
भारतीय संस्कृति में नारी को सृष्टि की मूलाधार शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। वह केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि समूची मानव सभ्यता की संवाहक है। उसकी कोख में भविष्य अंकुरित होता है, उसके आंचल में संस्कारों की सरिता बहती है और उसके स्नेहिल स्पर्श में समाज का चरित्र आकार ग्रहण करता है। यही कारण है कि हमारे शास्त्रों ने उदात्त स्वर में उद्घोष किया है- “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”-अर्थात् जननी और जन्मभूमि, दोनों ही स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं। मां केवल एक संबंध नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना है; वह संस्कृति की निरंतरता, परंपराओं की वाहक और सृष्टि की सृजन-शक्ति का मूर्त रूप है। उसके अस्तित्व में करुणा का सागर, त्याग की तपस्या और सृजन का दिव्य स्पंदन समाहित है। वह स्वयं में एक संस्था है, जो समय की धारा में सभ्यता को दिशा और गति प्रदान करती है।
पर यह एक विडंबना है कि जिस समाज ने नारी को ‘शक्ति’ कहकर पूजनीय माना, उसी ने लंबे समय तक उसके मातृत्व को उपेक्षा के अंधकार में छोड़ दिया। प्रसव के क्षणों में, जब उसे सबसे अधिक संरक्षण और संवेदना की आवश्यकता होती है, तब चिकित्सा सुविधाओं का अभाव, कुपोषण की पीड़ा और सामाजिक कुरीतियों की जकड़न उसके जीवन को संकट के गर्त में धकेल देती है। यह विरोधाभास केवल एक सामाजिक विसंगति नहीं, बल्कि हमारी संवेदनहीनता का दर्पण है,जो हमें यह स्मरण कराता है कि मातृत्व की गरिमा का वास्तविक सम्मान तभी संभव है, जब उसकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। इसी चुनौती को पहचानते हुए भारत में हर वर्ष 11 अप्रैल को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संकल्प है। हर महिला को सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक मातृत्व प्रदान करने का। यह हमें याद दिलाता है कि मातृत्व केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य : परंपरा से प्रगति तक
भारतीय वाङ्मय में मातृत्व को अत्यंत उच्च स्थान प्राप्त है। वेदों और उपनिषदों में माता को प्रथम गुरु और जीवन की आधारशिला माना गया है।“मातृ देवो भव” का उपदेश यह दर्शाता है कि मां का स्थान देवताओं से भी ऊंचा है। रामायण में माता के संस्कारों को व्यक्ति के जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला बताया गया है, वहीं महाभारत में माता को धर्म और नीति का प्रेरणा स्रोत माना गया है। इन ग्रंथों में मातृत्व केवल जन्म देने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि पालन-पोषण, संस्कार और चरित्र निर्माण की सतत साधना के रूप में चित्रित किया गया है। आधुनिक भारत में इस सांस्कृतिक दृष्टिकोण को स्वास्थ्य के संदर्भ से जोड़ते हुए वर्ष 2003 में 11 अप्रैल को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस घोषित किया गया। यह दिन मातृत्व को सम्मान देने के साथ-साथ उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रतीक बन गया।
मातृत्व : जैविक प्रक्रिया से सामाजिक दायित्व तक
मातृत्व एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया अवश्य है, लेकिन इसका प्रभाव केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता। यह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक आयामों से गहराई से जुड़ा हुआ विषय है। गर्भधारण से लेकर प्रसव और उसके बाद की देखभाल तक, एक महिला अनेक शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों से गुजरती है। यदि इस दौरान उसे पर्याप्त पोषण, समय पर चिकित्सा सुविधा और भावनात्मक सहयोग न मिले, तो यह प्रक्रिया जोखिमपूर्ण बन सकती है। लंबे समय तक भारतीय समाज में मातृत्व को केवल ‘कर्तव्य’ के रूप में देखा गया, पर अब यह समझ विकसित हो रही है कि सुरक्षित मातृत्व हर महिला का अधिकार है। यह परिवर्तन समाज में जागरूकता और संवेदनशीलता के बढ़ते स्तर को दर्शाता है, जो भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत है।
भारत में मातृ स्वास्थ्य उपलब्धियां और वास्तविकताएं
