा में एक मजबूत और निर्णायक स्थिति में पहुंच चुका है। समग्रतः, ऐतिहासिक प्रयासों, सतत नीतिगत हस्तक्षेपों और जन-सहभागिता के संयुक्त प्रभाव से भारत मलेरिया नियंत्रण से आगे बढ़कर उसके उन्मूलन की दिशा में एक सशक्त उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।
‘राष्ट्रीय रणनीतिक योजना’ (NSP) 2023-2027: एक लक्षित और चरणबद्ध दृष्टिकोण
भारत की वर्तमान सफलता के केंद्र में ‘टेस्ट, ट्रीट और ट्रैक’ (3Ts) की सुदृढ़ रणनीति है, जो मलेरिया नियंत्रण को वैज्ञानिक, त्वरित और परिणामोन्मुख बनाती है। इस दृष्टिकोण के अंतर्गत प्रत्येक संदिग्ध मामले की समय पर जांच (Test), पुष्टि होने पर तत्काल और प्रभावी उपचार (Treatment), तथा रोग के स्रोत और प्रसार की सतत निगरानी (Track) सुनिश्चित की जाती है। इसी रणनीतिक सोच को आगे बढ़ाते हुए, मोदी सरकार ने ‘राष्ट्रीय रणनीतिक योजना’ (NSP) 2023–2027 के तहत देश को मलेरिया की तीव्रता के आधार पर चार स्पष्ट श्रेणियों में विभाजित किया है, ताकि प्रत्येक क्षेत्र के लिए लक्षित और उपयुक्त हस्तक्षेप किए जा सकें।
श्रेणी 0 (Elimination): वे राज्य या क्षेत्र जहां मलेरिया के स्वदेशी मामले शून्य हो चुके हैं और लक्ष्य इस स्थिति को बनाए रखना है।श्रेणी 1 (Interruption): ऐसे क्षेत्र जहां मलेरिया के मामले अत्यंत सीमित हैं और स्थानीय संचरण को पूर्णतः रोकने की दिशा में प्रयास जारी हैं।श्रेणी 2 (Reduction): वे इलाके जहां मलेरिया का मध्यम स्तर पर प्रसार है और मामलों को तेजी से घटाने के लिए केंद्रित अभियान चलाए जा रहे हैं।श्रेणी 3 (Control): उच्च प्रसार वाले क्षेत्र, विशेषकर आदिवासी और वन क्षेत्रों में, जहां रोग नियंत्रण के लिए गहन, बहु-आयामी और सतत हस्तक्षेपों की आवश्यकता है। यह वर्गीकरण न केवल संसाधनों के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करता है, बल्कि क्षेत्र-विशेष की चुनौतियों के अनुरूप रणनीतियों को लागू करने में भी सहायक सिद्ध हो रहा है। परिणामस्वरूप, भारत मलेरिया उन्मूलन के अपने लक्ष्य की ओर अधिक संगठित, सटीक और प्रभावी ढंग से अग्रसर है।
प्रमुख तकनीकी और वैज्ञानिक नवाचार: मलेरिया नियंत्रण की नई दिशा
मलेरिया के विरुद्ध भारत की लड़ाई अब केवल पारंपरिक उपायों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें आधुनिक विज्ञान और तकनीक का व्यापक समावेश हुआ है। नवाचार-आधारित ये पहलें न केवल रोग नियंत्रण को अधिक प्रभावी बना रही हैं, बल्कि उन्मूलन के लक्ष्य को भी यथार्थ के करीब ला रही हैं। स्वदेशी वैक्सीन (R21/Matrix-M): R21/Matrix-M malaria vaccine भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में उभरी है। Serum Institute of India द्वारा निर्मित यह वैक्सीन किफायती होने के साथ-साथ 75 प्रतिशत से अधिक प्रभावशीलता प्रदर्शित करती है। व्यापक उपयोग की दिशा में यह एक संभावित ‘गेम-चेंजर’ के रूप में देखी जा रही है, जो विशेषकर उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में संक्रमण को रोकने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
LLINs का व्यापक वितरण: ‘लॉन्ग-लास्टिंग इंसेक्टिसाइडल नेट्स’ (LLINs) का बड़े पैमाने पर वितरण मलेरिया नियंत्रण की रणनीति का एक अत्यंत प्रभावी स्तंभ साबित हुआ है। विशेष रूप से Odisha और Chhattisgarh जैसे राज्यों में इन मच्छरदानियों के उपयोग से संक्रमण दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। ये जाल लंबे समय तक प्रभावी रहते हैं और मच्छरों के संपर्क को न्यूनतम कर देते हैं, जिससे संक्रमण की श्रृंखला टूटती है।