भारत ने पिछले कुछ दशकों में मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। मातृ मृत्यु दर में भारी गिरावट इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है। जहां कभी यह दर अत्यंत चिंताजनक थी, वहीं अब इसमें लगातार कमी आई है। इस प्रगति के पीछे कई कारण हैं। सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, जागरूकता अभियानों की सफलता और संस्थागत प्रसव में वृद्धि। फिर भी, चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। आज भी कई समस्याएं मातृत्व को जोखिमपूर्ण बनाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी। कुपोषण और एनीमिया की उच्च दर। समय पर प्रसवपूर्व जांच का अभाव। सामाजिक कुरीतियां और अज्ञानता। ये चुनौतियां संकेत देती हैं कि केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन और जनसहभागिता भी आवश्यक है।
भारत सरकार की पहलें सुरक्षित मातृत्व की मजबूत नींव
भारत सरकार ने मातृ स्वास्थ्य को सुधारने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की हैं, जिन्होंने इस दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है। जननी सुरक्षा योजना (JSY) इस योजना का उद्देश्य संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना है। आर्थिक प्रोत्साहन के माध्यम से महिलाओं को अस्पताल में प्रसव के लिए प्रेरित किया गया, जिससे असुरक्षित घरेलू प्रसवों में कमी आई। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA)-इस अभियान के तहत हर महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं को निःशुल्क स्वास्थ्य जांच की सुविधा प्रदान की जाती है। इससे संभावित जोखिमों की समय पर पहचान संभव होती है। सुमन (SUMAN) योजना- इस पहल का उद्देश्य गर्भवती महिलाओं को सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करना है, ताकि उन्हें किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। लक्ष्य (LaQshya) कार्यक्रम-यह कार्यक्रम प्रसव कक्षों और ऑपरेशन थिएटर की गुणवत्ता सुधारने पर केंद्रित है, जिससे संक्रमण और जटिलताओं के जोखिम को कम किया जा सके। इन योजनाओं ने मातृत्व को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक सुदृढ़ आधार तैयार किया है।
पोषण और मातृत्व : स्वास्थ्य की मूल धुरी
“स्वस्थ मां, स्वस्थ शिशु”-यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सत्य है। गर्भावस्था के दौरान महिला के शरीर को अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता होती है। आयरन, फोलिक एसिड, कैल्शियम और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की कमी गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकती है। भारत में आज भी बड़ी संख्या में महिलाएं कुपोषण और एनीमिया से ग्रस्त हैं। यह स्थिति प्रसव के दौरान जोखिम को बढ़ाती है और शिशु के विकास को भी प्रभावित करती है। अतः यह आवश्यक है कि गर्भवती महिलाओं को संतुलित आहार, नियमित जांच और पोषण संबंधी जागरूकता प्रदान की जाए।
सामाजिक दृष्टिकोण और जागरूकता परिवर्तन की कुंजी
मातृत्व की सुरक्षा केवल चिकित्सा सुविधाओं से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। इसके लिए समाज की सोच में बदलाव भी आवश्यक है। बाल विवाह की रोकथाम। महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण। परिवार का सहयोग। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता। ये सभी कारक मिलकर एक ऐसा वातावरण तैयार करते हैं, जिसमें महिला सुरक्षित और सम्मानजनक मातृत्व का अनुभव कर सके। जब तक समाज मातृत्व को साझा जिम्मेदारी के रूप में नहीं अपनाएगा, तब तक पूर्ण परिवर्तन संभव नहीं है।
ग्रामीण क्षेत्रों में मातृ स्वास्थ्य की स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण
ग्रामीण क्षेत्रों में मातृ स्वास्थ्य की स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण है। कई गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की कमी बनी हुई है। गर्भवती महिलाओं को जांच या प्रसव के लिए दूर-दराज के शहरों तक जाना पड़ता है, जिससे समय पर उपचार में देरी होती है। परिवहन सुविधाओं का अभाव इस समस्या को और गंभीर बना देता है। इसके अलावा, पारंपरिक मान्यताएं और जागरूकता की कमी भी महिलाओं को आधुनिक चिकित्सा सेवाओं से दूर रखती हैं। इस स्थिति में सुधार के लिए ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करना अत्यंत आवश्यक है।
डिजिटल युग ने स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा दी
डिजिटल युग ने स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा दी है। टेलीमेडिसिन, मोबाइल हेल्थ एप्स और डिजिटल रिकॉर्ड्स के माध्यम से अब दूरस्थ क्षेत्रों में भी चिकित्सा सलाह उपलब्ध हो रही है। आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मियों के माध्यम से यह तकनीक ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच रही है, जिससे मातृत्व सुरक्षा में सुधार हो रहा है। तकनीक का यह समावेश भविष्य में मातृ स्वास्थ्य को और अधिक सुलभ और प्रभावी बना सकता है।