डिजिटल निगरानी प्रणाली: Integrated Health Information Platform (IHIP) के माध्यम से अब मलेरिया के प्रत्येक मामले की रियल-टाइम निगरानी संभव हो गई है। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म स्वास्थ्य तंत्र को त्वरित निर्णय लेने, संसाधनों के बेहतर आवंटन और संक्रमण के प्रसार को नियंत्रित करने में अत्यंत सहायक सिद्ध हो रहा है। इन तकनीकी और वैज्ञानिक नवाचारों के समन्वित उपयोग ने भारत को मलेरिया नियंत्रण के पारंपरिक ढांचे से आगे बढ़ाकर एक आधुनिक, डेटा-आधारित और परिणामोन्मुख स्वास्थ्य प्रणाली की ओर अग्रसर किया है।
प्रमुख चुनौतियां: अभी राह शेष है
उल्लेखनीय उपलब्धियों के बावजूद, वर्ष 2030 तक मलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य हासिल करने की राह अब भी कई जटिल चुनौतियों से घिरी हुई है। ये बाधाएं केवल तकनीकी या चिकित्सकीय सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक संरचना, व्यवहारगत प्रवृत्तियों और व्यवस्थागत कमजोरियों से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में इन चुनौतियों का समाधान एक समग्र, समन्वित और सतत दृष्टिकोण के माध्यम से ही संभव है, जो विज्ञान के साथ-साथ समाज की सक्रिय भागीदारी को भी समान महत्व दे।
दवा और कीटनाशक प्रतिरोध: मलेरिया नियंत्रण के प्रयासों के समक्ष सबसे गंभीर चिंताओं में से एक मच्छरों और परजीवियों में बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता है। मच्छरों में Pyrethroids जैसे कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोध विकसित हो रहा है, वहीं परजीवी Artemisinin जैसी प्रभावी दवाओं के प्रति भी धीरे-धीरे प्रतिरोधी बनते जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति उपचार और रोकथाम दोनों को जटिल बना सकती है।
शहरी मलेरिया (Urban Malaria): तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने मलेरिया के एक नए रूप शहरी मलेरिया को जन्म दिया है। विशेष रूप से निर्माण स्थलों, जल-जमाव वाले क्षेत्रों और घनी आबादी वाले इलाकों में Anopheles stephensi मच्छर का प्रसार एक उभरती हुई चुनौती बन गया है। यह स्थिति उन क्षेत्रों में भी जोखिम बढ़ा रही है, जो पहले अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते थे।
प्रवासी जनसंख्या की चुनौती: देश के भीतर काम की तलाश में एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाले प्रवासी श्रमिक मलेरिया नियंत्रण प्रयासों के लिए एक संवेदनशील कड़ी बन जाते हैं। इनके साथ परजीवी का संचरण ‘शून्य मामले’ (Zero Case) वाले क्षेत्रों में पुनः संक्रमण का खतरा उत्पन्न करता है, जिससे उन्मूलन की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी: भारत में बड़ी संख्या में लोग उपचार के लिए निजी स्वास्थ्य सेवाओं का सहारा लेते हैं। हालांकि, इन मामलों की रिपोर्टिंग अक्सर सरकारी डेटाबेस में समुचित रूप से दर्ज नहीं हो पाती, जिससे वास्तविक आंकड़ों का आकलन प्रभावित होता है। यह अंतर निगरानी और नीति-निर्माण दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है। स्पष्ट है कि मलेरिया उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ते हुए इन चुनौतियों का समाधान बहु-आयामी, समन्वित और सतत प्रयासों के माध्यम से ही संभव है।
विशेष केस स्टडी: ओडिशा का ‘दमन’ मॉडल
मलेरिया नियंत्रण के क्षेत्र में Odisha ने अपने अभिनव ‘दुर्गम अंचल में मलेरिया निराकरण’ (DAMAN) कार्यक्रम के माध्यम से एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस पहल ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि नीतिगत दृढ़ता, प्रशासनिक प्रतिबद्धता और समुदाय-आधारित रणनीतियों का समुचित समन्वय हो, तो कठिन से कठिन भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों में भी मलेरिया पर प्रभावी नियंत्रण संभव है। विशेष रूप से आदिवासी और दुर्गम क्षेत्रों में लागू इस कार्यक्रम का मूल आधार ‘घर-घर जाकर जांच और उपचार’ (Mass Screening and Treatment) है।