वैश्विक स्तर पर मातृ स्वास्थ्य चिंता का विषय
विश्व स्तर पर मातृ स्वास्थ्य एक प्रमुख चिंता का विषय है। सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में मातृ मृत्यु दर को कम करना एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। भारत, अपनी विशाल जनसंख्या और विविध परिस्थितियों के बावजूद, इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है। यह वैश्विक मंच पर एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि उचित नीतियों और प्रयासों से बड़े लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं।
मातृ स्वास्थ्य की समस्याओं को समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता
मातृ स्वास्थ्य की समस्याओं का समाधान एकल प्रयास से संभव नहीं है। इसके लिए बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है। स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार। शिक्षा और जागरूकता। आर्थिक सशक्तिकरण। सामाजिक सुधार। जब ये सभी पहलू एक साथ कार्य करते हैं, तभी सुरक्षित मातृत्व का लक्ष्य साकार हो सकता है।
मातृत्व का सम्मान करना ही है अधिकार की पुनर्स्थापना
मातृत्व केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि महिला के सम्मान और अधिकार से जुड़ा विषय है। हर महिला को यह अधिकार है कि वह सुरक्षित और गरिमापूर्ण मातृत्व का अनुभव करे। इसके लिए आवश्यक है निर्णय लेने की स्वतंत्रता। सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं। सामाजिक समर्थन। जब समाज महिला को सम्मान और अधिकार प्रदान करता है, तभी मातृत्व वास्तव में सार्थक बनता है।
मातृत्व की रक्षा संस्कृति की सुरक्षा
यदि राष्ट्र एक वृक्ष है, तो माता उसकी जड़ है। जड़ जितनी मजबूत होगी, वृक्ष उतना ही फलदायी होगा। मातृत्व की सुरक्षा केवल एक स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि संस्कृति और सभ्यता की रक्षा का प्रश्न है। मां वह दीप है, जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देती है। यदि यह दीप सुरक्षित नहीं रहेगा, तो समाज अंधकार में डूब जाएगा। इसलिए मातृत्व की सुरक्षा, मानवता की सुरक्षा है। ममता वह पावन सरिता है, जिसमें संस्कृति के शाश्वत मूल्य प्रवाहित होते हैं। मां का स्नेह केवल भाव नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मा है, जो पीढ़ियों को संस्कारों से सींचती है। जब ममता सुरक्षित रहती है, तब संस्कृति की जड़ें गहरी और अटूट बनती हैं। यदि इस करुणा के स्रोत को ही असुरक्षित छोड़ दिया जाए, तो समाज की आत्मा ही क्षीण हो जाती है। अतः ममता की रक्षा केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व की साधना है। मां की मुस्कान में ही परंपरा का प्रकाश और भविष्य का विश्वास निहित है।
सुरक्षित मातृत्व से ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण
राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस हमें यह सिखाता है कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसकी माताओं के स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। यदि मां सुरक्षित है, तो परिवार सुरक्षित है; यदि परिवार सुरक्षित है, तो समाज सुदृढ़ है; और यदि समाज सुदृढ़ है, तो राष्ट्र समृद्ध है। मातृत्व वह पावन धारा है, जिसमें जीवन का प्रथम स्पंदन और सृजन का दिव्य संगीत गुंजायमान होता है। जब एक मां सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानित होती है, तभी समाज की नींव सुदृढ़ और राष्ट्र की दिशा उज्ज्वल बनती है। मां केवल जीवन की जन्मदात्री नहीं, बल्कि संस्कारों की प्रथम शिल्पकार है। यदि उसकी कोख भय और असुरक्षा से मुक्त होगी, तभी आने वाली पीढ़ियां आत्मविश्वास और सशक्तता के साथ विकसित होंगी। सुरक्षित मातृत्व केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि मानवता की करुणा, संवेदना और उत्तरदायित्व का प्रतीक है। यह वह दीप है, जिसकी ज्योति से राष्ट्र का भविष्य आलोकित होता है। अतः हमारा संकल्प स्पष्ट होना चाहिए हर मां को सुरक्षा, सम्मान और समुचित देखभाल मिले। जब जननी मुस्कुराएगी, तभी राष्ट्र प्रगति के पथ पर दृढ़ता से अग्रसर होगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम मातृत्व को केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी न मानें, बल्कि इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में स्वीकार करें।