स्वास्थ्यकर्मी सीधे समुदाय के बीच पहुंचकर प्रत्येक व्यक्ति की जांच करते हैं और संक्रमित पाए जाने पर तत्काल उपचार सुनिश्चित करते हैं। इससे न केवल छिपे हुए मामलों की पहचान संभव हो पाती है, बल्कि संक्रमण की श्रृंखला को प्रारंभिक स्तर पर ही तोड़ा जा सकता है। इस मॉडल की उल्लेखनीय सफलता ने इसे एक व्यवहारिक और प्रभावी रणनीति के रूप में स्थापित किया है। परिणामस्वरूप, ‘दमन’ मॉडल को अब राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनाया जा रहा है, जिससे देश के अन्य उच्च-प्रभावित क्षेत्रों में मलेरिया नियंत्रण के प्रयासों को नई दिशा और गति मिल रही है।
भविष्य की रूपरेखा: 2026–2030 का मार्ग
मलेरिया उन्मूलन के लक्ष्य की दृष्टि से आने वाले चार वर्ष भारत के लिए अत्यंत निर्णायक सिद्ध होने वाले हैं। अब तक की उपलब्धियों को स्थायी सफलता में बदलने के लिए आवश्यक है कि रणनीतियां और अधिक समन्वित, दूरदर्शी तथा तकनीक-सम्मत हों। इस दिशा में कुछ प्रमुख प्राथमिकताएं निम्नलिखित हैं।
निजी क्षेत्र में अनिवार्य रिपोर्टिंग: स्वास्थ्य तंत्र की समग्रता सुनिश्चित करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि निजी चिकित्सकों और अस्पतालों द्वारा देखे गए प्रत्येक संदिग्ध तथा पुष्ट मलेरिया मामले की रिपोर्टिंग अनिवार्य रूप से की जाए। इससे वास्तविक आंकड़ों का सटीक आकलन संभव होगा और नीति-निर्माण अधिक प्रभावी बन सकेगा।
सीमा-पार सहयोग का सुदृढ़ीकरण: मलेरिया एक सीमाहीन चुनौती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से जुड़े हैं। अतः Nepal, Bhutan और Myanmar जैसे पड़ोसी देशों के साथ समन्वित प्रयास संयुक्त निगरानी, सूचना-साझाकरण और सामूहिक नियंत्रण अभियान सीमावर्ती क्षेत्रों में संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए अनिवार्य होंगे।
जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय निगरानी: बदलती जलवायु परिस्थितियां मच्छरों के भौगोलिक विस्तार को प्रभावित कर रही हैं, जिससे मलेरिया नए क्षेत्रों में भी फैलने का जोखिम बढ़ रहा है। इस चुनौती से निपटने के लिए ‘पर्यावरण-जनित निगरानी’ (Environmental Surveillance) को सुदृढ़ करना होगा, ताकि संभावित जोखिम क्षेत्रों की समय रहते पहचान कर प्रभावी रोकथाम उपाय लागू किए जा सकें। स्पष्ट है कि 2026 से 2030 के बीच की यह अवधि केवल लक्ष्यों की प्राप्ति का नहीं, बल्कि एक सुदृढ़, सतत और लचीली सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण का भी अवसर है।
“मलेरिया मुक्त भारत” बना गौरव का संकल्प :
विश्व मलेरिया दिवस 2026 के अवसर पर भारत का संदेश स्पष्ट, अडिग और आशा से ओत-प्रोत है। हम इस प्राचीन बीमारी के समापन के निर्णायक क्षण के अत्यंत निकट पहुंच चुके हैं। मलेरिया अब केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गया है; यह गरीबी, सामाजिक असमानता और विकास की चुनौतियों से गहराई से जुड़ा हुआ प्रश्न है। इसलिए इसका समाधान भी बहुआयामी होना आवश्यक है। जहां चिकित्सा विज्ञान, सामाजिक जागरूकता और नीतिगत संकल्प एक साथ आगे बढ़ें।
भारत ने बीते वर्षों में जिस प्रतिबद्धता, नवाचार और जनभागीदारी का परिचय दिया है, वह इस दिशा में एक सशक्त आधार निर्मित करता है। यदि यही गति, यही समन्वय और यही संकल्प आगे भी कायम रहता है, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत ‘मलेरिया मुक्त’ राष्ट्र के रूप में विश्व के सामने एक प्रेरक उदाहरण बनकर उभरेगा। “मलेरिया मुक्त भारत” केवल एक नीतिगत लक्ष्य या सरकारी अभियान भर नहीं है; यह 140 करोड़ भारतीयों के स्वस्थ, सशक्त और सम्मानजनक जीवन का सामूहिक संकल्प है। एक ऐसा संकल्प, जो न केवल रोग के उन्मूलन का, बल्कि एक समतामूलक और सुरक्षित समाज के निर्माण का भी प्रतीक है। यह आलेख मेडिसिन के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ गोपाल झा से की गई विस्तृत बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है।




